The Token System619 / 1154

The Token System – Chapter 619

7 min read November 6, 2026

“अच्छा, तो तू ये बता,” रीना ने झाड़ू मेरी तरफ़ करते हुए कहा, “पापा की डायरी में जो पर्ची मिली, वो तेरे संदूक में कैसे पहुँची?”

मैं उसकी बात सुनकर रुक गया। “मेरे पास तो वो कल ही आई है। माँ ने दी।”

“तो कोई उसे माँ के हाथ तक पहुँचाने के लिए घर आया।” रीना ने झाड़ू दीवार से टिका दी। “और तू कल रात भर बाहर था। मैं और माँ अकेली थीं।”

मुझे रीना की तरफ़ देखकर पता चला कि वो डर नहीं रही थी। वो हिसाब माँग रही थी।

“तू कल रात किसके साथ सोई?” मैंने पूछा।

“माँ के पास।” उसने कहा। “पर सुबह जब मैं उठी, माँ रसोई में थी और ऊपर की खिड़की खुली थी।”

“ऊपर की खिड़की कोई नहीं खोलता।”

“तो आज कोई खोल गया।”

मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। हमारी छत पर जाने वाली सीढ़ी लोहे की टेढ़ी कड़ियों वाली है, हाथ लगाओ तो ठंडी रहती है, आवाज़ करती है। मैं चढ़ा। छत पर बबूल का पेड़ झुका हुआ है, और उसके पीछे पड़ोसी की छत दिखती है। मैं किनारे पर गया और झाँका।

पड़ोसी का मकान हमसे एक छत ऊँचा है। उसकी उस पुरानी खिड़की से हमारा आँगन सीधा दिखता है। खिड़की पर लोहे का भारी ताला है, बाहर से, जंग लगी सांकल से जकड़ा हुआ।

मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। ताले पर कुछ खुदा था।

मैं छत पर पड़ी ईंट पर चढ़ा, फिर बबूल की झुकी टहनी पकड़कर थोड़ा और आगे झाँका। अब पढ़ सका। एक नाम खुदा था, पुरानी खुदाई में, स्याही की तरह धँसा हुआ।

“कन्हैया।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। छत की सीमेंट मेरे पैरों के नीचे गरम लग रही थी, पर हाथ ठंडे थे, जैसे किसी ने मेरी उँगलियाँ बर्फ़ में डाल दी हों। कन्हैया। पापा का नाम।

मैं उतरा। सीढ़ी की कड़ियाँ ज़ोर से बजीं। रसोई से माँ की आवाज़ आई, “कौन?”

“मैं हूँ, माँ।”

बंसी को फ़ोन मिलाया। दो बार घंटी गई, फिर उसकी आवाज़ आई, “क्या बात है, सुबह-सुबह?”

“पड़ोसी की छत पर पुरानी खिड़की है। उसके ताले पर पापा का नाम खुदा है। कन्हैया।”

फ़ोन पर सन्नाटा हुआ। बंसी ने साँस ली, जैसे चाय का कुल्हड़ रख रहा हो। “वो खिड़की… भवानी ने बंद करवाई थी। अपने दादा के ज़माने में।”

“और चाबी?”

“चाबी किसी के पास नहीं। जो लोग जानते थे, वो अब नहीं हैं। बस चर्चा है कि वो ताला हवेली के असली हिसाब से जुड़ा है।”

“इसका मतलब?”

“मतलब, मन्नू, कि जो चीज़ें सबसे छिपी होती हैं, वो सबसे ज़्यादा बोलती हैं। मैं आता हूँ थोड़ी देर में। तू तब तक घर पर रह।”

मैंने फ़ोन रखा। माँ रसोई से बाहर आईं, हाथ पोछते हुए। “क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, माँ। छत पर कुछ देखने गया था।”

वो मेरी तरफ़ देखती रही। औरत ऐसी नज़र से देखती है जब उसे पता हो कि सामने वाला झूठ बोल रहा है, पर वो पूछती नहीं। बस हाथ पोछती रही।

मैं बाहर जाने लगा तभी गली के मोड़ पर मोटी गाड़ी खड़ी दिखी। सफ़ेद रंग, धूल से भरी, बोनट पर सूखी मिट्टी की परत। और हमारे घर के बाहर, देहरी पर, चप्पलें पड़ी थीं। दो जोड़ी।

एक किसी मोटे आदमी की, दूसरी छोटे पैरों की।

मैं दरवाज़े पर पहुँचा। अंदर से आवाज़ आ रही थी। हँसी की आवाज़।

रीना हँस रही थी।

मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर चाय की उबास आ रही थी। रीना चाय के प्याले थामे खड़ी थी, मुँह पर हँसी, पर आँखें सतर्क। माँ चूल्हे के पास चुप बैठी थी, उनके हाथ रोटी पर थे पर रोटी नहीं बन रही थी, बस आटा दबा रही थीं।

और सोफ़े पर एक लड़का बैठा था। चौबीस-पच्चीस का, मोटा, गोल चेहरा, मोटी गाड़ी वाला लड़का, हाथ में चाय का कटोरा, और कलाई पर सोने की चूड़ी जैसी चीज़।

“आ गए भैया,” रीना ने कहा। उसकी आवाज़ में वो गुण था जो वो मेहमान के सामने रखती है, जिसे मैं पहचानता हूँ और जिससे मुझे चिढ़ होती है।

“ये…” मैंने लड़के की तरफ़ देखा।

“मैं आकाश,” लड़के ने कहा, और उठने की कोशिश की, फिर आधा उठकर बैठ गया क्योंकि कटोरा थामे थे। “छोटू लाल की गली से आया हूँ। आप रीना के भैया हैं ना? मन्नू?”

“हाँ।”

“मैं अपने मामा जी के यहाँ से आ रहा हूँ। उन्होंने कहा था — मन्नू से मिलकर आना।”

मैंने रीना की तरफ़ देखा। उसने कटोरा मेरी तरफ़ बढ़ाया, जैसे कह रही हो — पहले चाय पी, फिर सवाल कर।

मैं नहीं बैठा। सीधे उस लड़के के सामने खड़ा हो गया।

“तुम्हारे मामा जी कौन हैं?”

वो हँसा। चाय का कटोरा दोनों हाथों में लेकर, हँसते हुए, जैसे मैंने कोई मज़ेदार बात पूछी हो।

“ठाकुर भवानी सिंह।”

रीना का कटोरा हवा में रुक गया।

माँ के हाथ आटे में धँस गए।

मेरे भीतर कुछ ऐसा टूटा जो सालों से टिका हुआ था। मैं उससे अपेक्षा कर रहा था कि वो धमकी देगा, डराएगा, दबाव डालेगा। ये नहीं सोचा था कि वो आएगा, चाय पिएगा, हँसेगा और अपने रिश्ते को ऐसे बोलेगा जैसे गर्व की बात हो।

मैं बैठ गया। उसके ठीक सामने, कुर्सी खींचकर।

“तुम्हें पता है भवानी सिंह कौन हैं?”

वो हँसा फिर। “मेरे मामा हैं। बहुत अच्छे आदमी।”

“अच्छे आदमी की ज़मीन पर,” मैंने कहा, “बहुत से लोगों का हिसाब बाकी है।”

उसका हाथ चाय के प्याले पर रुक गया। हँसी चेहरे से उतर गई जैसे किसी ने कपड़ा खींच लिया हो। “क्या मतलब?”

“मतलब, आकाश, कि तुम्हारे मामा के नर्सिंग होम से मरीज़ गायब होते हैं। मरे हुए लोग ज़िंदा निकलते हैं। ज़मीन के काग़ज़ बदलते हैं। और जो बोलता है, उसका रास्ता मुश्किल हो जाता है।”

“आप गलत सुन रहे हैं,” वो बोला। आवाज़ भारी हो गई थी। “मामा जी ने मेरी पढ़ाई कराई है। मेरे पापा मर गए थे। मामा जी ने ही मुझे पाला है।”

“तो तुम्हें उनकी दूसरी तरफ़ नहीं दिखती?”

“कौन सी दूसरी तरफ़?”

रीना ने बीच में आना चाहा। “भैया, चाय तो पी ले।”

“रीना, तू अंदर जा,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ सख़्त नहीं थी, बस सीधी।

वो एक पल रुकी। फिर माँ के पास गई और बैठ गई। माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

मैं आकाश की तरफ़ झुका। “तुम्हें पता है कि तुम्हारे मामा का बेटा, रणविजय, अदालत में अपने बाप के ख़िलाफ़ गवाही दे चुका है?”

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “क्या?”

“कल। तहसील के आँगन में। उसने कहा कि उसने बीस साल बिना पढ़े काग़ज़ों पर दस्तख़त किए।”

आकाश ने कटोरा मेज़ पर रखा। उसके हाथ काँप रहे थे। “ये झूठ है। रणविजय भैया ऐसा नहीं करेंगे।”

“झूठ है या सच, वो अदालत ने देख लिया।”

वो उठ खड़ा हुआ। “मुझे जाना होगा।”

“अभी नहीं।” मैं भी उठा। “तुम यहाँ क्यों आए हो? सीधा बात करो।”

वो हिचका। फिर उसने देखा — माँ की तरफ़, रीना की तरफ़ — और मुझे लगा कि वो कुछ कहने से पहले तौल रहा है कि कितना कहे।

“मामा जी ने कहा था,” वो धीरे से बोला, “कि तुम्हारे घर में एक रजिस्टर है। वो मुझे दे दो। शादी की सारी शर्तें माफ़।”

चूल्हे से आवाज़ आई। माँ ने रोटी उठाई और सीधी आग पर रख दी। रीना ने उनकी तरफ़ देखा।

“कौन सा रजिस्टर?” मैंने पूछा।

“वो पुराना, जिसमें हवेली के तीन हिस्सों का हिसाब है। और एक चौथे का भी।” उसने मेरी तरफ़ देखा, बगल में। “मामा जी कहते हैं कि वो रजिस्टर अब किसी काम का नहीं रहा। उनको दो, वो आपको शादी का पूरा ख़र्चा देंगे।”

मैंने उसे देखा। उसके माथे पर पसीना था, गरमी का नहीं, डर का।

“तुम्हें पता है,” मैंने धीरे से कहा, “कि जो रजिस्टर तुम माँगने आए हो, उसमें तुम्हारे मामा जी के हाथ का लिखा हुआ सब कुछ है? किसका हिस्सा छीना, किसके हस्ताक्षर बने, कौन गायब हुआ। उस रजिस्टर में हर चीज़ है। और उस रजिस्टर की कॉपी अब सिर्फ़ मेरे पास नहीं है।”

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