The Token System – Chapter 49
“बैठिए,” राजेंद्र ने कहा, बड़े आराम से। “चाय पीजिए।”
वकील ने चाय नहीं ली। “मैं औपचारिक बात कर रहा हूँ। इन काग़ज़ों पर अदालत का रोक लगना चाहिए।”
राजेंद्र ने बंडल अपनी तरफ़ खींचा। “काग़ज़ मेरे कब्ज़े में हैं। अदालत का हुक्म आएगा तो मैं उठा दूँगा। पर पहले ये साबित हो कि ये चोरी के हैं।”
“इन्हें हवेली से निकाला गया…”
“हवेली किसकी है?” राजेंद्र ने पूछा।
वकील एक पल रुका। “ठाकुर भवानी सिंह…”
“काग़ज़ देखिए पहले।” राजेंद्र ने बंडल खोला। पहला काग़ज़ सामने रखा। “इस पर लिखा है हवेली का आधा हिस्सा कन्हैया माली के नाम दर्ज था। ये काग़ज़ किसके नाम से निकला?”
वकील ने काग़ज़ देखा। उसका चेहरा सपाट रहा, पर उँगली फ़ाइल पर कस गई।
“मैं ये काग़ज़ नहीं देख सकता,” उसने कहा। “मैं अर्ज़ी देता हूँ।”
“अर्ज़ी दे दीजिए,” राजेंद्र ने कहा और चाय खत्म की। “जब तक अदालत कुछ कहती है, ये काग़ज़ मेरी अलमारी में रहेंगे। और हाँ — अगर अगले चौबीस घंटे में इन काग़ज़ों को कुछ हुआ, तो मैं सीधा ज़िले के दफ़्तर को लिखूँगा।”
वकील गया। चपरासी भी गया। राजेंद्र ने दरवाज़ा बंद किया और मेरी तरफ़ देखा। “अब बताओ, इनमें ऐसा क्या है जो भवानी इतना डर रहा है?”
मैंने काग़ज़ एक-एक करके देखे। रकमें, तारीख़ें, दो अंगूठे। फिर सबसे नीचे एक पुरानी पर्ची मिली — छोटी, मुड़ी हुई, पीली पड़ चुकी।
उस पर दादा की लिखाई में लिखा था — हवेली का आधा हिस्सा कन्हैया माली के नाम दर्ज था। पर कभी किसी रजिस्टर में चढ़ा ही नहीं। नीचे छोटे अक्षरों में — कान्हा, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मतलब मैं नहीं रहा। इसे मत जलाना। ये काग़ज़ तेरे और मेरे बीच का हिसाब है।
राजेंद्र ने पर्ची पढ़ी और कुछ देर चुप बैठा रहा। “इसे घर ले जाओ। माँ को दिखाओ।”
मैं घर पहुँचा तो दोपहर हो चुकी थी। रीना चूल्हे पर थी, छोटू आँगन में लकड़ी के टुकड़ों से कुछ बना रहा था। माँ बैठी सब्ज़ी काट रही थी।
मैंने पर्ची उनके सामने रख दी। “ये पापा के काग़ज़ों में मिली है।”
माँ ने पर्ची उठाई। पढ़ा। फिर पढ़ा। फिर उनके हाथ काँपने लगे और पर्ची उँगलियों से छूटकर गोद में गिर गई।
“माँ?”
“तेरे पापा ने ये काग़ज़ दीवार में इसलिए छिपाया था,” वो रोने लगीं, आवाज़ टूट रही थी, “क्योंकि हरि सिंह ने उन्हें कहा था — ये काग़ज़ दे, वरना हवेली से निकाल दूँगा। और तेरे पापा नहीं दिए। तो हरि सिंह ने उन्हें हवेली से निकलवा दिया। चार महीने बाद ही…”
वो रुक गईं। बस रोईं। छोटू ने लकड़ी नीचे रखी और माँ के पास आकर खड़ा हो गया, हाथ में उनकी उँगली पकड़ी।
रीना ने पर्ची उठाई और दोबारा पढ़ी। फिर बोली, “इसका मतलब हवेली पर हमारा भी हक़ है?”
“तेरे पापा का हक़ है,” माँ ने आँखें पोंछते हुए कहा। “वो हमारा ही तो है।”
“तो अब ये काग़ज़ सामने आएँगे,” रीना ने कहा। “और भवानी…”
“भवानी कुछ नहीं करेगा,” मैंने कहा। “काग़ज़ थाने में हैं।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “बेटा, ये काग़ज़ जब थाने में चले जाएँगे, तो बात सिर्फ़ हवेली की नहीं रहेगी। हरि सिंह का नाम आएगा। भवानी के दादा का। और जब वो नाम आएगा — तो भवानी तेरे पीछे पड़ेगा। सिर्फ़ काग़ज़ से नहीं, और तरीक़ों से।”
“अब वो मेरे पीछे पड़ा हुआ है, माँ।”
माँ ने सिर हिलाया। फिर उठीं और अंदर गईं। लौटीं तो हाथ में वो लाल कपड़े वाली घड़ी थी।
“इस पर तीन तारीख़ें हैं,” उन्होंने कहा। “एक तेरे पापा की मौत की। बाकी दो किसकी हैं, मुझे नहीं पता। पर लिखने वाला जानता था।”
“कौन लिखने वाला?”
“वही जिसने ये पर्ची लिखी। तेरे दादा।”
मैंने घड़ी पलटी। पीछे खुदा हुआ वाक्य दोबारा पढ़ा — पत्थर वहीं रहता है, जहाँ उसे रखा जाता है।
रीना ने कंधे पर हाथ रखा। “मन्नू, तूने काग़ज़ तो बचा लिए। पर अगला कदम क्या है?”
“असली तहखाना,” मैंने कहा। “तीन पीपल। कन्हैया चाचा को पूछना पड़ेगा। गाँव के बुज़ुर्गों को पता होगा। हवेली के नीचे जो है, वो भवानी के परिवार के आने से पहले का है।”
“तो इसे भवानी से पहले निकालना होगा,” रीना ने कहा।
छोटू ने तभी कहा, “दादाजी ने कहा था कि हवेली के पीछे एक कुआँ भी है जो अब दब गया है। वो अब किसी को दिखता नहीं।”
हम सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
“कब कहा था तेरे दादाजी ने?”
“रात को। जब मैं सो रहा था।” छोटू ने अपनी लकड़ी उठाई। “उन्होंने ये भी कहा कि मन्नू भैया जब पचास का काम पूरा कर लेंगे, तब उन्हें पूरा सच दिखेगा।”
मैंने उसकी बात हवा में नहीं उड़ाई। पिछले कई दिनों में छोटू की बातें कम पड़ी थीं, ज़्यादा नहीं। मैंने जेब से टोकन निकाला। मुँह खोलकर देखा तो साँस रुक गई।
टोकन पर लकीर उभर आई थी — काग़ज़ सुरक्षित। हिसाब: दो में से एक।
“क्या हुआ?” रीना ने पूछा।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा और टोकन जेब में रख दिया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, कुछ कहना चाहा, पर नहीं कहा। बस चूल्हे की तरफ़ मुड़ गईं।
शाम को बंसी आया। कलाई की पट्टी बदलवा चुका था। “थाने में वकील आया था?” उसने चाय का गिलास लेते हुए पूछा।
“तू कैसे जानता है?”
“क्योंकि उसने मुझसे भी पूछा। बाज़ार में मिला। कह रहा था — काग़ज़ अगर थाने में जमा हुए, तो हवेली का सारा कारोबार रुक जाएगा।”
“तो रुके।”
“रुकेगा नहीं,” बंसी ने चाय की चुस्की ली। “भवानी ने उसी वक़्त एक और चाल चली है। उसने अपने बेटे को बुला लिया है।”
मेरा गिलास हाथ में ही रुक गया।
“बेटे को?” रीना ने पूछा।
“हाँ। उसका बेटा शहर से बाहर रहता है। भवानी ने कभी उसे सामने नहीं आने दिया। पर अब जब काग़ज़ थाने तक पहुँच गए हैं, तो भवानी ने उसे बुलाया है।” बंसी ने गिलास नीचे रखा। “और सुना है — बेटा भवानी से बोलता नहीं। बाप-बेटे में कुछ पुराना कड़वा है।”
“तो वो किसके साथ खड़ा होगा?” मैंने पूछा।
“यही तो सवाल है,” बंसी ने कहा।
देर रात राजेंद्र का फ़ोन आया। मैंने चार्जिंग पर रखा फ़ोन उठाया। “सुनो,” उसकी आवाज़ में अजीब सी तेज़ी थी। “भवानी के बेटे का पता लग गया है।”
“कौन है? कहाँ रहता है?”
“नाम है विक्रम सिंह। पिछले चार महीने से शहर में ही है। छुपकर। भवानी को भी नहीं पता था।”
“तो क्या हुआ?”
“वो कल सुबह इसी थाने में बयान देने आ रहा है।”
मैंने फ़ोन कान से दूर किया, फिर पास लाया। “किसके ख़िलाफ़?”
राजेंद्र एक पल चुप रहा। “अपने पिता के ख़िलाफ़।”
मैंने फ़ोन रखा। कमरे में रीना सो रही थी, माँ के कमरे से चाय की खुशबू आ रही थी। बाहर आँगन में छोटू ने अपनी लकड़ियाँ फिर से जमा रखी थीं — जैसे कोई नक्शा बना रहा हो।
मैंने जेब से टोकन निकाला। वो गरम नहीं था। ठंडा भी नहीं था। बस वैसा था जैसा होना चाहिए। पर मुझे लगा — जैसे वो भी सुन रहा हो।
मैंने उसे जेब में लौटाया। और सुबह का इंतज़ार करने लगा।
सुबह छह बजे मैं उठा। रीना पहले से जगी थी। बाहर बरामदे में बैठी चाय पी रही थी और सामने वाले पेड़ पर बैठा कौवा उसे घूर रहा था।
“आज कुछ होगा,” उसने कहा।
“हर दिन कुछ होता है।”
“आज अलग होगा। मेरी नानी कहती थीं, जिस दिन कौवा सुबह-सुबह डाल पर बैठकर घूरे, उस दिन दरवाज़े पर कोई अनजाना आता है।”
“तो आज तेरी नानी को फ़ोन कर, बता देना कि अनजाना नहीं, भवानी का बेटा आ रहा है। उन्हें भी कम शर्मिंदा महसूस होगी।”
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