The Token System – Chapter 48
“…अगर मुझे कुछ हो जाए, तो ये काग़ज़ मेरे बेटे मनोहर के हाथ लगे। मैं जानता हूँ कि भवानी का दादा हरि सिंह ने खेत मेरे नाम पर क्यों कर दिए थे — वो सिर्फ़ दया नहीं थी। उस रात हवेली की नींव में एक तहखाना है, जिसमें कुछ ऐसा रखा है जिसे न हरि सिंह मिटा सका, न भवानी मिटा पाया। वो चीज़ ज़मीन के नीचे नहीं, ज़मीन के हिसाब से है। गाँव का नक्शा बदलता रहा, पर तीन पीपल पुराने हैं। तीनों के बीच जो जगह है, वहीं हवेली का असली तहखाना है। और वहाँ जो है, वो इस गाँव का सबसे पुराना काग़ज़ है — उससे पहले का जब भवानी का परिवार यहाँ आया भी नहीं था।”
काग़ज़ वहीं ख़त्म हो गया। आधा वाक्य, फिर खाली।
ऊपर से माँ की आवाज़ आई। “मन्नू! निकल!”
मैंने डायरी और काग़ज़ पोटली में रखा और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ऊपर पहुँचा तो देखा — माँ दरवाज़े पर खड़ी थी, और उनके हाथ में वो लाल कपड़े में लिपटी पुरानी घड़ी थी जो वो कभी किसी को नहीं दिखातीं।
“ये घड़ी पापा ने मुझे दी थी,” माँ ने कहा। “कहते थे — जब बेटा बड़ा हो जाए, तो इसे देना। इसके पीछे जो लिखा है, वो उसे ज़रूर दिखाना।”
मैंने घड़ी का पिछला हिस्सा देखा। उस पर एक वाक्य खुदा था — पत्थर वहीं रहता है, जहाँ उसे रखा जाता है। और उसके नीचे तीन तारीख़ें, तीन नाम।
“ये तीन तारीख़ें?”
“एक तुम्हारे पापा की मौत की है,” माँ ने कहा। “बाकी दो की मुझे नहीं पता।”
रीना ने पीछे से कहा, “मन्नू, बाहर गाड़ी आई है।”
मैं बाहर भागा। सामने खड़ी थी — राजेंद्र की जीप। और उसमें बैठा था राजेंद्र, मुँह पर पट्टी बाँधे, और उसके पीछे बैठे दो आदमी जिनके हाथ में लाठी थी।
“काग़ज़ लेकर आए हो?” पीछे से आवाज़ आई। भवानी जीप से उतरा। “मैंने कहा था ना — आधा सच जानने वाला जल्दी मरता है। तुम्हारे बाप ने जान लिया था। इसलिए मरा।”
“राजेंद्र को छोड़,” मैंने कहा।
“काग़ज़ दे। फिर छोड़ता हूँ।”
मैंने सोचा। मेरी जेब में टोकन था। मैंने उसे निकाला — वो गरम हो रहा था। हथेली में जलन हो रही थी। मैंने टोकन मुट्ठी में दबाया और आगे बढ़ा।
“काग़ज़ थाने में हैं,” मैंने कहा। “यहाँ नहीं।”
“झूठ। तुम्हारे सीने पर बंडल का निशान है।”
मैंने अपनी क़मीज़ देखी। ग़लती नहीं थी। भवानी मेरे पास आया। और उसी पल मेरी मुट्ठी से टोकन की गरमी बढ़ गई, जैसे कोई और चीज़ मेरे हाथ से बाहर निकलना चाह रही हो।
पीछे से एक आवाज़ आई — ठंडी, साफ़। “भवानी।”
हम सब मुड़े। गली के मोड़ पर खड़ा था कन्हैया माली। हाथ में कुदाल। और उसके पीछे खड़े थे गाँव के लगभग दस बुज़ुर्ग — जो अब तक कभी सामने नहीं आए थे।
“कन्हैया चाचा?” मैंने कहा।
“ये काग़ज़ मेरे हाथ में आए थे,” कन्हैया ने कहा। “इसलिए हवेली के पीछे की दीवार पर मैंने काग़ज़ों का बंडल छिपाया था — जिसे तुमने आज रात निकाला। पर…”
“पर क्या?”
“पर ये भवानी, काग़ज़ लेकर नहीं आया। ये तहख़ाने के दरवाज़े की चाबी लेकर आया है।”
कन्हैया ने कुदाल उठाई। “भवानी, उस कमरे का रास्ता बंद कर। वरना वो काग़ज़ नहीं जो ज़मीन के नीचे है आज सबके सामने खुलेगा — और तेरे दादा का नाम वहाँ से मिट जाएगा।”
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। “तो मनोहर। दिखा। जो तेरे पास है, मेरे सामने ज़मीन पर रख।”
मैंने टोकन मुट्ठी में कसा। बंडल सीने से लगाया।
“ये काग़ज़ अब किसी की आग में नहीं जलेंगे,” मैंने कहा।
और पीछे से आवाज़ आई — कन्हैया की — “तो इन्हें मेरे सामने लाकर दिखा।”
॥
“रख दे ज़मीन पर,” भवानी ने दोबारा कहा।
कन्हैया चाचा मेरे पीछे आ खड़े थे। उनके पीछे वो दस बुज़ुर्ग, हाथों में लाठियाँ और कुदालें। गली में सन्नाटा ऐसा कि दूर किसी के घर में बजती घंटी भी सुनाई दे रही थी।
मैंने सीने से बंडल निकाला। भवानी की आँखों में चमक आई। पर मैंने वो बंडल उसकी तरफ़ नहीं, कन्हैया चाचा की तरफ़ बढ़ा दिया।
“आपने कहा था — सामने लाकर दिखाओ। ये देखिए।”
कन्हैया चाचा ने बंडल लिया, खोला, और उनकी उँगलियाँ उस पुराने काग़ज़ पर रुक गईं जिस पर उनका ही नाम लिखा था। वो काग़ज़ देखते ही उनका चेहरा बदल गया — जैसे कोई बरसों बाद अपनी ही लिखाई देख रहा हो।
भवानी ने एक कदम आगे बढ़ाया। “कन्हैया, तू पुराना आदमी है। समझदार है। ये काग़ज़ जले नहीं, तो बात बढ़ेगी। मैं तुझे हवेली के पीछे वाला पूरा हिस्सा दे दूँगा। बस ये बंडल मुझे दे दे।”
कन्हैया चाचा ने काग़ज़ सीने से लगाया। “सुना तूने? मैंने तेरे बाप से भी यही कहा था, हरि सिंह। मैंने कहा था — ये ज़मीन मेरी है, काग़ज़ पर मेरा नाम है। और उसने क्या किया? मेरी गवाही दर्ज होने से पहले ही मेरा नाम रजिस्टर से निकलवा दिया।”
“अब तेरा नाम वापस…”
“अब मेरा नाम वापस नहीं चाहिए।” चाचा की आवाज़ तेज़ हुई। “अब मुझे चाहिए कि सब सामने आए। गाँव के ये सारे बुज़ुर्ग आज यहाँ खड़े हैं। इन्होंने अपनी आँखों से देखा है, हरि सिंह ने कैसे-कैसे काग़ज़ बदले।”
भवानी ने अपने आदमियों की तरफ़ देखा। जीप में बैठे दोनों आदमी उतर गए थे, पर आगे नहीं बढ़ रहे थे। दस बुज़ुर्गों की लाठियाँ देखकर उनके कदम रुक गए। राजेंद्र अब भी जीप में बैठा था, मुँह पर पट्टी, हाथ बँधे।
“राजेंद्र को खोलो,” मैंने कहा।
“पहले मेरा काम,” भवानी ने कहा।
“तेरा काम नहीं होगा,” कन्हैया चाचा ने कहा और कुदाल ज़मीन पर टिका दी। “जा। जो करना है कर। पर याद रख — काग़ज़ अब मेरे पास हैं और इन बुज़ुर्गों के सामने रखे हैं। अगर इन्हें कुछ हुआ, तो ये सारे बुज़ुर्ग गवाही देंगे।”
भवानी कुछ पल खड़ा रहा। मैंने उसकी उँगली देखी — फिर काँप रही थी, जैसे उस दिन काँपी थी जब रीना ने उसके थैले का पैसा ठुकराया था।
“ठीक है,” भवानी ने कहा, और उसकी आवाज़ पतली हो गई। “पर मनोहर, ये आख़िरी बार नहीं है। तेरे बाप ने भी यही सोचा था कि काग़ज़ उसके पास हैं तो सब कुछ है।”
उसने अपने आदमियों को इशारा किया। उन्होंने राजेंद्र की पट्टी खोली। राजेंद्र ने एक ही झटके में हाथ छुड़ाए और जीप से उतरकर मेरे पास आ गया।
“बंडल?” उसने पूछा।
“कन्हैया चाचा के पास।”
राजेंद्र ने बंडल उनसे लिया और अपने सीने से लगाया। “ये अब मेरे पास रहेगा। थाने में सुबह जमा करूँगा। और भवानी…” वो मुड़ा। “तुम्हारे दो आदमी अंदर बैठे हैं। छह घंटे में बाहर आएँगे। उन्हें बता देना — काग़ज़ अब बंद लिफ़ाफ़े में हैं।”
भवानी कुछ नहीं बोला। वो जीप की तरफ़ मुड़ा, फिर रुका, फिर मेरी तरफ़ देखा।
“तेरे पास जो टोकन है ना,” उसने धीरे से कहा, “उसका हिसाब भी एक दिन सामने आएगा। और उस दिन तू अकेला होगा।”
फिर वो गाड़ी में बैठा और चला गया। गली के मोड़ पर धूल उठी और फिर बैठ गई।
कन्हैया चाचा ने बुज़ुर्गों को विदा किया। जाते-जाते एक बूढ़े ने मेरा कंधा थपथपाया। “तेरे दादा का बेटा है,” बस इतना कहा। माँ दरवाज़े पर खड़ी रो रही थी।
बंसी दौड़ता हुआ आया, कलाई पर पट्टी बाँधे। “क्या हुआ? मैं सो रहा था कि…”
“काग़ज़ सुरक्षित हैं,” राजेंद्र ने कहा। “कल सुबह थाने जमा करने हैं।”
रात बाकी थी। मैंने सोचा, सो जाऊँ। पर नींद कहाँ थी।
सुबह छह बजे मैं और राजेंद्र थाने पहुँचे। राजेंद्र ने बंडल मेज़ पर रखा और चाय मंगाई। तभी दरवाज़ा खुला और अंदर घुसा — एक आदमी, सफ़ेद कुर्ता, सोने का चश्मा, हाथ में काली फ़ाइल। उसके पीछे एक चपरासी।
“ठाकुर भवानी सिंह की तरफ़ से,” उसने कहा। “मैं उनका वकील हूँ।”
राजेंद्र की चाय का कप हवा में रुक गया।
“ये काग़ज़,” वकील ने फ़ाइल खोलते हुए कहा, “चोरी के हैं। हवेली की मालकियत का सवाल है, और ये काग़ज़ रात को ज़बरदस्ती निकाले गए हैं। मेरे मुवक्किल की तरफ़ से मैं इन्हें अपने कब्ज़े में लेने की अर्ज़ी देता हूँ।”
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