The Token System – Chapter 50
रीना हँसी। फिर हँसी मुँह पर ही रुक गई। “अच्छा, वो वकील जो कल थाने में बैठा था — उसने तुझे कुछ और बताया था?”
“क्या?”
“तूने बताया नहीं। कल रात तुझे फ़ोन आया था, राजेंद्र का। उससे पहले तू दो घंटे गायब था। कहाँ था?”
मैंने चाय का कप नीचे रखा। “थाने में। राजेंद्र ने बुलाया था। वो वकील जिसे भवानी ने भेजा, वो कोई साधारण वकील नहीं था। उसके बस्ते में हवेली की नकल पड़ी थी। उसने काग़ज़ दिखाने से मना कर दिया, पर राजेंद्र ने देख लिया था।”
“और क्या देखा?”
“हवेली के नक़्शे में एक कमरा है जो किसी भी दरवाज़े से नहीं जुड़ता। दीवारों से घिरा।”
रीना ने कप रखा। “और वो वकील?”
“उसने कहा — भवानी इस कमरे के बारे में कुछ नहीं जानता। यह नक्शा भवानी के पास अट्ठारह साल पहले पहुँचा था, जब उसने हवेली ख़रीदी। पर उसने कभी इस कमरे को खोजने की कोशिश नहीं की।”
“तो कमरे में क्या है?”
“यही तो।”
माँ ने अंदर से आवाज़ दी, “मन्नू, बंसी का फ़ोन आया है। कह रहा है, थाने के बाहर भवानी के आदमी खड़े हैं। तीन गाड़ियाँ।”
मैंने रीना की तरफ़ देखा। उसने कप उठाया, बिना कुछ कहे आधी चाय खत्म की और उठ गई।
“तैयार हो,” उसने कहा। “मैं भी चल रही हूँ।”
“रीना…”
“मन्नू, उस थाने में आज विक्रम आएगा। और अगर वो कुछ ऐसा बोला जो भवानी के ख़िलाफ़ जाए, तो भवानी वहीं पर कुछ न कुछ करेगा। तेरे भरोसे तो तेरी जान है, पर आज मैं अपनी आँखों से देखूँगी।”
उसे रोकना बेकार था। मैंने टोकन जेब से निकाला। लकीर हल्की हो रही थी, जैसे कोई स्याही सूख रही हो।
सात बजे हम निकले। रास्ते में राजेश चाय की दुकान पर मिला। हाथ जोड़कर खड़ा था, चेहरे पर वो हँसी नहीं थी।
“मन्नू भाई, आज कुछ न कहना।”
“क्या हुआ?”
“भवानी ने बाज़ार में सुबह-सुबह कहलवा दिया है — जो आज थाने के चक्कर में पड़ेगा, उसकी दुकान का राशन बंद। मेरी दुकान पहले से चढ़ी हुई है। मेरी बच्ची है भाई।”
“तू चिंता मत कर। दुकान चलती रहेगी।”
“कैसे?”
“क्योंकि भवानी आज ख़ुद फँसने वाला है।”
राजेश ने सिर झुकाया, कुछ सोचा, फिर झट से गुड़ की एक डली मेरे हाथ में रख दी। “मुँह मीठा। बस, कह देना कि राजेश ने दी थी।”
थाने के बाहर भवानी की तीन गाड़ियाँ खड़ी थीं। आदमी खड़े थे, हाथ जेब में। मैंने उन्हें देखा और सीधा अंदर चला गया। रीना मेरे पीछे थी।
राजेंद्र अपनी कुर्सी पर बैठा था। सामने कुर्सी पर एक आदमी — तीस-पैंतीस साल का, हल्की दाढ़ी, सफ़ेद कमीज़, और भवानी जैसा तेज़ कसा हुआ बदन, पर आँखों में भवानी की वो चमक नहीं थी। वो चमक बुझी हुई थी।
“आ जाओ,” राजेंद्र ने कहा। “ये विक्रम सिंह हैं।”
विक्रम उठा। उसने हाथ आगे किया।
“तुम्हीं मन्नू हो?”
“हाँ।”
“पिता जी ने तुम्हारे बारे में नहीं बताया। मुझे किसी और ने बताया — कि एक माली का बेटा थाने में बैठा है जो हवेली के काग़ज़ निकाल रहा है।”
“और तुम क्यों आए?”
विक्रम बैठ गया। फिर देर तक जूते की नोक देखता रहा। “क्योंकि वो काग़ज़ सिर्फ़ तुम्हारे नहीं हैं, भाई। उनमें आधे मेरे भी हो सकते हैं। पर पिता जी ने मुझे कभी ये बात बताई ही नहीं। मुझे किसी और ने बताया — कि हवेली के नीचे एक तहखाना है, और उसका रास्ता उसी दीवार में है जहाँ काग़ज़ छिपे थे।”
राजेंद्र ने टेबल पर हाथ रखा। “विक्रम, तुम्हारे पिता की तरफ़ से कोई परचा है?”
“नहीं। पर मैं सच्च बोल रहा हूँ। उन्होंने मुझे बचपन में ही भेज दिया था। कहा था — तू कभी हवेली की तरफ़ मुँह मत करना। जब मैंने पूछा क्यों, तो उन्होंने कहा — क्योंकि वहाँ के लोगों का हिसाब साफ़ नहीं है।”
“कौन से लोग?” रीना ने पहली बार बोला।
विक्रम ने उसे देखा। “हमारे ही। भवानी ख़ानदान के। उन्होंने कहा था — हवेली की मालकियत का जो काग़ज़ है, वो एक औरत के नाम था। एक माली की बीवी के नाम। मेरे दादा जी ने वो काग़ज़ भेड़िये की तरह छुपाया था, किसी को पता न चले।”
कमरे में सन्नाटा।
फिर मैंने धीरे से पूछा, “वो औरत कौन थी?”
विक्रम की आवाज़ नीची हो गई। “मेरे दादा की बहन। उन्होंने हवेली का आधा हिस्सा उस औरत को बेचकर, और वो औरत कन्हैया माली की बीवी थी। मेरे दादा ने ये हिसाब बनाया था — कि जब वो बेच देगा, तो बाद में काग़ज़ ज़ब्त कर लेगा। पर वो औरत मर गई। और काग़ज़ खो गया।”
“तो काग़ज़ चोरी नहीं थे,” मैंने कहा। “वे छुपाए गए थे।”
“हाँ। और मेरे पिता को सालों से पता है।”
तभी बाहर से आवाज़ आई। भवानी ख़ुद आ गया था। दरवाज़े पर खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, काले बाल, और आँखों में वो चमक जो मैंने पहली बार देखी।
“विक्रम,” उसने कहा। “तू अंदर आ गया। अच्छा किया।”
विक्रम उठा नहीं। कुर्सी पर ही बैठा रहा। “पिता जी, आपको बैठना है या खड़े रहना है?”
भवानी का चेहरा बदला। “बाप से ऐसे बोलता है?”
“बाप से तब बोलता हूँ जब बाप ने चौदह साल बेटे से झूठ बोला हो।”
राजेंद्र बीच में बोला, “भवानी, ये बयान है। आप बैठिए या चले जाइए।”
भवानी ने विक्रम को देखा। एक पल लगा जैसे वो कुछ सोच रहा हो। फिर वो मुड़ा और बाहर जाने लगा। दरवाज़े पर रुककर बोला, “विक्रम, हवेली के काग़ज़ जिसके पास भी हैं, वो मेरे पास आएँगे। जिस रात ये माली का बेटा हवेली की धूल में सोएगा, उस रात तू भी याद करेगा कि तेरा बाप कौन था।”
वो चला गया।
विक्रम ने गहरी साँस ली। अपने हाथ की उँगलियाँ देखीं, फिर राजेंद्र की तरफ़।
“अब सुनिए, जो मुझे पता है,” उसने कहा। “पर पहले एक बात। मुझे हवेली का कोई हिस्सा नहीं चाहिए। मैं सिर्फ़ अपने दादा का गुनाह साफ़ करना चाहता हूँ। जो हिस्सा कन्हैया माली के नाम दर्ज था, वो उनके बेटे को मिलना चाहिए।” उसने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। वो धीरे-धीरे गरम हो रहा था।
“पर भाई,” विक्रम आगे झुका, “एक और बात जो कोई नहीं जानता। मेरे दादा ने हवेली का आधा हिस्सा बेचने के बाद, उस बिक्री के पैसों से एक दूसरी ज़मीन ख़रीदी थी। ख़ुद के नाम पर नहीं। पिता जी इस बात से अब तक अनजान हैं।”
राजेंद्र ने पैन उठाया। “किसके नाम पर?”
“उसी औरत के नाम पर। कन्हैया माली की बीवी। और वो काग़ज़… वो अभी भी हवेली के उस कमरे में रखा है जो किसी दरवाज़े से नहीं जुड़ता।”
रीना ने मेरा हाथ थाम लिया।
राजेंद्र ने विक्रम से कहा, “तो कल तुम हवेली में जाने को तैयार हो?”
“आज,” विक्रम ने कहा। “थाने में बैठकर कुछ नहीं मिलेगा। पर पिता जी उस कमरे से पहले वहाँ पहुँच सकते हैं। अपने आदमियों के साथ।”
राजेंद्र ने मुझे देखा।
मैंने कहा, “थाने में लिख कर दीजिए — दोनों पक्षों के साथ कल दस बजे हवेली की तलाशी होगी। और मुझे पहले उस हवेली में जाने दीजिए, आपके साथ। अकेले नहीं।”
भवानी ने दरवाज़े से आवाज़ दी, “मंज़ूर।” वापस आ गया था। “कल दस बजे। और मन्नू… तेरी माँ को लेकर आना। उससे कुछ बातें करनी हैं। पुरानी।”
वो चला गया।
कमरे में हवा भारी थी। मैं बाहर निकला। आँगन में धूप चढ़ आई थी, पेड़ पर वही कौवा बैठा था और मुझे घूर रहा था।
रीना बाहर आई और बोली, “वो माँ को क्यों बुला रहा है?”
“यही सोच रहा हूँ।”
उसी वक़्त फ़ोन बजा। राजेंद्र था। “मैं अभी एक बात पक्की कर ली। विक्रम चार महीने से शहर में छुपा था। पता है क्यों? क्योंकि उसे कोई डरा रहा था। पर हफ़्ते भर पहले जिसने उसे हिम्मत दी, वो कोई और नहीं — भवानी की ही पत्नी थी।”
“क्या?”
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