The Token System – Chapter 52
"पिता जी के पास जो टोकन है, वो… वो मेरे हाथ से होकर आया है। एक बार। मैंने उसे दीवार से निकलते देखा है। और उस दिन मैंने उसे छुआ था। ठंडा था। बर्फ़ जैसा। और उस पर एक लकीर उभरी थी — 'विक्रम का हिसाब बाकी।' मैंने पिता जी से कुछ नहीं कहा। वो नहीं जानते कि मैंने उसे छुआ था।"
मेरी जेब में मेरा टोकन ठंडा हो गया। ऐसा ठंडा जैसे किसी ने उसे छू लिया हो।
मैंने उसे निकाला। हाथ में रखा। नई लकीर उभर रही थी, अक्षर आने में जैसे ज़ोर लग रहा था।
"विक्रम का हिसाब…" मैंने पढ़ा, "दोनों टोकन के बीच।"
राजेंद्र ने झुककर देखा। "इसका क्या मतलब?"
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। "पहले कभी ऐसी लकीर नहीं आई।"
विक्रम ने धीरे से कहा, "पिता जी का टोकन… वो मुझे सौंपना चाहते थे। आज रात। कहते थे — मेरा हिसाब भारी हो गया है, अब तेरी बारी है।"
मैं कुर्सी पर बैठ गया। सोचा, ये क्या जाल है। एक टोकन मेरे पास, दूसरा भवानी के पास, और उसका बेटा बीच में खड़ा, जिसके हाथ में कभी एक आया, तो कभी दूसरा।
राजेंद्र ने विक्रम की तरफ़ देखा। "तुम्हारे पास जो ये नक्शा है, ये मुझे दो।"
विक्रम ने काग़ज़ राजेंद्र की मेज़ पर रख दिया। "पर एक बात कह दूँ, सर। माँ से कोई ज़बरदस्ती नहीं। अगर आज रात हवेली में ज़रा भी गड़बड़ हुई, तो मेरी गवाही वापस।"
राजेंद्र कुछ सोचकर बोले, "ठीक है। तुम मेरे साथ रहोगे। मन्नू, रीना और बंसी अंदर जाएँगे। बाकी मैं देख लूँगा।"
विक्रम उठा। दरवाज़े तक गया, फिर पलटा। उसने मेरी तरफ़ देखा और वो बात कही जो कमरे में सबसे ज़्यादा देर तक गूँजती रही, "मन्नू भैया, पिता जी आपसे डरते हैं। और भवानी सिंह जिससे डरता है, वो काग़ज़ से नहीं, हिसाब से डरता है। आपके पास जो है, वो मेरे पिता के पास भी है। पर आपका हिसाब साफ़ है। इसीलिए वो हार जाएँगे।"
वो बाहर चला गया, राजेंद्र के सिपाही के साथ।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, अब?"
मैंने टोकन जेब में रखा। "अब वो कमरा। आज रात। और इस बार माँ भी साथ चलेगी, क्योंकि भवानी ने ख़ुद उसे बुलाया है।"
मैंने टोकन जेब में रखा। "अब वो कमरा। आज रात। और इस बार माँ भी साथ चलेगी, क्योंकि भवानी ने ख़ुद उसे बुलाया है।"
रीना ने हाथ छोड़ा और सीधी खड़ी हो गई। "माँ को हम बीच में क्यों ला रहे हैं? वो पहले ही बीमार हैं।"
"क्योंकि भवानी ने उन्हें ख़ुद बुलाया है।" मैंने अलमारी से अपनी जैकेट निकाली। "और अगर माँ सामने नहीं होंगी, तो भवानी ये कहेगा कि हमने उनकी बात नहीं मानी। अदालत में पहला सवाल यही आएगा।"
राजेंद्र ने पैन रख दिया। "एक बात साफ़ कर देता हूँ। आज रात अंदर जो होगा, उसकी रिपोर्ट मुझे चाहिए। बंदूक नहीं चलेगी। काग़ज़ निकलना चाहिए, चाहे भवानी रोए या धमकाए।"
"सर," बंसी ने कहा, जो अब तक दरवाज़े पर खड़ा सब सुन रहा था, "भवानी हवेली में अकेला नहीं होगा। उसके चार आदमी हमेशा साथ रहते हैं।"
"तो तुम चार के चार हो।" राजेंद्र ने फ़ाइल बंद की। "मैं सुबह तक यहीं बैठा हूँ। मन्नू, तुम्हारा टोकन और विक्रम का हिसाब — ये दोनों चीज़ें आज रात अलग नहीं रहनी चाहिए।"
मैं समझ गया वो क्या कह रहे थे। पर सोचकर भी डर लगा।
हम बाहर निकले। रात की हवा में वो नमी थी जो मिट्टी के बर्तन से पानी चुआने पर आती है। रीना ने स्कूटी स्टार्ट की। बंसी अपनी जीप में बैठा।
"मन्नू भैया," बंसी ने खिड़की से सिर निकाला, "एक बात कहूँ? अगर भवानी ने आज रात माँ को हवेली में बुलाया है, तो वहाँ कुछ पहले से रखा है। कोई जाल। वो इतनी आसानी से हमें काग़ज़ नहीं देगा।"
"तो जाल में वो ख़ुद फँसेगा।" मैं स्कूटी पर बैठा।
रास्ते में रीना कुछ नहीं बोली। बस एक बार, आधे रास्ते पर, उसने स्कूटी धीमी की और कहा, "मन्नू, आज सुबह जब वो थाने आया था — भवानी — तो तुमने उसकी आँखों में डर देखा था न?"
"हाँ।"
"वो डर विक्रम के लिए नहीं था।" उसने स्कूटी फिर तेज़ की। "वो डर इस बात का था कि विक्रम कहीं कुछ ऐसा न कह दे जो भवानी के अपने आदमी सुन लें।"
घर पहुँचे तो माँ जाग रही थीं। चारपाई पर बैठी, हाथ में रसोई का कपड़ा, और सामने मेज़ पर चाय का गिलास ठंडा पड़ा था।
"माँ," मैं दरवाज़े पर ही रुक गया, "आज रात आपको मेरे साथ चलना है। भवानी ने बुलाया है।"
माँ ने कपड़ा मोड़ा। "बुलाया है या बुलवाया है?"
रीना मेरे पीछे खड़ी थी। माँ ने उसकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़। "मन्नू, मैं तेरे पिता के साथ तीस साल रही। जब वो मुझे ऐसी रात में बुलाते थे, तो पहले से तय करके बुलाते थे। आज भवानी ने बुलाया है — इसका मतलब वहाँ कुछ है जो वो मुझसे सामने कहलवाना चाहता है।"
"तो आप मत चलिए।"
माँ उठीं। "नहीं।" उन्होंने चप्पल पहनी। "मैं चलूँगी। क्योंकि अगर आज रात मैं वहाँ नहीं पहुँची, तो वो ये कहेगा कि मन्नू की माँ डर गई। और मेरे बेटे को डरा हुआ नहीं देखना चाहती।"
रास्ते में माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "टोकन निकाल।"
मैंने निकाला। माँ ने उसे हथेली पर रखा और देर तक देखा। "इस पर नई लकीर आई है।"
"पढ़िए।"
माँ ने आँखें सिकोड़ीं। "विक्रम का हिसाब… दोनों टोकन के बीच।" उन्होंने मुझे टोकन लौटाया। "मन्नू, अगर आज रात दोनों टोकन एक साथ आ गए, तो जो हिसाब लिखा जाएगा, वो किसी एक के नाम नहीं होगा।"
"तो किसके नाम?"
माँ ने सड़क की तरफ़ देखा। "जो उस वक़्त उन्हें हाथ में लेकर खड़ा होगा।"
हवेली के पिछले दरवाज़े की तरफ़ से हम गए। बंसी ने जीप रोकी और लाइट बंद कर दी। पीछे की दीवार पर अमरूद का पेड़ था, जिसकी जड़ें दीवार में घुसी थीं।
"दरवाज़ा खुला है," बंसी ने धीरे से कहा। "भवानी आदमी नहीं बिठाता इधर।"
"और आज बैठाया नहीं है," मैंने कहा, "क्योंकि वो चाहता है कि हम सोचें कि वो चालाक है।"
अंदर घुसे। आँगन में एक बल्ब जल रहा था। दूर, हवेली के मुख्य हिस्से में, कमरे की लाइट जल रही थी और भवानी की आवाज़ आ रही थी। वो किसी से बात कर रहा था।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। "वो अकेला नहीं है।"
हम दीवार के सहारे आगे बढ़े। खिड़की के पास रुके। अंदर, बड़ी मेज़ पर पीली रोशनी में, भवानी बैठा था। सामने एक चमड़े का बैग खुला था और उसके अंदर से काग़ज़ निकल रहे थे। उसके दो आदमी दरवाज़े पर खड़े थे।
"बाबू," एक आदमी ने कहा, "वो लोग पहुँच गए होंगे।"
"पहुँचें।" भवानी ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "तैयारी हो गई है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ की आँखें उस बैग पर थीं। और उनके होठ काँप रहे थे — डर से नहीं, ग़ुस्से से।
"माँ?"
"वो काग़ज़ नहीं हैं, मन्नू।" माँ ने धीरे से कहा। "वो बाप के हाथ से लिखी एक शपथ है। जो उसने हर बेटे के नाम पर लिखी है। और आज रात वो उन पर से मेरा नाम मिटाना चाहता है।"
तभी मेरे पीछे पैर की आहट आई। मैं पलटा। भवानी का आदमी, जिसके हाथ में लाठी थी, सामने खड़ा था।
"बाबू कह रहे हैं, अंदर आ जाइए। बाहर ठंड है।"
कमरे के अंदर घुसे तो भवानी उठ खड़ा हुआ था। उसने हमें देखा — पहले माँ को, फिर रीना को, फिर मुझे। और फिर वो जो कहा, वो किसी ज़माने की रस्म जैसा लगा।
"आओ, ताई जी। बैठिए।" बिल्कुल वैसे जैसे कोई पुराना नौकर अपनी मालकिन को बुलाता है।
माँ ने कुर्सी खींची और बैठ गईं। "भवानी, तू जब से है तू, रोज़ रात दूध गर्म करके मेरे दरवाज़े पर रखवाता है। आज तेरी इस हवेली में मुझे बैठकर देखो। कितना बदल गया सब।"
भवानी हँसा। "बदले हैं तो नाम। ज़मीन वही है।"
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