The Token System – Chapter 47
वो गाड़ी में बैठा और सफ़ेद गाड़ी अंधेरे में घुल गई। राजेंद्र ने जीप स्टार्ट की।
“ये तीसरी बार है,” मैंने कहा। “तीसरी बार वो ऐसे ही जा रहा है, बिना हाथ पीछे बाँधे।”
“आज रात हाथ बँध सकता था,” राजेंद्र ने कहा। “पर तुम्हारे साथ एक बंदा ज़रूरी था। और वो बंदा मैं हूँ। अब चुप बैठो और काग़ज़ सीने से नहीं उतारना।”
हम थाने पहुँचे। राजेंद्र ने बंडल खोलकर देखा। उसकी उँगली पापा के नाम पर रुकी। फिर कन्हैया माली की गवाही पर। फिर हरि सिंह के अंगूठे पर।
“ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं हैं,” उसने धीरे से कहा। “ये सबूत का पहाड़ है। और भवानी ने इन्हें जलाने के लिए दो आदमी भेजे — इसका मतलब उसे पता है कि इनमें क्या है।”
मैंने जेब से अपना टोकन निकाला। उस पर नई लकीर उभर रही थी, धीरे-धीरे, जैसे स्याही सूख रही हो।
“तीसरा काम पूरा। हिसाब: शून्य।”
और उसके नीचे एक नई लकीर — “चौथा काम: सुनीता का नाम। बसवा। सुबह राजेंद्र के साथ।”
मैंने टोकन राजेंद्र को नहीं दिखाया। जेब में वापस रखा।
“अब?” बंसी ने पूछा।
“अब सुबह का इंतज़ार,” मैंने कहा। “और सुबह होते ही — बसवा।”
बंसी ने खिड़की के बाहर देखा। “सुबह तक भवानी बेठक नहीं रहेगा।”
“जानता हूँ,” मैंने कहा। “इसीलिए बंडल यहीं रहेगा — थाने में। और हम सुबह छह बजे बसवा के लिए निकलेंगे।”
राजेंद्र ने काग़ज़ों को एक बड़े लिफ़ाफ़े में रखा और सील लगाई। “मैं सुबह काग़ज़ ज़िले के दफ़्तर भिजवाऊँगा। और तुम सुबह मेरे साथ बसवा चलो। पर…”
“पर क्या?”
“अभी रात में घर जाओ। रीना और माँ इंतज़ार में बैठी होंगी। और छोटू — उसे भी देखना।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो थक कर बैठ गया था, कलाई पर पट्टी जैसा कपड़ा बाँधे। मैं उसके पास बैठा।
“तेरी चाय दुकान अब कब खुलेगी?”
“जब भवानी सिंह का अंगूठा काग़ज़ पर लगेगा,” बंसी ने कहा, और पहली बार उस रात वो हँसा। “या जब तेरे बाप का नाम सबके सामने आएगा। तब तक तो बंद ही रहेगी।”
मैं उठा। बाहर आकर देखा — पूरब की तरफ़ आसमान में हल्की लकीर दिख रही थी। रात ख़त्म हो रही थी। और अगली सुबह तक बहुत कुछ तय होना था।
थाने से निकलते वक़्त मेरे फ़ोन पर एक मैसेज आया — रीना का। “घर आ जा। छोटू जाग गया है। और वो कुछ कह रहा है — ‘दादाजी आए थे।’”
मैंने मैसेज पढ़ा और गाड़ी रोक दी।
“क्या हुआ?” बंसी ने पूछा।
“छोटू जाग गया है। और वो कह रहा है कि उसके दादाजी आए थे।”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। “उसका दादा तो मर चुका है।”
“हाँ,” मैंने कहा। “पर छोटू कहता है — दादाजी ने उसे बताया कि हवेली में एक और कमरा है। जिसे कोई नहीं जानता।”
गाड़ी का दरवाज़ा खुला, और सुबह की पहली हवा अंदर आई।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला, और सुबह की पहली हवा अंदर आई। ठंडी नहीं थी, बस हल्की — जैसे रात भर की थकान को धीरे से धक्का दे रही हो।
“तुम घर जाओ,” राजेंद्र ने कहा। “मैं थाने में रहता हूँ। सुबह छह बजे मिलते हैं।”
“छह बजे?” बंसी ने कहा। “भाई साहब, अभी तो चार बजे का अंदाज़ा है। मुझे दो घंटे की नींद दे दो।”
“तेरे लिए थाने में चारपाई है,” राजेंद्र ने कहा। “जा, सो जा।”
बंसी उतर गया। मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। घर का रास्ता खाली था। सड़क के किनारे एक ठेले वाला चाय का पानी उबाल रहा था। मैंने गाड़ी रोकी और दो कप ले लिए।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। रीना आँगन में बैठी थी, छोटू उसकी गोद में। माँ पास ही चटाई पर। माँ के हाथ में रोटी थी, आधी बनी।
“तुमने सुबह की चाय नहीं पी,” माँ ने कहा। “बैठ।”
“माँ, पहले छोटू…”
“छोटू ठीक है। बैठ।”
मैं बैठ गया। छोटू ने मेरी तरफ़ देखा और अपनी उँगली से आँगन के पीछे की तरफ़ इशारा किया।
“दादाजी वहाँ से आए,” उसने कहा। “पीछे वाले कमरे से।”
“कौन से कमरे से, बेटा?”
“जिसमें सीढ़ी है।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। “हमारे घर के पीछे कोई सीढ़ी नहीं है, मन्नू। मैंने देखा।”
“मैंने भी देखा,” छोटू ने कहा, और उसकी आवाज़ में बड़ों जैसी ज़िद थी। “दादाजी ने कहा — ईंट गिनो। बाईं तरफ़ से सातवीं ईंट।”
माँ की रोटी बनाने वाली उँगली रुक गई।
“क्या बोला?”
“सातवीं ईंट, दादी। बाईं तरफ़ से।”
माँ ने रोटी रख दी और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर नहीं था जो आम तौर पर होता। कुछ और था। पहचान।
“तुम्हारे पापा जब छोटे थे,” माँ ने धीरे से कहा, “तो उन्होंने एक बार कुछ ऐसा ही कहा था। मुझे तब समझ नहीं आया। मैंने सोचा, बच्चे की बात है।”
“क्या कहा था पापा ने?”
“कहते थे — माँ, हमारे घर में एक कमरा और है। बंद है। कोई नहीं जानता।”
मैं खड़ा हो गया।
“माँ, तुमने कभी बताया नहीं?”
“क्या बताती? पूरा गाँव कहता था तुम्हारे बाप को सपने आते हैं। मैंने भी सोचा, सपना होगा।”
“सपना नहीं है,” छोटू ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में नींद नहीं थी। “दादाजी ने मुझे हाथ से पकड़कर दिखाया। वो कमरा सच में है।”
रीना ने छोटू को गोद से उतारा और मेरे पास आकर खड़ी हो गई। “मन्नू, ये बातें… अभी भी इनका कोई मतलब है? हमारे पास काग़ज़ हैं। पुलिस है। भवानी जा रहा है।”
“रीना,” मैंने कहा, “भवानी यहाँ से गया, यह नहीं कहा कि हार गया। वो बोलकर गया — जिस काग़ज़ पर अपने बाप का नाम हो, वो आधा सच बोलता है। उसे पता है कि बंडल में क्या है। और वो इसे बेकार करने के लिए कुछ करेगा। शायद आज ही।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। “तो तुम सुबह बसवा नहीं जाओगे?”
“जाऊँगा। पर उससे पहले — ये कमरा।”
हम पीछे वाले हिस्से में पहुँचे। छोटू हमारे आगे-आगे चल रहा था, जैसे उसे रास्ता पहले से पता हो। हमारे घर की पिछली दीवार पुरानी थी, कच्ची-पक्की। छोटू बाईं तरफ़ से ईंटें गिनने लगा।
“एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह… सात.”
वो सातवीं ईंट पर रुका। उसने छुआ। कुछ नहीं हुआ। उसने थोड़ा ज़ोर लगाया। ईंट हिली नहीं। माँ ने साँस रोक ली थी।
“छोटू, शायद…”
“मन्नू भैया, दादाजी ने कहा था — पहले ईंट को बोलना पड़ता है।”
“बोलना?”
छोटू ने ईंट से अपना कान सटाया और धीरे से कुछ फुसफुसाया। मैं उसके होंठ नहीं पढ़ पाया। पर जो हुआ, वो साफ़ था — ईंट अंदर की तरफ़ ढुलक गई, और उसके पीछे एक छोटा-सा गड्ढा दिखा। गड्ढे के अंदर लोहे की एक पट्टी थी।
“रीना, टॉर्च लाओ।”
टॉर्च आई। मैंने पट्टी खींची। दीवार के अंदर से एक पतला तार निकला, और पत्थर की आवाज़ आई — धीमी, जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ हिल रही हो। दीवार कोई दीवार नहीं थी। नीचे की तरफ़ सरककर दरवाज़ा बन गई।
अंदर एक सीढ़ी थी। नीचे की तरफ़ जाती हुई। चार सीढ़ियाँ ही दिखीं, उसके बाद अंधेरा।
“मैं नहीं आ रही,” रीना ने कहा। “कोई और हो तो जाए। पर छोटू नहीं जाएगा।”
“मैं अकेला जाऊँगा,” मैंने कहा। “तुम दरवाज़े पर रहो। अगर मैं एक मिनट में न निकलूँ, तो माँ को बुला लेना।”
मैं उतरने लगा। सीढ़ियाँ पथरीली थीं और नमी थी। नीचे उतरकर मैंने टॉर्च फेरी। कमरा छोटा था — एक तरफ़ लकड़ी की अलमारी, ऊपर धूल की मोटी परत। अलमारी के पास एक फटी चारपाई और उस पर एक पोटली।
पोटली खोली। अंदर एक डायरी, दो मोमबत्तियाँ, और एक काग़ज़। काग़ज़ पर पापा की लिखाई थी। मैंने उसे टॉर्च के नीचे रखा।
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