The Token System – Chapter 43
“कुछ किया उन्होंने?” मैंने पूछा।
“कह रहे थे — काग़ज़ पर अंगूठा लगा दे। मैंने मना किया। फिर कहने लगे, तेरी माँ को नहीं छोड़ेंगे।” उसने मेरी शर्ट पकड़ी। “मन्नू भैया, माँ ठीक है?”
“ठीक है। बिलकुल ठीक। अब तू भी ठीक है।”
काकी ऊपर आईं। छोटू को देखकर उनके हाथ से लाठी गिर गई। वो बैठ गईं, छोटू को गोद में लिया, और कुछ नहीं बोलीं। बस उसका सिर सहलाती रहीं।
राजेंद्र ने कमरे की तलाशी ली। एक दराज़ में काग़ज़ मिले — खाली फ़ॉर्म, जिन पर बच्चों के नाम लिखे थे। उनमें एक नाम छोटू का भी था, और सामने लिखा था — “बाहर भेजना।”
“ये क्या है?” राजेंद्र ने गार्ड से पूछा।
“सर… मुझे नहीं पता… सेठ जी का काम है…”
राजेंद्र ने फ़ॉर्म अपने थैले में रखे। “ये मेरे पास रहेंगे।”
हम नीचे उतरे। गेट के बाहर काकी ऑटो में बैठीं, छोटू उनकी गोद में सो गया था। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“टोकन?”
मैंने जेब से निकाला। अब भी गरम था, पर हल्का। और उस पर एक लकीर उभर रही थी, धीरे-धीरे, जैसे कोई लिखता जा रहा हो।
“छोटू बचा। हिसाब: दो घंटे बाकी।”
मैंने टोकन को जेब में रखा। दो घंटे बाकी — मतलब कुछ और आने वाला था। छोटू बच गया, पर खाता अभी बंद नहीं हुआ।
राजेंद्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “आज के लिए बहुत हो गया। घर चल।”
“राजेंद्र, दो घंटे।”
“क्या?”
“टोकन कह रहा है — दो घंटे बाकी। कुछ और होने वाला है।”
राजेंद्र ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, फिर मेरे चेहरे की तरफ़। वो कुछ पूछना चाहता था, पर पूछा नहीं। शायद इसलिए कि जवाब वो सुनने को तैयार नहीं था।
घर पहुँचा तो माँ चाय बना रही थीं। रीना दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ में फ़ोन।
“मन्नू,” उसने कहा, “तेरे लिए फ़ोन आया था। कोई आदमी था। कह रहा था — भवानी सिंह आज रात नौ बजे उसी पुरानी हवेली में मिलेगा। अकेले।”
मैं रुका। घड़ी देखी — साढ़े सात बज रहे थे। डेढ़ घंटा।
“उसने यह क्यों कहा?” रीना ने पूछा।
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन अब भी गरम था, पर इतना नहीं कि जलाए। मैंने उसे बाहर निकाला। उस पर नई लकीर उभर रही थी — पुरानी मिट चुकी थी।
“आज रात हवेली में आख़िरी हिसाब। दोनों तरफ़ से।”
मैंने रीना की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो डर नहीं था जो मुझे होना चाहिए था — बस एक सीधा सवाल।
“तू जाएगा?”
“हाँ।”
“तो मैं भी चलूँगी।”
“रीना…”
“मन्नू, तूने मुझसे झूठ न बोलने की शर्त रखी थी। अब मैं तुझसे शर्त रख रही हूँ — अकेले मत जा।”
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ा रही थीं। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
“जा,” उन्होंने कहा। “पर लौटकर आना। दोनों।”
मैंने गिलास हाथ में लिया। बाहर अंधेरा घिर आया था। और कहीं, दूर, हवेली की तरफ़, एक पीतल का टोकन इंतज़ार कर रहा था — न मेरा, न भवानी का, बस हिसाब का।
॥
दोनों के लौटने की बात माँ के मुँह से सुनकर मैंने चाय का गिलास नीचे रख दिया और जूते पहनने लगा। घड़ी देखी — साढ़े सात बज चुके थे। रीना ने भी अपना दुपट्टा सिर पर रखा।
तभी मेरा फ़ोन बजा। स्क्रीन पर अस्पताल का नंबर चमक रहा था। मैंने उठाया।
“मन्नू?” दूसरी तरफ़ डॉक्टर सुमन की आवाज़ थी, पर सपाट। “तू आज वार्ड में छोटू नाम का बच्चा देखने आया था?”
मेरे हाथ से जूता छूट गया। “वो वार्ड में है। काकी के साथ। मैंने उसे अभी नर्सिंग होम से छुड़ाया है।”
“वो यहाँ नहीं है,” सुमन ने कहा। “काकी थोड़ी देर पहले आई थीं, पूछ रही थीं कि छोटू कहाँ है। मैंने सोचा तू जानता होगा।”
रीना ने मेरा चेहरा देखा। उसने दुपट्टा वहीं छोड़ दिया।
मैंने तुरंत बंसी को फ़ोन मिलाया। वो दुकान बंद कर रहा था। उसकी आवाज़ सुनते ही मैंने कहा, “खोखे पर रुक। मैं आ रहा हूँ। छोटू ख़तरे में है।”
दो मिनट में मैं और रीना गली के मुँह पर पहुँचे। बंसी साइकिल पर बैठा था। मैंने उसे सब बताया।
“सफ़ेद कोट वाला?” बंसी ने दुकान की शटर खींची। “अरे, उस नर्सिंग होम के गार्ड ने राजेंद्र को बोला था कि सेठ के दो आदमी सफ़ेद कोट पहनकर मरीज़ों को ले जाते हैं, ताकि कोई पूछे नहीं।”
मैंने राजेंद्र को फ़ोन लगाया। एक घंटी भी पूरी नहीं हुई — “हाँ मन्नू, बोल।”
“छोटू गया है। भवानी के होम से रास्ते में किसी ने उसे सफ़ेद कोट पहनकर उठाया।”
“क्यों उठाएँगे, जब मैंने उसे छुड़ा दिया? अब तो फ़ॉर्म भी मेरे थैले में हैं।”
“शायद इसलिए कि छोटू ने तीसरी मंज़िल का कमरा देख लिया, गार्ड का चेहरा देख लिया। डरा हुआ गवाह ज़ुबान बदल देता है। और बच्चा है — उससे तो कुछ भी कहलवा सकते हैं।”
राजेंद्र दो मिनट में गाड़ी लेकर आ गया। रीना पहले ही पीछे बैठ चुकी थी।
“तू नहीं,” मैंने कहा।
“मन्नू, माँ को वादा किया था — दोनों लौटेंगे। तेरे पीछे-पीछे मैं ऑटो में आ जाऊँगी। तुझे ये झगड़ा अच्छा लगता है?”
मैं चुप हो गया। बंसी हँसा। “भाई, ये तो तेरी बहन है — नाम रीना, हठ रीना।”
गाड़ी भवानी के नर्सिंग होम की तरफ़ भागी। रास्ते में राजेंद्र ने सायरन नहीं बजाया। “अंदर घुसकर पहले बच्चा ढूँढेंगे,” वो बोला। “झगड़ा अगर करना हो तो बाद में।”
शहर के बाहर वाला सफ़ेद भवन आते ही दिख गया। दरवाज़े पर गार्ड नहीं था। इससे मेरा पेट और कड़ा हो गया।
हम गाड़ी से उतरे ही थे कि पास की पुरानी दीवार से एक छाया निकली। शेखर बाबू। चश्मा टेढ़ा, कुर्ता सिलवटों में।
“मन्नू,” उसने फुसफुसाकर कहा, “तू आ गया। भगवान का शुक्र है।”
“ख़बरदार।” मेरी आवाज़ कड़ी थी। “अगर ये तेरी चाल है…”
“नहीं, नहीं।” उसने हाथ जोड़े। “मैं उस वक़्त ही फ़ोन पर था जब वो आदमी बच्चे को लेकर आया। मैंने मना किया, पर मुझे किसी ने पूछा भी नहीं। बच्चा पीछे के कमरे में है। उसे कुछ पिला दिया है — नींद की दवा। वो उठेगा भी तो ठीक से नहीं।”
“तू अंदर क्यों है?” राजेंद्र ने पूछा।
“सेठ ने मुझे रात की ड्यूटी पर रखा है। कह रहा है — काग़ज़ फाड़ने हैं, हिसाब बदलने हैं।” उसने जेब से चाबी निकाली। “पीछे का दरवाज़ा इससे खुलेगा। गेट पर ताला है, पर पीछे की तरफ़ खुला है।”
हम पीछे की तरफ़ गए। राजेंद्र ने अपनी जेब से बंदूक निकालकर देखी, फिर वापस रखी। “मैं पहले जाऊँगा," उसने कहा। “मन्नू पीछे। बंसी दरवाज़े पर रह।”
“दरवाज़े पर रीना है। मैं अंदर जाऊँगा,” बंसी ने कहा।
“बंसी…”
“अरे, मैंने भी तो हिसाब लेना है सेठ का। तेरे साथ चलूँगा।”
रीना ने मेरी कलाई पकड़ी। “मैं यहीं हूँ। दरवाज़ा खुला रखना।”
दरवाज़ा खुला। अंदर अंधेरा, दवा की तेज़ महक। गलियारा छोटा था, दोनों तरफ़ बंद कमरे। राजेंद्र एक-एक दरवाज़े पर टॉर्च मार रहा था। मुझे शेखर की बताई जगह याद थी — पीछे वाला कमरा।
दरवाज़ा धक्का देने पर खुल गया।
छोटू चारपाई पर पड़ा था। मुँह खुला, आँखें बंद, साँस धीमी। उसके कुर्ते का एक हिस्सा गीला था।
“छोटू!” मैंने उसे गोद में उठाया। बदन ठंडा था। उसके गाल पर हल्की थपकी दी। कोई हरकत नहीं। बंसी ने उसके हाथ-पैर देखे।
“चलता है,” बंसी ने कहा। “नींद की दवा है। ज़्यादा नहीं दी — वरना होंठ नीले होते।”
“बाहर ले चल,” राजेंद्र ने कहा। “मैं ये कमरा देखता हूँ।”
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