The Token System – Chapter 614
पुराना आदमी, सफ़ेद दाढ़ी, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में छोटी पीतल की डिबिया। वो उठा और मेरी तरफ़ बढ़ा।
"तेरा नाम किशनचंद का बेटा है ना?" उसने पूछा।
"कौन हो तुम?"
"मैं वही हूँ जिसका नाम तेरे टोकन पर अभी उभरा।"
मैं रुक गया। पीछे कोई नहीं था। गली खाली थी।
"दादा?" मैंने कहा — आवाज़ फटी हुई निकली।
आदमी हँसा। "नहीं। मैं सुखिया काका का बेटा हूँ — चौथा हिस्सा, जो किसी काग़ज़ पर नहीं। नींव में जिसका नाम दबा है — और जिसे खोदने की ज़रूरत अब तेरे सिवाय किसी को नहीं।"
मैंने पीतल की डिबिया देखी। उस पर उल्टा कोना-चिह्न खुदा था — वही जो मेरे टोकन के टूटे कोने पर था।
"अंदर क्या है?" मैंने पूछा।
आदमी ने डिबिया मेरे हाथ में रख दी। "हवेली की नींव का पता।" उसने कहा। "पर खोलने से पहले एक बात याद रख — जो नींव खोदेगा, वो हिसाब का हिस्सा बनेगा। क्या तू तैयार है?"
मैंने डिबिया उठाई। "मैं अठारह लकीरों का हिसाब चुका रहा हूँ। एक और लकीर जुड़ेगी तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा।"
आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो चमक भी रहा था और नम भी।
"तेरे दादा भी यही बोले थे।" उसने कहा। "और उस दिन उन्होंने वही किया जो तू कर रहा है — हिसाब अपने हाथ में लिया।"
"तुम कहाँ रहते हो?" मैंने पूछा। "कहाँ मिलोगे?"
"मैं खुद नहीं मिलूँगा।" उसने कहा। "पर डिबिया खोलने पर जो काग़ज़ निकलेगा, उस पर एक नाम लिखा होगा। वो नाम ढूँढ लेना। वो आदमी नींव खोदने का हक़ रखता है। बाकी सब तेरे हाथ में।"
वो मुड़ा। दीये के पास से गुज़रा, और दीया बुझ गया। जब तक मैंने दोबारा देखा, गली खाली थी। सिर्फ़ दीये की कालिख बची थी।
मैं घर लौटा। माँ जाग रही थीं, चूल्हे पर चाय रखी थी। मैंने डिबिया उनके सामने रख दी।
"ये सुबह किसी ने दिया।" मैंने कहा।
माँ ने डिबिया उठाई, पलटी, और उनके हाथ काँपने लगे।
"ये डिबिया।" उन्होंने कहा। "मैंने इसे पहले देखा है।"
"कब?"
"शादी के दिन।" माँ ने कहा। "तेरे पापा की जेब में थी। उसने कहा था — ये नींव की चाबी है। जिस दिन खुलेगी, हवेली का सच खुलेगा।"
"तो पापा ने क्यों नहीं खोली?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि उन्हें डर था कि खुलने पर जो नाम निकलेगा, वो परिवार का होगा।"
मैंने डिबिया खोली। अंदर एक पीला काग़ज़ मुड़ा था, और उस पर हल्की स्याही में एक नाम — "रामदीन।"
मैंने काग़ज़ माँ को दिखाया। माँ ने पढ़ा और उनकी आँखें बंद हो गईं।
"रामदीन।" उन्होंने कहा। "हवेली का पुराना मिस्त्री। जो दीवार बनाता था। जो नींव रखता था। और जो — काग़ज़ के मुताबिक़ — मरा हुआ है।"
"मरा हुआ?"
"दस साल से।" माँ ने कहा। "भवानी ने उसका नाम काग़ज़ों से भी मिटाया — पर टोकन ने आज उसे फिर ज़िंदा कर दिया।"
मैंने टोकन जेब से निकाला। अठारह लकीरें। ऊपर "माफ़ी" और "सुखिया काका" — और अब काग़ज़ पर रामदीन। मैंने बंसी को फ़ोन किया। उसने पहली रिंग में उठाया। "मन्नू, सुबह चार बजे हैं।"
"बंसी, रामदीन कहाँ रहता था?"
"कौन रामदीन?"
"हवेली का मिस्त्री। जो दीवार बनाता था।"
बंसी चुप हुआ। फिर काँपती आवाज़ में बोला, "मन्नू, रामदीन — मेरे ससुर का भाई था।"
मैंने फ़ोन सीने से लगा लिया। "तो तेरे ससुर ने मुहर उससे ली थी?"
"नहीं।" बंसी ने कहा। "उल्टा। रामदीन ने मेरे ससुर को दी थी। रामदीन ने कहा था — जब तक ये मुहर किसी के हाथ में नहीं, हवेली की नींव खुद नहीं बोलेगी।"
"तो नींव क्या है?"
"रामदीन के पास एक नक्शा था।" बंसी ने कहा। "उसने मेरे ससुर को दिया था। मेरे ससुर ने मुझे दिया। वो नक्शा मेरे पास है।"
"तो अभी लेकर आ।"
"कहाँ?"
"हवेली। सुबह होते ही हम वहाँ होंगे। सूरज निकलेगा और हम नींव खोलेंगे। अब और नहीं रुकेगा।"
मैंने फ़ोन काटा। मैंने सुमन को फ़ोन किया। "सुमन, सुबह छह बजे हवेली। रामदीन का नाम मिला।"
"कौन रामदीन?"
"हवेली का मिस्त्री। जो चौथे हिस्से का हक़दार था।"
"तो मैं शेखर बाबू को बुला लूँ? वो पोथी लाएँगे।"
"हाँ। और एक बात। अदालत कितने बजे खुलेगी?"
"दस बजे।"
"तो नौ बजे तक नींव की बात पूरी करनी है।"
मैंने फ़ोन रखा। बाहर आकाश हल्का हो रहा था। माँ ने चाय का कप मेरी तरफ़ सरका दिया।
"जाना ज़रूरी है?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"तो ये ले।" माँ ने मेरी जेब में एक छोटी पोटली डाल दी। "तेरे पापा ने दी थी। कहा था — जिस दिन नींव खुले, ये उसी दिन देना।"
मैंने पोटली खोली। अंदर एक छोटी पीतल की कील थी, जिस पर उलटा कोना-चिह्न खुदा था — वही जो चाबी और टोकन पर था।
"ये किसकी है?"
"रामदीन की।" माँ ने कहा। "उसने तेरे पापा को दी थी। कहा था — जिस दिन नींव खुले, ये कील खुद रास्ता दिखाएगी।"
मैंने कील जेब में रखी और चाय एक साँस में पी गया। माँ चूल्हे के पास बैठी रहीं, आँच कम करती रहीं, जैसे कुछ कहना चाहती थीं पर कह नहीं रही थीं।
"कुछ और?" मैंने पूछा।
"बंसी से मिल लेना।" उन्होंने कहा। "पर बेटा, सुन ले। उस आदमी ने हमारे साथ जो किया, वो कम नहीं था। माँ है तो नाराज़गी भी है। माफ़ करना और भूल जाना, दोनों अलग बातें हैं।"
"मुझे पता है।" मैंने कहा। "पर माफ़ी का पहला हक़ उसका नहीं, हमारा है।"
माँ ने मुझे देखा, फिर हल्का सिर हिलाया।
मैं बाहर निकला। गली में ठंडी हवा थी और एक तरफ़ कुत्ता भौंक रहा था। मैंने बंसी को फ़ोन मिलाया।
"निकल रहा हूँ।" उसने कहा। "पर मन्नू, एक बात साफ़ कर लेता हूँ। मैं नक्शा लेकर आ रहा हूँ, पर जब नींव खुलेगी, जो भी निकलेगा, वो हवेली का होगा। मेरा नहीं, तेरा नहीं।"
"मुझे यही चाहिए।" मैंने कहा।
"तो ठीक है।" वो रुका, फिर जोड़ा। "और मन्नू, अगर अदालत में मेरी बात सुनकर भवानी कुछ बोले, तो मैं पीछे नहीं हटूँगा। साफ़ कह रहा हूँ, आज से पहले मैं जो था, वो नहीं रहूँगा।"
"सुनकर अच्छा लगा।" मैंने कहा।
"अच्छा लगने की बात नहीं है।" उसने कहा। "ये डर की बात है। मुझे लगता है मैं आज अपना और ज़्यादा नुकसान कर बैठूँगा।"
"तो कर ले। चुकाना इसी को कहते हैं।"
वो हँसा, पहली बार। छोटी, सूखी हँसी। "तू अजीब आदमी है, मन्नू। दस साल पहले तेरा बाप मुझे डाँटता था। अब तू डाँट रहा है।"
"डाँट नहीं रहा। बस जगह बता रहा हूँ।"
फ़ोन कटा। मैंने सुमन को मिलाया।
"शेखर बाबू आ रहे हैं।" उसने कहा। "पोथी लेकर। पर मन्नू, एक दिक्कत है। भवानी को खबर लग गई कि हवेली पर कुछ होने वाला है। उसने दो गुंडे बुला रखे हैं। बोली है — हवेली का दरवाज़ा बंद रहेगा।"
"कब से?"
"अभी से। कुछ लोग दरवाज़े पर बैठे हैं।"
मैं रुक गया। सामने मंदिर की घंटी बज रही थी। मैंने सोचा, फिर पूछा, "दरवाज़ा बंद है या पूरी हवेली?"
"दरवाज़ा। बाकी हवेली खुली है, आगे-पीछे के रास्ते से।"
"तो ढूँढ लो पिछला रास्ता। शेखर बाबू को वहीं से लाओ।"
"पर वो सरकारी बंदा है, मन्नू। पीछे के दरवाज़े से घुसाना ठीक लगेगा?"
"अदालत में हिसाब देते वक़्त कोई किसी के पीछे से नहीं आता।" मैंने कहा। "पर यहाँ किसी को मारना नहीं है। गली में खड़े लोगों को अंदर नहीं आने देना, बस। शेखर बाबू आम रास्ते से आएँगे। मैं दरवाज़े पर मिलूँगा।"
"तू अकेला जाएगा?"
"तू साथ है।" मैंने कहा। "माँ ने कील दी है, तू पोथी लेकर आ रहा है, बंसी नक्शा ला रहा है। अब हम चार हैं। भवानी के दो गुंडे क्या बिगाड़ लेंगे।"
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