The Token System – Chapter 616
"मैं तो कभी किसी और तरह बैठी ही नहीं।" उसने कहा।
हम हवेली से निकले। गली में खबर फैल चुकी थी — हवेली की दीवार से कुछ निकला है। लोग फाटक पर खड़े थे। शेखर बाबू ने पोथी सीने से लगाई, बंसी ने नक्शा जेब में रखा, और मैंने टोकन जेब से निकालकर देखा। अठारह लकीरें, ऊपर "माफ़ी", "सुखिया काका", "रामदीन"।
अदालत साफ़ दिख रही थी, सामने वाले मोड़ पर।
दोपहर तक हमने अर्ज़ी दायर की, शेखर बाबू ने पोथी जमा की, भवानी ने बर्तन खोलकर सूची अदालत के सामने रखी, और बंसी ने अपनी गवाही दे दी। भवानी ने जब अपनी बात कही, तो सिर्फ़ एक लाइन बोली — "मैंने दस साल हवेली को अकेले रखा, पर उसका हिसाब अकेले नहीं रखा। अब जो काग़ज़ बोलेंगे, वही मानूँगी।" और वो बैठ गई।
शाम को हम लौटे। मैं थका थ
॥
मैं थका था, पर नींद कहाँ थी। सुबह चार बजे उठकर बैठा और चाय की केतली चूल्हे पर रख दी। बंसी की गाड़ी छह बजे आई। उसके साथ रणविजय बैठा था, सफ़ेद कुर्ता, बाल बिखरे, हाथ में वही पुरानी लाठी। सुमन सात बजे पहुँची, शेखर बाबू आठ बजे — पोथी कपड़े में लपेटकर सीने से चिपकाए।
आठ बजकर चालीस मिनट पर हम अदालत के आँगन में थे। भवानी का वकील पहले से खड़ा था, हाथ में सफ़ेद काग़ज़ों की गड्डी, और उसके पीछे भवानी के मुंशी हरनाम सिर झुकाए बैठे थे।
वकील साहब ने वही राग अलापना शुरू किया — पोथी मनगढ़ंत है, बर्तन किसी ने रखवा दिया, सूची में नाम गढ़े गए हैं। नायब तहसीलदार ने पोथी अपने सामने रखी और पन्ने पलटने लगे।
"यहाँ आख़िरी पन्ने पर तेईस हज़ार की एंट्री है," वकील बोला, "और हस्ताक्षर मनोहर के हैं। जिस काग़ज़ पर आरोपी का ही हस्ताक्षर हो, वो काग़ज़ सबूत कैसे हुआ?"
मैं खड़ा हुआ। "सर, वो हस्ताक्षर मेरा नहीं है। मैं उस दिन उस काग़ज़ को छू भी नहीं सका था। और ये देखिए —" मैंने माँ की दी चाँदी की अंगूठी नायब के सामने रखी, "— भवानी की मुहर का असली साँचा यही है। मुहर इसी से बनी। मुहर के तीन हिस्से हैं, तीनों अलग-अलग जगह। जो मुहर साँचे से बनी हो, उसे लगाने वाला भी वही होगा।"
वकील झपटा। "ये अंगूठी हम पर लगाने के लिए गढ़ी गई है!"
शेखर बाबू ने पोथी खोली और उँगली उस पन्ने पर रखी जहाँ लिखा था — "जो इस हिसाब को पूरा करेगा, वो हवेली का मालिक नहीं, हिसाब का रखवाला होगा।"
"नायब साहब," शेखर बाबू ने धीमी आवाज़ में कहा, "इस पोथी की स्याही जाँची जा सकती है। और मैंने सुबह ही तहसील के रिकॉर्ड से उन्नीस सौ अठहत्तर का रजिस्टर निकलवा लिया है, जिसमें चौथा हिस्सा सुखदेव के नाम दर्ज है।"
नायब ने दोनों काग़ज़ पास-पास रखे और चश्मा ठीक किया। उनकी उँगली काँप रही थी। "वकील साहब," उन्होंने कहा, "आपका सवाल है कि ये काग़ज़ मनगढ़ंत है। पर मेरे सामने तीन काग़ज़ हैं — पोथी, रजिस्टर और रसोई के बर्तन की सूची — और तीनों पर एक ही मुहर का निशान है। अदालत इसे सबूत मानती है।"
वकील ने एक बार अपनी काग़ज़ों की तरफ़ देखा, फिर भवानी के मुंशी की तरफ़। हरनाम ने सिर झुका लिया। वकील ने काग़ज़ समेटे और बैठ गया। कमरे में सन्नाटा था, पर वो सन्नाटा नहीं था — लोग साँस रोककर सुन रहे थे।
तभी रणविजय उठा। उसने अपनी लाठी कोने में टिकाई और नायब के सामने खड़ा हो गया।
"मैं भवानी सिंह का बेटा हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी। "और मैं अपने बाप के ख़िलाफ़ गवाही देने आया हूँ।"
आँगन में जो बैठे थे, उनमें हलचल हुई। कोई खाँसा, कोई उठ बैठा।
"बीस साल से मैं उसके काग़ज़ों पर दस्तख़त करता आया, बिना पढ़े," रणविजय ने कहा। "हवेली का काग़ज़, ज़मीन का काग़ज़, मरीज़ों के फ़ॉर्म — सब पर मेरा नाम, पर क़लम की स्याही मेरी नहीं। आज जो पोथी सामने है, उसका आख़िरी पन्ना भी उसने मुझसे लिखवाया था — तेईस हज़ार, सुखदेव के नाम, और नीचे मनोहर का जाली हस्ताक्षर। मैंने उस रोज़ क़लम रखकर कहा था कि ये ग़लत है, पर उसने कहा — 'बेटा, हिसाब में नाम नहीं, नतीजा देखा जाता है।'"
उसने रुककर साँस ली। "सुखिया काका का बेटा जो अब ज़िंदा है — रामदीन — वो मेरे बाप का साझेदार था। हवेली बनाने वाला मिस्त्री। और उसकी मौत का काग़ज़ 'हादसा' बनाकर मेरे नाम से भी एक जगह दस्तख़त लिए गए थे। मैं उस वक़्त ग्यारह साल का था। मेरा दस्तख़त कैसे हुआ, ये आज तक मुझे नहीं पता।"
अब भवानी उठी। अपने आदमियों के बीच से। पर वो अंदर नहीं आई — दरवाज़े पर खड़ी रही, जैसे आँगन की धूप से बचकर साये में खड़ी हो।
"नायब साहब," उसने कहा, "मेरा बेटा जो कह रहा है, वो सच है। पर आधा सच है। उसने बीस साल मेरे साथ काम किया और एक दिन नहीं पूछा कि ये क्यों हो रहा है।"
रणविजय मुड़ा। "पूछा था, बाप। एक बार पूछा था — जब छोटू की माँ का काग़ज़ मिटाया गया था। तुमने कहा था — 'हिसाब बड़ा होता है, आदमी छोटा।'"
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। दो पल। फिर वो आँगन में आई और कुर्सी पर बैठ गई। मुँह से एक शब्द नहीं निकला।
नायब ने काग़ज़ पर मुहर लगाई और सुनवाई की अगली तारीख़ बताई। बाहर आते ही अख़बार वाले घेर लेते, पर रणविजय के मुँह से कुछ नहीं निकला। वो सीधा गाड़ी में बैठा और चला गया। भवानी अपने आदमियों के साथ दूसरी तरफ़ से निकली, बिना किसी से बोले। पर जाते-जाते उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो अकड़ नहीं थी — थकान थी।
मैं अभी सीढ़ियाँ उतर ही रहा था कि जेब में फ़ोन बजा। रीना का नंबर।
"भैया…" उसकी आवाज़ दबी थी, "रामावत जी का फ़ोन आया था। उन्होंने कहा — रिश्ता नहीं होगा।"
मैं सीढ़ी पर रुक गया। "क्यों? क्या कहा उन्होंने?"
"कहा — हमारे घर की लड़की की तरफ़ से कोई दबाव नहीं है, पर हम इस रिश्ते में नहीं जा सकते। आकाश ने भी बात नहीं की। बस फ़ोन रख दिया।"
मैंने आँखें बंद कीं। "तू ठीक है?"
"हूँ।" उसने कहा। "माँ से मत कहना अभी।"
"ना। मैं आ रहा हूँ, दस मिनट में।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"रामावत जी ने रिश्ता वापस ले लिया।"
बंसी ने मुँह बनाया। "भवानी का कोई आदमी गया होगा।"
"पता नहीं"। मैंने कहा। "पर रीना कह रही है कि किसी ने दबाव नहीं डाला। उन्होंने ख़ुद मना किया।"
सुमन ने कहा, "ये भवानी का तरीक़ा है। तलवार नहीं दिखाता, बस म्यान का आवाज़ भेज देता है।"
घर पहुँचा तो रीना चूल्हे के पास बैठी थी, आँच पर हाथ सेंकती हुई। मौसम गर्म था, फिर भी उसे ठंड लग रही थी। माँ बैठी चाय पी रही थी, चेहरे पर कुछ नहीं।
"बैठ," माँ ने कहा। "चाय पी।"
"माँ, रीना का रिश्ता —"
"सुन लिया।" माँ ने कप मेरी तरफ़ सरकाया। "अब मेरी सुनो। जो रिश्ता सच पर न टिके, वो शादी नहीं होती। वो सौदा होता है। और मेरी बेटी सौदा नहीं है।"
रीना ने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"मैंने तेरे पापा से शादी की थी, जब उनके पास कुछ नहीं था," माँ ने कहा। "पर उनके पास एक बात थी — जो उन्होंने कहा, वो करते थे। वो काग़ज़ों पर नहीं, ज़ुबान पर चलते थे। आज वो नहीं हैं, और मैं तेरी शादी किसी ऐसे आदमी से नहीं करूँगी जिसका घर हिसाब से चलता हो, दिल से नहीं।"
रीना उठी और बाहर आँगन में चली गई। मैं पीछे गया। वो दीवार से टिककर खड़ी थी।
"भैया," उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे, "तू मुझसे झूठ क्यों बोला?"
"कब?"
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