The Token System – Chapter 42
“पहले मेरी सुनो।” उन्होंने फ़ाइल उठाई। “पिछले तीन दिन में भवानी के नर्सिंग होम से जो मरीज़ मेरे पास आए हैं, उनमें से तीन की हालत अचानक बिगड़ी है। तीन। जबकि यहाँ सरकारी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था और वो ठीक जा रहे थे।”
“मतलब?”
“मतलब यह कि जिसे भवानी के होम में भेजा गया, उसकी हालत तीन दिन में गिर गई। मुझे काग़ज़ों पर भरोसा नहीं, मरीज़ पर भरोसा है। और मरीज़ वापस आ रहे हैं — पिछले दरवाज़े से, रात को, जैसे कोई उन्हें छुपकर भेज रहा हो।”
मैंने पर्ची जेब से निकालकर उनकी मेज़ पर रखी। “ये पढ़िए।”
उन्होंने पढ़ा। फिर मुझे देखा। “ये किसकी लिखाई है?”
“पता नहीं। हवेली की दीवार में मिली।”
“मन्नू, तुम मुझे डरा रहे हो या सच बता रहे हो?”
“सच बता रहा हूँ। शायद भवानी ने कुछ नया शुरू किया है। उसका टोकन अब जाग उठा है। और जब उसका हिसाब तेज़ चलता है, तो… तो किसी को भरना पड़ता है।”
सुमन ने फ़ाइल बंद की। “मैं डॉक्टर हूँ, ज्योतिषी नहीं। पर एक बात जानती हूँ — जब किसी के मरीज़ों की हालत अचानक गिरती है, तो उसके पीछे कोई आदमी होता है, कोई दवा होती है, या कोई दफ़्तर होता है। मैं तीनों देख रही हूँ।”
“तीनों?”
“आदमी — भवानी। दवा — उसके होम की दवाइयाँ, जो ख़ुद भरती हैं। दफ़्तर — उसका वो काग़ज़ों का कमरा जहाँ शेखर बाबू का हस्ताक्षर चलता है।” उन्होंने मुझे घूरा। “तुम मुझसे सीधा पूछो — तुम क्या चाहते हो?”
“मैं चाहता हूँ कि आज कोई न मरे।”
वो एक पल रुकीं। “तो अस्पताल में रहो। और अगर तुम्हें किसी मरीज़ के बारे में कुछ पता चले, मुझे पहले बताओ। पहले। समझे?”
“समझा।”
दिन भर मैं एक्स-रे कमरे में रहा, पर मेरा दिमाग़ वहाँ नहीं था। हर फ़ाइल खोलता, हर नाम पढ़ता, और छोटू की माँ, सुनीता, उन तीन मरीज़ों के नाम याद करता जो सुमन ने गिनाए थे। शाम पाँच बजे मैं बंसी की दुकान पर पहुँचा। वो अख़बार बिछाए बैठा था, सामने ठंडी चाय।
“बैठ,” उसने कहा, और उसका लहजा ऐसा था कि मैं बैठ गया।
“क्या है?”
“सुना है, भवानी के आदमी आज किसी बच्चे को इलाज के नाम पर शहर से बाहर ले जाने वाले हैं। कोई बच्चा, जिसकी कोई पूछ नहीं।” उसने अख़बार की तरफ़ इशारा किया। “कल रात एक टेम्पो खेत्री से निकला था। उसमें दो आदमी थे और एक छोटा बंडल — कपड़े में लिपटा।”
मेरे हाथ से चाय का गिलास छूटते-छूटते बचा।
“कौन सा बच्चा?”
“कहते हैं कि एक झुग्गी वाला। माँ अस्पताल में है, बच्चा किसी के पास।”
छोटू।
मैंने बिना सोचे जेब में हाथ डाला। टोकन निकाला। और जैसे ही मेरी उँगली उसे छुई, मेरी हथेली जल उठी। मैंने उसे गिराते-गिराते बचाया, टेबल पर रखा। वो चमक रहा था — पीतल के रंग से भी गहरा, जैसे भीतर से कोई आग जल रही हो।
और फिर आवाज़ आई। सीधी, साफ़, कान में, जैसे कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा हो।
“तीन घंटे। छोटू ख़तरे में।”
बंसी उठ खड़ा हुआ। “क्या हुआ? तेरा चेहरा क्यों…”
“छोटू,” मैंने कहा। “तीन घंटे।”
“कहाँ?”
“पता नहीं। बस इतना कहा।” मैंने टोकन उठाया, हथेली पर रखा — अब भी गरम था। “बंसी, टोकन कोई सलाह नहीं देता। पर जब वो नाम लेता है, तो नाम सच होता है।”
“तो ढूँढना पड़ेगा। कहाँ से शुरू करें?”
मेरा दिमाग़ दौड़ा। छोटू कहाँ होगा? अस्पताल में नहीं — वहाँ मैंने उसे सुबह देखा था, वार्ड के बाहर खेलते हुए। घर पर? काकी के पास? रामगंज?
“काकी के घर चल। अभी।”
हम साइकिल पर भागे। रास्ते में मैंने एक बार पीछे देखा — कोई पीछा नहीं कर रहा था, पर मुझे लगा कि हवा में एक हल्की सी गंध है। पीतल की। जैसे किसी ने कुछ जलाया हो।
रामगंज की गली में पहुँचे तो काकी का दरवाज़ा खुला था। काकी बाहर चौखट पर बैठी थीं, लाठी पास, आँखें सूजी हुईं।
“काकी, छोटू?”
“गया,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो रोने से पहले आती है। “दोपहर को दो आदमी आए। कहने लगे — बच्चे को डॉक्टर दिखाने ले जा रहे हैं, सरकारी अस्पताल में। मैंने कहा, मैं साथ चलूँगी। उन्होंने कहा — बूढ़ी को कौन ले जाएगा, हम लाते हैं। छोटू मेरी आवाज़ सुनकर बाहर आया, वो उसे उठाकर गाड़ी में बैठा दिया। मैंने लाठी उठाई, पर गाड़ी निकल गई।”
“कैसी गाड़ी?”
“सफ़ेद। पीछे लिखा था — नर्सिंग होम।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “भवानी का।”
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। भवानी ने छोटू को उठा लिया। पर क्यों? छोटू से उसे क्या? फिर याद आया — छोटू वो बच्चा था जो पुराने रिकॉर्ड कमरे की दराज़ से हवेली की चाबी ले आया था। छोटू वो बच्चा था जिसने जाली पन्नी नहीं मानी। छोटू वो गवाह था जो कल रात हवेली के पास था।
“छोटू ने कुछ देखा है,” मैंने कहा। “भवानी उसे इसलिए ले गया है।”
“या फिर वो उसके ज़रिए कुछ निकलवाना चाहता है,” बंसी ने कहा। “बच्चा डर जाएगा, कुछ बोल देगा।”
मैंने टोकन फिर निकाला। अब भी गरम था, पर पहले से कम। मैंने उसे हथेली में दबाया और धीरे से कहा, बिना आवाज़ के, बस अंदर से — “कहाँ?”
टोकन पर कोई लकीर नहीं उभरी। बस गरमाहट थी। मैंने उसे जेब में रखा।
“तीन घंटे में से एक घंटा निकल गया,” बंसी ने कहा। “अब क्या?”
“नर्सिंग होम चल।”
“पागल है? वहाँ भवानी के आदमी…”
“तो क्या? छोटू वहाँ है।”
“तू कैसे जानता है वहीं है?”
“नहीं जानता। पर गाड़ी वहीं गई। और अगर भवानी उसे शहर से बाहर भेजेगा, तो पहले अपने होम में रखेगा। काग़ज़ बनाएगा। फिर भेजेगा।”
काकी अचानक उठीं। “मैं भी चलूँगी।”
“काकी, आप रुकिए।”
“मैं रुकी तो वो गया। अब नहीं रुकूँगी।” उसने लाठी उठाई। “मुझे उस होम के दरवाज़े तक ले चल। बाकी मैं देख लूँगी।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने हाँ में सिर हिलाया। काकी को रोकना बेकार था, और सच कहूँ तो उनका गुस्सा मुझे हिम्मत दे रहा था।
अस्पताल के बाहर राजेंद्र मिला। मैंने उसे सब बताया — छोटू, गाड़ी, नर्सिंग होम।
“फ़रियाद दर्ज कराओ,” उसने कहा।
“फ़रियाद में वक़्त लगेगा। छोटू के पास एक घंटा है।”
“मेरे पास वारंट नहीं है, मन्नू।”
“वारंट कल होगा। बच्चा आज ज़िंदा होना चाहिए।”
राजेंद्र ने अपनी छड़ी दूसरे हाथ में ली, जैसे कोई फ़ैसला कर रहा हो। “मैं तेरे साथ चलता हूँ। गवाह के तौर पर। अगर कुछ गड़बड़ हुई, तो मैं वहाँ हूँ — बस।”
“बस इतना काफ़ी है।”
हम तीन — मैं, बंसी, राजेंद्र — और पीछे काकी ऑटो में। शाम ढल रही थी। नर्सिंग होम का सफ़ेद भवन दूर से चमक रहा था, जैसे कोई मुस्कुरा रहा हो।
गेट पर गार्ड था। उसने हमें देखा और अंदर फ़ोन करने लगा।
राजेंद्र आगे बढ़ा। “पुलिस। हमें एक बच्चे के बारे में पूछना है जो आज दोपहर यहाँ लाया गया।”
गार्ड का चेहरा बदला। “सर… मुझे कुछ नहीं पता…”
“तेरे पास एक मिनट है,” राजेंद्र ने कहा। “उसके बाद मैं अंदर जाकर ख़ुद ढूँढूँगा।”
गार्ड ने फ़ोन रखा। “तीसरी मंज़िल। बंद कमरा। पर सेठ जी ने मना किया है…”
हम अंदर भागे। सीढ़ियाँ, गलियारा, तीसरी मंज़िल। एक दरवाज़ा बंद। मैंने ज़ोर लगाया, नहीं खुला। बंसी ने अपना कंधा दिया, राजेंद्र ने लात मारी — दरवाज़ा खुल गया।
अंदर छोटू था। कुर्सी पर बैठा, हाथ बँधे, आँखों में आँसू, सामने एक प्लेट में खाना जो छुआ नहीं। मुझे देखकर वो चीखा।
“मन्नू भैया!”
मैंने रस्सियाँ खोलीं। वो मुझसे चिपक गया। उसका शरीर काँप रहा था।
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