The Token System – Chapter 617
"जब मैंने पूछा था कि सब ठीक है, और तूने कहा था — हाँ।" उसने मुड़कर देखा। आँखों में पानी था, पर गुस्सा ज़्यादा। "मुझे सच बता। भवानी से क्या चल रहा है?"
मैंने दीवार से टिककर साँस ली। "भवानी के पास हवेली का हिसाब है। मेरे पापा का नाम उस हिसाब में है। और जब तक वो हिसाब बराबर नहीं होगा, वो मेरे ज़रिए हर उस चीज़ पर हाथ डालेगा जो मेरी है — और तू भी उसमें है, रीना।"
"तो उसने रिश्ता तुड़वाया?"
"शायद। पर आज सुबह अदालत में उसका बेटा उसके ख़िलाफ़ गवाही दे रहा था। उस आदमी के पास अब वक़्त नहीं है, रीना। पर वो चाहेगा कि मैं उसके साथ समझौता करूँ — रिश्ते के बदले, पैसे के बदले।"
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "और तू क्या करेगा?"
"मैं समझौता नहीं करूँगा।"
वो एक पल चुप रही। फिर बोली, "ठीक है। फिर सुन। अब मेरी शादी का फ़ैसला मैं ख़ुद करूँगी। जल्दबाज़ी में नहीं। जो रिश्ता आए, उसे पहले सच का काग़ज़ दिखाऊँगी — और अगर वो काग़ज़ डर के मारे न पढ़े, तो शादी नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। वो मेरे गले लग गई।
"तेरे पापा भी ऐसे ही थे," माँ दरवाज़े से बोली। "अपनी बात पर अड़े रहते थे।" वो मुस्कुराई। "अच्छा किया। आज दाल बनाऊँगी, तू भी खा।"
रात को मैं चारपाई पर लेटा था। टोकन जेब में ठंडा था। मैंने उसे निकालकर देखा — अठारह लकीरें, "माफ़ी", "सुखिया काका", "रामदीन"। नीचे एक नई लकीर उभर रही थी, पर पूरी नहीं हुई थी।
मैंने उसे वापस जेब में रखा तो उँगली को कुछ छुआ। एक पतली पर्ची, जो सुबह नहीं थी। मैंने निकाली। उस पर चार शब्द थे — "घड़ी का हिसाब बाक़ी।" और नीचे एक पता — "बीरा देवी, पुरानी बस्ती, चौथा मोड़।"
मैं उठ बैठा। बीरा देवी। अमर की माँ। जिसे मरा हुआ बताया गया था।
मैंने पर्ची पलटी। पीछे पापा की लिखाई में चार शब्द थे — "बीरा ज़िंदा है, ढूँढ।"
मैंने पर्ची को दोनों हाथों में पकड़ा। चार शब्द। पापा की लिखाई। करीब से देखा तो स्याही की एक बूँद अभी सूखी नहीं थी।
मैंने उँगली उस पर फेरी। वो टोकन जेब में बर्फ़ की तरह ठंडा था, और यहाँ पर्ची पर स्याही गरम।
मैं उठा, चप्पल पहनी, और माँ के कमरे की तरफ़ देखा। रोशनी बुझ चुकी थी। मैं दरवाज़े तक गया, फिर रुका। इस वक़्त बीरा देवी को ढूँढने कहाँ जाता? पुरानी बस्ती, चौथा मोड़। वो इलाक़ा शहर के उस किनारे पर था जहाँ रात को कोई पूछने वाला नहीं।
सुबह पाँच बजे मैं उठा। बंसी की गाड़ी का हॉर्न नीचे बजा, एक लंबा, एक छोटा — हमारा इशारा।
मैंने पर्ची जेब में रखी और सीढ़ियों से उतरा। रास्ते में माँ ने आवाज़ दी, "चाय पीकर जा।"
"लौटकर पीऊँगा," मैंने कहा और दरवाज़ा खींच लिया।
बंसी ने गाड़ी चालू रखी थी। मैं बैठा, और उसने तुरंत गाड़ी बढ़ा दी।
"कहाँ?" उसने पूछा, आँखें सड़क पर।
"पुरानी बस्ती, चौथा मोड़।"
"क्यों?"
मैंने पर्ची उसकी तरफ़ बढ़ाई। उसने एक पल के लिए आँख हटाई, पढ़ा, फिर गाड़ी धीमी कर दी।
"मन्नू," उसने कहा, "ये पापा की लिखाई है।"
"मुझे पता है।"
"पर पापा तो सात साल पहले —"
"पता है। फिर भी।"
बंसी चुप हो गया। फिर बोला, "अगर ये किसी ने बनाई है, तो जिसने बनाई है वो हमें वहाँ बुला रहा है। जाल भी हो सकता है।"
"हो सकता है।"
"और अगर नहीं है, तो?" उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तो सवाल और भी बड़ा है।"
पुरानी बस्ती की सड़कें पतली थीं, और गड्ढों से भरी। गाड़ी को छोड़कर हम पैदल चले। चौथा मोड़ पर एक पुराना मंदिर था, उसके पीछे गलियाँ। दुकानें अभी नहीं खुली थीं। एक पान की दुकान पर बूढ़ा बैठा था।
मैंने पूछा, "बीरा देवी? इस गली में कहीं?"
बूढ़े ने पान चबाते हुए मुझे देखा। "बीरा देवी… वो जो सुखिया की बहन थी?"
मेरी साँस रुक गई। "सुखिया?"
"हाँ, वही सुखिया — जिसका लड़का अमर अब अदालत का काग़ज़ जुड़वा रहा था। बीरा उसकी बहन थी। पर बीरा तो बहुत पहले मर गई।"
"कब?"
"अरे, क्या पता। दस साल पहले होगी। बुखार से।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने कहा, "गली में कौन रहता है उसके घर में?"
"कोई नहीं। मकान बंद है।" बूढ़े ने मुँह बनाया। "पर कभी-कभी रोशनी दिखती है। लोग कहते हैं भूत है। मैं कहता हूँ कोई आता-जाता है।"
"तेरा दुकान यहाँ कब से है?" मैंने पूछा।
"तीस साल से।"
"तो तूने मेरे पापा को देखा होगा। सात साल पहले — रामदीन।"
बूढ़े का हाथ रुक गया। उसने पान थूका, फिर धीरे से बोला, "तू रामदीन का लड़का है?"
"हाँ।"
वो एक पल चुप रहा, फिर गली की तरफ़ इशारा किया। "तीसरा मकान, हरे दरवाज़े वाला। पर वहाँ अंधेरा है। कुछ नहीं मिलेगा।"
"मिले या न मिले, देख तो लें।"
मकान का दरवाज़ा हरा था, रंग उतरा हुआ। ताला लगा था, पर ताला नया — ज़ंग नहीं लगा था। बंसी ने छत की तरफ़ देखा और मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा, "कोई अंदर है। दीवार पर सूखता कपड़ा देख — सुबह का।"
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं।
फिर मैंने आवाज़ दी, "बीरा देवी? मैं रामदीन का बेटा हूँ।"
अंदर कुछ गिरा। बर्तन की आवाज़।
बंसी ने पीछे हटकर गली के मोड़ पर खड़े आदमी को देखा — पान वाला नहीं, दूसरा कोई, जो अचानक वहाँ खड़ा था। मोटा, सफ़ेद कुर्ता।
"मन्नू," बंसी ने धीरे से कहा, "कोई हमें देख रहा है।"
"देखने दे।"
दरवाज़ा खुला। एक बूढ़ी औरत खड़ी थी, सफ़ेद बाल, आँखें धँसी हुई। पर उन आँखों में वो डर नहीं था जो छुपने वाले की होती है। बस थकान थी।
"तू रामदीन का बेटा है?" उसने पूछा। आवाज़ सूखी, खुरदरी।
"हाँ।"
"मुझे पता था तू आएगा।" उसने दरवाज़े का पल्ला और खोला। "पर अंदर मत आ। ये घर किसी की नज़र में है। पीछे आँगन में आ, वहाँ दीवार है।"
हम पीछे गए। आँगन में एक टूटी चारपाई और एक मटका था। वो बैठ गई और हम खड़े रहे।
"तू अमर को अदालत ले गया," उसने कहा।
"तू कैसे जानती है?"
"शेखर मेरा भतीजा है। वो आया था रात को, बताने।" उसने अपनी गोद में हाथ रखे। "अमर मेरा भाँजा है। मेरी बहन सुखिया का लड़का।"
"सुखिया कहाँ है?"
बीरा देवी ने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा और एक लंबी साँस ली। "सुखिया को भवानी ने नौ साल पहले रख लिया था — कहकर कि वो हिसाब की किताबें सँभालेगी। पर सुखिया ने कुछ देख लिया था। उसी रात वो गायब हो गई। लोगों से कहा गया — बुखार से मर गई। मुझे शव भी नहीं दिखाया।"
"तू तो यहाँ है। उसने तुझे क्यों नहीं —"
"मुझे वो मरा हुआ मानता है।" उसने कहा। "और मैंने उसी दिन से यही चाहा। जिस दिन मैंने सुखिया का आख़िरी ख़त पढ़ा, मैंने शहर में अपना नाम मरवा दिया। तीस साल का दुकानदार, पड़ोसी, डॉक्टर — सब कहते हैं बीरा मर गई। भवानी के आदमी भी यही मानते हैं।"
"और तेरा भाँजा? उसे क्यों नहीं बचाया?"
उसका चेहरा सख़्त हो गया। "अमर मेरे पास आया था, डरा हुआ। पर वो बदला चाहता था, सिर्फ़ बचना नहीं। मैंने उसे रोका। कहा — भवानी के सामने खड़ा मत हो, वो तुझे कुचल देगा। पर वो नहीं माना।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और तेरे पापा ने उसे वो हिम्मत दी।"
मैं खड़ा रह गया।
"पापा को तू जानती थी?"
"जानती थी?" वो हँसी, सूखी हँसी। "रामदीन मेरे घर आता था, सुखिया की खोज में। पाँच साल वो खोजता रहा। रस्सी से बाँधे काग़ज़ों का पुलिंदा लेकर आता, मेरी चारपाई पर बैठकर लिखता — 'आज फिर मिला नहीं। पर मिलेगा।'"
"तो पापा जानते थे सुखिया —"
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