The Token System612 / 1154

The Token System – Chapter 612

7 min read November 6, 2026

मेरे हाथ रुक गए। "क्यों बुलाएगा? उसे तो पता है कि रणविजय गवाही देने को तैयार है।"

"तो यही तो।" बंसी ने कहा। "वो उसे डराएगा। या — उसे पहले पहुँचाकर अपनी बात कहेगा।"

मैंने चाबी और पोथी का पन्ना दोनों जेब में डाले और उठा। "चलो। रास्ते में सोचेंगे।"

गाड़ी में बैठते वक़्त शेखर बाबू ने पीछे से कहा, "एक बात है। उस अर्ज़ी के साथ जो नया काग़ज़ लगा है — उस पर मन्नू के पापा के दस्तख़त हैं, ये तो तय है। पर मैंने उसे ध्यान से देखा। तारीख़ नहीं थी।"

"तारीख़ नहीं?" मैंने पलटकर देखा।

"न कोई तारीख़, न महीना, न साल। बस काग़ज़ पर लिखा था — 'मैं किशनचंद हवेली की हर बात से सहमत हूँ।' और नीचे दस्तख़त।"

बंसी ने गाड़ी धीमी की। "बिना तारीख़ का काग़ज़ कोर्ट में क्या चलेगा?"

"चलता है।" शेखर बाबू ने कहा। "अगर तारीख़ की जगह कोई और चीज़ हो। और उसमें गवाह का नाम हो। मुझे लगता है अर्ज़ी के साथ उन्होंने एक गवाह का नाम भी लगाया है।"

"किसका?"

"यही तो।" शेखर बाबू ने खिड़की से बाहर देखा। "अभी नाम नहीं दिखा, बस हस्ताक्षर का आधा हिस्सा दिखा — 'रा' से शुरू होता है।"

"रामदीन।" मैंने कहा।

"या राघव।" सुमन ने कहा।

गली से बाहर निकलकर बंसी ने गाड़ी सीधे मुख्य सड़क पर डाली। मैं पीछे बैठा था और टोकन मेरी जेब में था। उसने आवाज़ नहीं दी। न ठंडा हुआ, न गरम। जैसे वो भी इस सुनवाई का इंतज़ार कर रहा हो।

तहसील का गेट दूर से दिख गया। उस पर भीड़ थी — अख़बार वाले, दो पुलिस की गाड़ियाँ, और आम लोग। बंसी ने गाड़ी पीछे की तरफ़ मोड़ी और एक चाय की दुकान के सामने रोकी।

"सामने से नहीं जाएँगे।" उसने कहा। "पिछले दरवाज़े से।"

हम पिछली गली से होकर तहसील के अंदर घुसे। रास्ते में फ़तेह मिला, चपरासी, जो दौड़ता हुआ आ रहा था।

"मन्नू भाई!" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "भवानी का वकील आधा घंटे से आँगन में बैठा है। और — और अंदर कमरे में कोई है जो आपका नाम लेकर बुला रहा था।"

"कौन?"

"वो बूढ़ा जो रामदीन के साथ आया था।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "रामदीन ख़ुद आया है?"

"लगता है।" फ़तेह ने कहा।

हम सीढ़ियों से ऊपर गए। आँगन के सामने वाले कमरे में भवानी का वकील बैठा था — सूट वाला, चश्मा, सामने फाइलों का ढेर। उसने हमें देखा और काग़ज़ ऊपर उठाकर हवा में हिलाया।

"ये क्या है?" उसने कहा। "ये काग़ज़ कोर्ट में पेश नहीं हो सकता। पुरानी बही, फटे पन्ने, कोई मुहर नहीं, कोई रजिस्ट्री नंबर नहीं।"

मैंने अपनी जेब से पोथी का फटा पन्ना निकाला और उसकी मेज़ पर रख दिया। "इस पर उल्टा कोना-चिह्न है।" मैंने कहा। "और इस पर तीसरे का हाथ है। जिसकी आप बात कर रहे हैं।"

वकील ने पन्ना देखा। उसका चेहरा वैसा ही रहा, पर उसने फाइल ऊपर कर ली जैसे पन्ना न देखा हो।

"ये—" वो कुछ कहने ही वाला था कि दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई।

"मैं देख सकता हूँ?"

सब पलटे। दरवाज़े पर भवानी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, वही सूखा चेहरा, पर आज कुछ अलग था — उसके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था, कोई फाइल नहीं, बस ख़ाली हाथ। वो अंदर आया और सीधे मेज़ के पास पहुँचा। वकील उठ खड़ा हुआ।

"साहब, आपको यहाँ नहीं—"

"मुझे पता है मुझे कहाँ होना चाहिए।" भवानी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो हमेशा रहती थी। उसने पन्ना उठाया और देर तक देखा। "ये वही पन्ना है।"

"साहब—"

"मैं अपनी अर्ज़ी वापस लेता हूँ।" भवानी ने कहा।

कमरे में सन्नाटा छा गया। वकील का मुँह खुला रह गया। शेखर बाबू ने चश्मा उतार लिया जैसे साफ़ देखना चाहते हों।

"क्या?" वकील ने कहा।

"मैंने कहा, अर्ज़ी वापस।" भवानी ने पन्ना मेज़ पर रख दिया। "और नीलामी से भी मैं हमेशा के लिए पीछे हटता हूँ। हवेली पर मेरा कोई दावा नहीं रहा।"

"पर साहब, आपने ख़ुद कहा था—"

"मैंने ख़ुद बहुत कुछ कहा था।" भवानी ने कहा, और पहली बार मेरी तरफ़ देखा। "अब कुछ नहीं कहता।"

वो मेरे पास आया। दो क़दम। उसने आवाज़ नीची की, इतनी नीची कि बस मैं सुन सकूँ।

"ये मैंने अपने बेटे की खातिर किया है, अपनी खातिर नहीं।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसमें वो धुआँ नहीं था जो हवेली के आँगन में था।

"आपका बेटा मेरे पास है।" मैंने कहा।

"मुझे पता है।" भवानी ने कहा। "और मुझे ये भी पता है कि उसने तुम्हें पोथी दिखाई। उसने मुझे फ़ोन किया था — रात में।"

मैं चुप रहा।

"तुमने उससे कहा कि वो गवाही दे।" भवानी ने कहा। "मैं नहीं रोकूँगा।"

मैंने जेब से पोथी का वो आधा जला पन्ना निकाला और उसके सामने रखा। "अब ये क्या है?"

भवानी ने देखा। उसने हाथ बढ़ाया, पर छुआ नहीं। "तीसरे का।" उसने कहा।

"तीसरा कौन है?"

भवानी ने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने कभी नहीं देखा — थकान।

"मैं अपने हिस्से का हिसाब पूरा करूँगा।" उसने कहा। "पर उसके लिए मुझे तुम्हारे हाथ की ज़रूरत है।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारे हाथ में वो है जो मेरे हाथ में नहीं।" उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ टोकन था। "तीसरा टोकन।"

मैंने सिर हिलाया। "नहीं।"

"मैंने सोचा था तुम यही कहोगे।" भवानी ने कहा, और उसके होंठों पर कुछ ऐसा आया जो हँसी नहीं थी, पर हँसी से दूर भी नहीं।

वो पलटा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। वकील उसके पीछे भागा, कुछ बुदबुदाता हुआ। भवानी ने दरवाज़े पर रुककर कंधे के ऊपर से कहा, "एक बात सुन।"

मैंने सुना।

"तेरे हाथ में जो तीसरे टोकन की मुहर है, वो असल में किसकी है, ये तूने कभी सोचा?"

वो चला गया। दरवाज़ा खुला रह गया। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "वो क्या कह गया?"

"मुझे नहीं पता।"

पर मुझे पता था। या कम से कम, मुझे लग रहा था कि मुझे पता होना चाहिए था। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और चाबी निकाली — अभय की चाबी, उलटे कोना-चिह्न वाली। भवानी की बात उस चाबी से जुड़ी थी।

सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। "वो जा रहा है। तहसील से बाहर।"

मैं खिड़की तक गया। भवानी अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहा था। गाड़ी का दरवाज़ा खुला था। वो बैठने ही वाला था कि मैंने खिड़की खोली और चिल्लाया, "ठाकुर साहब!"

वो रुका। पलटा।

"वो नाम," मैंने कहा, "तीसरे का नाम — क्या वो मेरे पापा के नाम के साथ जुड़ा है?"

भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर। फिर उसने सिर हिलाया — ऊपर-नीचे, बस एक बार। और गाड़ी में बैठ गया।

गाड़ी चली गई। मैं खिड़की पर खड़ा रहा, हाथ में चाबी। पीछे से बंसी ने कहा, "मन्नू, वो अर्ज़ी वापस ले गया मतलब अब सुनवाई—"

"सुनवाई नहीं होगी।" शेखर बाबू ने कहा, जो गेट तक जाकर लौटे थे। "वकील वापस जा रहा है। काग़ज़ उठा रहा है।"

मैंने मुड़कर देखा। "तो हवेली—"

"हवेली किसी की नहीं।" सुमन ने कहा। "कम से कम आज नहीं।"

माँ गाड़ी में बैठी थीं। उन्होंने पीछे से दरवाज़ा खोला। "अब घर चलो।"

"माँ, मुझे कुछ देखना है।"

"क्या?"

मैंने चाबी उठाई। "ये चाबी किसकी है।"

मैं सीधा हवेली पहुँचा। बंसी और सुमन साथ थे। शेखर बाबू भी आए। मैंने उत्तर वाली दीवार के नीचे वाला पत्थर हटाया और अंदर गया। वो कमरा वैसा ही था — जंग लगी तिजोरी, पोथी की जगह खाली, और दीवार पर वो तीन नाम।

मैंने अभय की चाबी उस तिजोरी में लगाई। ताला घूम गया। मैंने दरवाज़ा खींचा।

अंदर कोई काग़ज़ नहीं था। बस एक पीतल की डिबिया थी, और उस डिबिया में एक और चाबी — छोटी, तीन दाँते वाली, जिस पर उल्टा कोना-चिह्न था।

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