The Token System – Chapter 618
"जानते थे कि सुखिया मरी नहीं। और जानते थे कि भवानी के हिसाब में सिर्फ़ पैसा नहीं है — लोग भी दर्ज हैं। जो भवानी के लिए चलते थे, वो अपने नाम से नहीं चलते थे। सुखिया उनके नाम लिखती थी, रामदीन की हिदायत पर।"
मेरी जेब में टोकन की ठंडक तेज़ हो गई। मैंने उसे निकाला। बीरा देवी ने देखा और उसकी आँखें फैल गईं।
"ये तो —" उसने हाथ बढ़ाया, फिर लौटा लिया। "ये रामदीन का टोकन है। उसने मुझे दिखाया था एक बार, यही चारपाई पर बैठकर। कहा था — जिस दिन ये मेरे बेटे के हाथ में आए, समझ लेना मैंने अपनी बात पूरी कर दी।"
"कैसे पूरी?"
"ये गिनती का टोकन है, मन्नू।" उसने धीरे से कहा। "हर लकीर एक आदमी। रामदीन भवानी के हर उस आदमी को ढूँढ रहा था जिसने सुखिया को छुआ। हर लकीर के नाम के साथ कोई न कोई सबूत। जब तक सारी लकीरें पूरी न हों, हिसाब पूरा नहीं।"
"अब कितनी बाक़ी हैं?"
"तू गिन।"
मैंने टोकन पलटा। अठारह लकीरें। नीचे उन्नीसवीं अधूरी।
"उन्नीसवीं पर नाम नहीं है," मैंने कहा।
"क्योंकि उन्नीसवीं तेरे पापा के हाथ में नहीं पहुँची।" बीरा देवी ने उसकी तरफ़ देखा। "उन्नीसवीं का नाम मैं जानती हूँ। वो भवानी का अपना नाम है।"
आँगन में एक पल के लिए हवा भी रुक गई।
बंसी ने धीरे से कहा, "अगर वो नाम साबित हो जाए, तो भवानी —"
"भवानी ख़त्म।" बीरा देवी ने कहा। "पर साबित करने के लिए वो काग़ज़ चाहिए जो सुखिया ने छुपाए थे। और वो काग़ज़ कहाँ हैं, मुझे नहीं पता। सुखिया ने आख़िरी ख़त में सिर्फ़ ये लिखा — 'दीदी, जो चीज़ तेरे पास है, उसे मत छोड़। घड़ी का हिसाब बाक़ी है।'"
मैंने पर्ची जेब से निकाली। "यही लिखा था इस पर भी।"
बीरा देवी ने पर्ची देखी और फिर मेरी तरफ़ देखा। "रामदीन ने ये तुझे कब दिया?"
"उसने नहीं दिया। ये ख़ुद आई। जेब से।"
वो एक पल चुप रही। फिर बोली, "तो वो जानता था कि तू यहाँ आएगा।" उसने अपना आँचल ठीक किया। "मन्नू, एक बात सुन। तेरे पापा सिर्फ़ सुखिया को ढूँढते हुए नहीं मरे। उन्हें कोई ढूँढ रहा था।"
"कौन?"
"भवानी का आदमी। जो सुखिया को ले गया था। उसका नाम — बीरा नहीं, दूसरा था।" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "वो आदमी ज़िंदा है। और वो ही उन्नीसवीं लकीर है। उसका नाम है — ढेबर।"
मैंने नाम याद किया। ढेबर। कहीं सुना था।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, वो मिलिशिया का था। अदालत के बाहर वही खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता।"
मैं मुड़ा। गली के मोड़ पर वो आदमी अब नहीं था। पर उसकी जगह धूल में एक जोड़ी जूतों के निशान थे, सीधे बीरा देवी के दरवाज़े तक।
बीरा देवी ने देखा और उसका चेहरा पहली बार डर से बदला। "तू जल्दी निकल यहाँ से।" उसने हमें उठाया। "और सुन — मेरे पास जो सुखिया का आख़िरी ख़त है, वो ले जा। मैं अब इसे यहाँ नहीं रख सकती।"
वो अंदर गई और एक पुरानी मिट्टी की कुप्पी लेकर आई। उसे उलटा किया, अंदर से तह किया हुआ एक काग़ज़ निकाला। मुझे दिया। काग़ज़ पुराना था, पर स्याही साफ़।
ऊपर सिर्फ़ टूटी-फूटी हिंदी में कुछ लिखा था। नीचे एक आधा नक़्शा। और एक जगह का नाम — "लाल कोठी, पीछे का कुआँ।"
"लाल कोठी," बीरा देवी ने कहा, "भवानी का हवेली का पुराना नाम है। जो अब कोई नहीं बोलता।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। बीरा देवी ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ सूखी थी, पर मज़बूत।
"एक बात," उसने कहा। "मेरे भाँजे को तूने अदालत में खड़ा कराया। कल उसका हिसाब ज़्यादा नहीं बदला। पर आज तू यहाँ है। तेरे पापा ने जो छोड़ा था, वो तू उठा रहा है। अब मत रुक। भवानी डरेगा, और डरा हुआ आदमी ग़लती करता है। बस उस ग़लती का इंतज़ार कर।"
हम निकले। गली के मोड़ पर बंसी ने कहा, "मुझे सफ़ेद कुर्ते का आदमी ढूँढना है।"
"ढेबर," मैंने कहा। "उसका पता लगा। और लाल कोठी के पीछे का कुआँ — वहाँ क्या है।"
"और तू क्या करेगा?"
"घर जाकर पापा की डायरी देखूँगा। उन्होंने कुछ छोड़ा ज़रूर होगा।"
घर पहुँचा तो माँ आँगन में दाल चुन रही थी। मुझे देखकर बोली, "चाय ठंडी हो गई।"
"फिर बना देना," मैंने कहा और पापा की अलमारी की तरफ़ बढ़ा।
माँ ने मेरा रास्ता रोका। "कल रात तू सोया नहीं। मुझे पता है।" उसने मेरी आँखों में देखा। "कुछ है।"
"है।" मैंने कहा। "पर अभी बताऊँगा तो तू परेशान होगी।"
"मैं सात साल से परेशान हूँ, मन्नू।" उसने दाल छोड़ दी। "बता।"
मैंने पर्ची दिखाई। माँ ने उसे हाथ में लिया और उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे कोई पुराना ज़ख़्म खुल गया हो।
"बीरा ज़िंदा है," वो धीरे से बोली, "यही तो तेरे पापा कहते थे।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे लगा वो सिर्फ़ काग़ज़ों में ढूँढ रहे हैं। पर जब वो गए, मैंने सोचा वो सिर्फ़ उम्मीद लेकर गए थे।"
"तेरे पास पापा की कोई डायरी है?"
"है।" वो अंदर गई, और एक लोहे की संदूक से तीन पुरानी डायरियाँ लाईं। "ये मैंने छुपा दी थीं। भवानी का कोई आदमी छानने आया था उस रात। मैंने कहा — रामदीन का कुछ नहीं बचा।"
मैंने पहली डायरी खोली। पन्ने पीले थे। पापा की लिखाई छोटी, सीधी। कुछ पन्नों पर रेखाएँ खींची थीं। तीसरे पन्ने पर एक नाम घेरा हुआ था — "ढेबर — मिलिशिया। नाम बदलकर नए काग़ज़। भवानी ने बनवाए।"
माँ ने मेरा कंधा पकड़ा। "या तो तू ये छोड़ दे, मन्नू।"
"कैसे छोड़ूँ?"
"मैंने एक आदमी खोया है," उसने कहा। आवाज़ दबी थी। "तू दूसरा नहीं हो।" वो एक पल रुकी। "पर मुझे पता है कि अगर तू रुक गया, तो जो तेरे पापा ने शुरू किया, वो अधूरा रहेगा। और अधूरा काम तेरे ऊपर रहेगा, हमेशा।"
मैंने उसे देखा। "तो तू क्या कहेगी?"
वो मुस्कुराई, थोड़ी मजबूरी में। "मैं कहूँगी — ध्यान से चल। और रोज़ खाना खा।"
माँ रसोई में गई। मैं डायरियाँ लेकर चारपाई पर बैठा। तीसरी डायरी का आख़िरी पन्ना खोला। उस पर पापा की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन थी — "अगर मैं लौटूँ न, तो जो ढूँढे, उसे बताना — बीरा के पास रास्ता है।"
नीचे, एक अलग स्याही में, एक पर्ची चिपकी थी। मैंने उसे छुआ। वो चिपकी नहीं थी, बस अंदर रखी थी। उठाई तो उस पर तारीख़ थी — और यह तारीख़ पापा की मौत के बाद की थी।
मेरी साँस रुक गई।
किसी ने इसे बाद में रखा था। किसी ने डायरी खोली थी, बाद में।
मैंने बंसी को फ़ोन मिलाया। "डायरी में एक चीज़ मिली। तारीख़ पापा के बाद की है।"
बंसी चुप रहा, फिर बोला, "मतलब कोई डायरी तक पहुँचता है।"
"हाँ।"
"तो घर में कोई आता-जाता है, मन्नू। ध्यान से।"
मैंने फ़ोन रखा और संदूक की तरफ़ देखा। तीन डायरी थीं। चौथी की जगह ख़ाली थी — माँ ने तीन लाई थीं, पर पापा की लिखाई में ऊपर लिखा था — "हिसाब चार भाग में।"
एक डायरी गायब थी।
मैंने डायरी वापस संदूक में रखी, संदूक बंद किया, और चाबी जेब में रखी। दरवाज़े की तरफ़ देखा। खुला था।
बाहर आँगन में झाड़ू की आवाज़ आ रही थी। माँ। पर झाड़ू सुबह होती थी।
मैं बाहर गया। रीना झाड़ू लगा रही थी।
"तू क्यों?" मैंने पूछा।
"नींद नहीं आई।" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "भैया, तू सुबह से कहाँ था?"
"बीरा देवी के पास।"
उसका हाथ रुक गया। "मिली?"
"मिली।" मैंने कहा। "और रीना — अब तू मेरी बात ध्यान से सुन।" मैंने पर्ची दिखाई। "ये पापा की लिखाई है। इसका मतलब — बीरा ज़िंदा है। और इसका ये भी मतलब है कि जो लोग पापा के बारे में जानते थे, उनमें से कोई आज भी हमें देख रहा है।"
रीना ने झाड़ू रख दी। "त
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