The Token System – Chapter 40
“हवेली का बक्सा?” बंसी ने कॉपी बंद कर दी। “भवानी अब वहाँ कुत्ता भी नहीं घुसने देगा।”
“घुसने की ज़रूरत नहीं।” मैं उठा। “छत पर जाने का रास्ता दीवार के पीछे से है, पीपल के पास। काकी ने बताया था।”
“मन्नू।” बंसी भी उठ खड़ा हुआ। “तू अकेला नहीं जाएगा।”
“तू दुकान कौन संभालेगा?”
“दुकान दो दिन बंद रही तो कोई मर नहीं जाएगा।” उसने कॉपी दराज़ में रखी और चाबी जेब में डाली।
रात के ग्यारह बजे थे। गली में एक भी दीया नहीं जल रहा था, सिर्फ़ हवेली की दीवार पर लगी एक पुरानी बत्ती टिमटिमा रही थी। पीपल के नीचे अंधेरा इतना गाढ़ा था कि अपने हाथ भी न दिखें।
बंसी ने दीवार पर हाथ टेका। “ईंटें ढीली हैं।”
“ऊपर जाकर बायीं तरफ़ पकड़ना। वहाँ खप्पर है।”
बंसी पहले चढ़ा। मैं उसके पीछे। दीवार की सीलन हथेलियों से चिपक रही थी। आधे रास्ते पर पैर फिसला, पर बंसी ने कलाई पकड़ ली। हम दोनों छत पर पहुँचे। छत पर सूखी घास और टूटी मुंडेर। कोने में वही पुराना बक्सा रखा था — लोहे का, ऊपर ज़ंग लगी हुई।
बक्सा खुला था।
मैंने भीतर हाथ डाला। परत-दर-परत धूल, कुछ फटे काग़ज़, एक टूटा दीया। असली टोकन नहीं था।
“देर हो गई,” बंसी ने धीरे से कहा।
“नहीं।” मैंने काग़ज़ों को उठाया। नीचे की तरफ़, लोहे के तले में कुछ खुदा हुआ था — छोटे-छोटे अक्षर, किसी ने कील से खरोंचे थे। “यह देख।”
बंसी ने लालटेन की रोशनी आगे की। मैं पढ़ता गया — “जो इस बक्से को खोले, वो जाने — असली हिसाब हवेली में नहीं, हवेली के नीचे है।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “नीचे?”
“तहखाना,” मैंने कहा। “सुनीता ने एक बार फुसफुसाते हुए कहा था — हवेली के नीचे एक कमरा है, जिसका दरवाज़ा लालाजी के कमरे के पीछे है।”
“और वो दरवाज़ा?”
“भवानी ने ईंट से चिनवा दिया होगा।” मैंने काग़ज़ जेब में रखा।
तभी नीचे गली में गाड़ी का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। हम दोनों दबकर बैठ गए। दो आदमी हवेली के सहन में घुसे। एक की आवाज़ मोटी थी।
“सेठ जी ने कहा है, सुबह तक काग़ज़ तैयार चाहिए। बूढ़े को ले जाओ, तहसील के बाहर कहीं रखो। दो दिन में काम हो जाए।”
दूसरा हँसा। “और वो लड़का? जो दुकानदार के साथ घूमता है?”
“उसका भी इंतज़ाम है। सेठ जी ने अलग आदमी रखा है।”
मेरी मुट्ठी भिंच गई। मैं उठने ही वाला था कि बंसी ने कोहनी दबाई। उसने सिर हिलाया — नहीं।
आदमी चले गए। गाड़ी दूर जाकर सुनाई देना बंद हो गई।
“लालाजी को उठाना है,” मैंने कहा। “अभी।”
नीचे उतरे, दीवार फाँदी, और लालाजी के घर के पिछले दरवाज़े पर हाथ मारा। खिड़की में रीना का चेहरा दिखा।
“कौन?”
“मैं। दरवाज़ा खोल।”
लालाजी गद्दे पर बैठे थे, चादर गले तक खींचे हुए। रीना ने दीया जलाया।
“काग़ज़ मैंने तहसील भेज दिया,” मैंने कहा। “पर भवानी को पता चल गया है। वो आपको बाहर ले जाने वाला है। आज रात।”
लालाजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “तो मैं यहाँ से भाग जाऊँ?”
“नहीं, भागेंगे तो वही पकड़े जाएँगे।” मैंने उनके सामने बैठकर कहा। “आपका कमरे के पीछे एक दरवाज़ा है। तहखाने का। सच बोलिए।”
लालाजी ने रीना की तरफ़ देखा। वो चुप खड़ी थी।
“है,” लालाजी ने कहा। “पर मेरे पिता ने उसे बंद करवा दिया था। भवानी के दादा ने कहा था — खोलोगे तो सब बिगड़ जाएगा।”
“तहखाने में क्या है?”
“मुझे नहीं पता।” वो काँप रहे थे। “बस इतना सुना है — हवेली का असली काग़ज़ वहीं रखा गया था। सेठ ने मरने से पहले सब कुछ वहीं रखवाया था।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ ठंडे थे, मुझे पता था — अब असली खेल की शुरुआत हो रही थी। भवानी को अगर तहखाने का पता होता, तो वो अब तक उसे खोल चुका होता। शायद उसके दादा ने उसे बताया ही नहीं। और शायद उसी को खोजने के लिए वो लालाजी का अंगूठा चाहता था — तहखाने की चाबी लालाजी के पास थी।
“चाबी कहाँ है?” मैंने पूछा।
लालाजी कुछ देर मुझे देखते रहे, फिर उन्होंने गले से एक धागा निकाला। उसमें एक लोहे की छोटी चाबी बँधी थी, काले रंग में डूबी हुई।
“यही चाबी भवानी चाहता है,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। “और यही काग़ज़ पर मेरा अंगूठा है — क्योंकि इस हवेली का आख़िरी काग़ज़ तहखाने में पड़े संदूक में है, और उस संदूक की चाबी मेरे पास।”
रीना ने धीरे से कहा, “तो आपने मुझे कुछ नहीं बताया?”
“डर था बेटी। भवानी का आदमी हर जगह है।”
बंसी पहले से ही उठ चुका था। “तो देर किस बात की? अभी खोलते हैं। रात में ही। सुबह भवानी के आदमी आ जाएँगे।”
लालाजी ने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई। मेरा हाथ बढ़ा ही था कि दरवाज़े पर तीन ज़ोर की दस्तक हुई।
सब रुक गए।
“लाला जी!” आवाज़ टेढ़ी थी, पहचानी सी। “सेठ जी ने बुलाया है। गाड़ी सामने खड़ी है।”
लालाजी ने चाबी मेरी हथेली में दबा दी और मेरे कान के पास फुसफुसाए, “पीछे से निकल जाओ। मैं इन्हें बातों में लगाता हूँ। तुम चाबी से संदूक खोलो — और हाँ, रीना को साथ ले जाओ।”
“मैं यहाँ रहूँगी,” रीना ने कहा, ऊँची आवाज़ में।
“रीना।”
“बाबा अकेले कैसे रहेंगे?” उसने मेरी तरफ़ देखा। “आप जाइए। मैं इन्हें कुछ नहीं होने दूँगी। दरवाज़ा खोलो तो जाने दो — मैं कहूँगी बाबा बीमार हैं, सुबह ही चलेंगे।”
देर नहीं थी। मैंने रीना की आँखों में देखा, फिर सिर हिलाया और बंसी के साथ पिछली खिड़की से बाहर उतर गया।
तहखाने का दरवाज़ा बाहर से नहीं, लालाजी के कमरे के पीछे एक तंग सी बनी हुई दीवार के पीछे था। बंसी ने दीवार पर हाथ रगड़ा। सीमेंट कच्चा था — नई ईंटें, नया प्लास्टर। पुराना दरवाज़ा उसी के पीछे छिपा था।
“दो चार ईंटें निकालनी पड़ेंगी,” बंसी ने कहा। “पर आवाज़ होगी।”
“तो तेज़ी से।” मैंने जेब से छुरी निकाली और प्लास्टर पर चोट मारी।
पन्द्रह मिनट में तीन ईंटें निकली। पीछे से लकड़ी का दरवाज़ा दिखा, जिस पर उकेरा हुआ था — एक तराज़ू, और उसके दोनों पलड़ों पर एक-एक ढेर। मैंने चाबी डाली। ताला चरमराया, फिर खुल गया।
भीतर अंधेरा था, पर हवा सीलन भरी और ठंडी। बंसी ने लालटेन आगे की। सामने, चार पुराने संदूक रखे थे। तीन खुले थे — खाली, काग़ज़ों के टुकड़े बिखरे हुए। चौथा, सबसे अंदर वाला, एक पत्थर की चौकी पर रखा था। उस पर भी ताला था, पर छोटा। मैंने नई चाबी डाली। ताला खुला।
संदूक में सिर्फ़ एक पोटली थी, लाल कपड़े में बँधी। मैंने खोला। भीतर एक काग़ज़, मोटा, मुड़ा हुआ — और उसी के ऊपर एक पीतल का टोकन रखा था। मेरी जेब का टोकन अचानक गरम हो उठा, इतना गरम कि मैंने खींचकर निकाला।
दोनों टोकन एक-दूसरे के सामने रखे, तो संदूक वाले टोकन पर लकीरें उभरने लगीं।
बंसी ने झुककर पढ़ा, “यह टोकन असली है। इसका जोड़ीदार जिसके पास है, वही इस हवेली का असली हिसाब जानेगा। हवेली की मालकियत के दो हिस्से — एक सेठ गोवर्धनदास का, दूसरा हरि सिंह का। पर हरि सिंह वाला हिस्सा कभी बिका नहीं, गिरवी रखा गया था। और गिरवी रखने वाला उस समय सिर्फ़ एक आदमी था — लालाजी के पिता। इसलिए लालाजी का अंगूठा।”
मैंने काग़ज़ खोला। काग़ज़ पर अंगूठे की स्याही की मुहर, तारीख़, गवाहों के नाम। मैं उसे पढ़ता गया, और जैसे-जैसे पढ़ता गया, कमरा ठंडा होता गया।
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