The Token System – Chapter 39
“हाँ।” लालाजी ने मुँह फेर लिया। “अंकित के नाम पर चार साल पहले एक ज़मीन का सौदा लिखा गया था। मैंने दस्तख़त किए थे। पर वो ज़मीन किसी और की निकली। मालिक अब अदालत जा रहा है, कह रहा है धोखाधड़ी हुई है।”
“तो?” मैंने पूछा।
“तो भवानी कहता है — वो केस उसके आदमी के ज़रिए वापस खिसका देगा। पर उसके लिए हवेली के काग़ज़ पर अंगूठा चाहिए।” लालाजी ने रीना की तरफ़ देखा। “तेरी शादी की शर्त उसी दिन की है जिस दिन काग़ज़ पर अंगूठा लगे।”
“यह ज़मीन की कीमत कितनी है?” रीना ने पूछा।
लालाजी चुप रहे।
“कितनी?”
“पाँच लाख,” लालाजी ने कहा। “पर केस में जान लगे तो और भी।”
मैं उस काग़ज़ को दोबारा देख रहा था। वो कटा हुआ कोना मेरी आँखों में खटक रहा था।
“लालाजी,” मैंने कहा। “यह काग़ज़ भवानी ने तुझे दिया या खुद बनवाया?”
“वो मेरे पास से लिया था,” लालाजी ने कहा। “असली है।”
“असली काग़ज़ का कोना ऐसे नहीं कटता।” मैंने उँगली से उस कटे हिस्से को टटोला। “यहाँ किसी और का नाम था। अंकित के नाम से पहले।”
अंकित खड़ा हो गया। “क्या?”
मैंने उसे काग़ज़ दिखाया। “देख। यहाँ का रंग अलग है। और मुहर का जो आधा हिस्सा साफ़ है, वो अंकित के नाम के नीचे नहीं जाती। यह किसी और काग़ज़ की नकल है — ऊपर जोड़ी गई है।”
लालाजी का चेहरा सफ़ेद हो गया। उन्होंने काग़ज़ मेरे हाथ से छीना और रोशनी में देखा।
“भवानी ने… भवानी ने मुझे धोखा दिया?” उनकी आवाज़ छोटी हो गई।
“भवानी किसी को ईमानदारी नहीं देता,” रीना ने कहा। “तू तो जानता है।”
“पर वो केस तो असली है!” लालाजी ने कहा। “अंकित के नाम पर नोटिस आया था। मैं तहसील में गया था।”
“केस असली हो सकता है,” मैंने कहा। “पर यह काग़ज़ जो तुझे फँसाया गया — यह भवानी ने खुद बनवाया। असली फ़ाइल छुपा दी, नकली तेरे हाथ में थमा दी। अब वो तुझे डरा रहा है इसी से।”
लालाजी सोफ़े पर बैठ गए। उनके हाथ काँप रहे थे। अंकित उनके पास बैठ गया।
“पापा, मैंने पहले भी कहा था,” अंकित बोला। “मुझे उस ज़मीन की ज़रूरत नहीं। तुम वो केस लड़ो, जो होगा देखा जाएगा। पर उनके काग़ज़ पर अंगूठा मत लगाओ।”
लालाजी ने मेरी तरफ़ देखा। “तू सच बता रहा है?”
“मैं तहसील में इसकी छानबीन करवा दूँगा,” मैंने कहा। “राजेंद्र के हाथ से। अगर यह काग़ज़ फ़र्ज़ी निकला, तो तेरा केस ख़त्म। और अगर असली है — तो भी केस भवानी नहीं, कानून लड़ेगा।”
लालाजी ने लंबी साँस ली। रीना खड़ी थी, हाथ जोड़े।
“मैं…” लालाजी ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। “ले जा। छानबीन कर।”
“पापा!”
“चुप।” लालाजी ने अंकित की तरफ़ देखा। “तेरे लिए ही तो सब किया था।” उनकी आँखें भर आईं।
रीना ने आगे बढ़कर लालाजी के पैर छुए। “तू मेरा रिश्ता भवानी के हाथ में मत रख। मेरे भाई के हाथ में रख। इसने अब तक जो किया है, वो सब इसी शहर के लिए किया है।”
लालाजी ने सिर हिलाया। मैंने काग़ज़ जेब में रखा और हम बाहर निकल आए।
गली में निकलते ही रीना ने मेरा हाथ पकड़ा।
“मन्नू, एक बात,” उसने कहा। “यह काग़ज़ अगर फ़र्ज़ी है, तो भवानी के पास और भी होंगे। आज तक जिनके भी अंगूठे लिए हैं, उनके काग़ज़ फ़र्ज़ी होंगे।”
“मतलब?”
“मतलब — हवेली की कीमत काग़ज़ से गिराना उसे नहीं, उसके हिसाब को बिगाड़ना चाहिए। वो सस्ते में हवेली लेना चाहता है। उसके हिसाब में जो नुक़सान छुपा है, वो उसी पर बैठेगा।”
मैंने रीना की तरफ़ देखा। कभी-कभी यह औरत मुझसे ज़्यादा समझती थी।
थाने में राजेंद्र अपनी कुर्सी पर बैठा था, सामने लालटेन रखी थी। हमने काग़ज़ उसके सामने रखा।
“यह देखो,” मैंने कहा। “कटा हुआ, जोड़ा हुआ, नकली। भवानी ने लालाजी को इससे डराया। मुझे पूरी छानबीन चाहिए — तहसील के पुराने रिकॉर्ड से मिलान।”
राजेंद्र ने काग़ज़ उलट-पलट कर देखा। “तू जानता है, यह सब खेल साफ़ कर देगा? भवानी अब आदमी नहीं भेजेगा। वो खुद आएगा।”
“तो आने दे।”
“नहीं, तू समझ।” राजेंद्र ने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरका दिया। “जब भवानी को पता चलेगा कि उसका काग़ज़ पकड़ा गया, तो वो हवेली को किसी और नाम पर बेच देगा, सिर्फ़ काग़ज़ मिटाने के लिए। कल तक में।”
मैं रुका।
“और हवेली की असली मालकियत सेठ गोवर्धनदास के नाम पर है, काकी कहती है।” राजेंद्र ने आँखें सिकोड़ीं। “अगर उस हिसाब पर कोई दावा कर दे, तो बिक्री रुक सकती है। कोई वारिस हो तो।”
मैं उठ खड़ा हुआ। “सुनीता का भाई।”
“क्या?”
“टोकन ने कहा था, सुनीता का भाई ज़िंदा है, बसवा में।” मैंने काग़ज़ जेब में रखा। “अब समझ आया — वो भाई सिर्फ़ सुनीता का नहीं, उस हवेली के हिसाब का भी हिस्सेदार हो सकता है।”
राजेंद्र ने कुर्सी पीछे सरकाई। “तो तू बसवा जा। पर एक बात याद रख — भवानी सुनेगा तो रास्ते में भी नहीं छोड़ेगा।”
“पहले काग़ज़ की छानबीन,” मैंने कहा। “कल तक।”
राजेंद्र ने सिर हिलाया।
रात को मैं बंसी की दुकान पर बैठा था। चाय ठंडी हो रही थी। बंसी सामने बैठा, हिसाब की कॉपी खोलकर, पर गिनती नहीं कर रहा था।
“देख,” मैंने कहा। “एक बात समझ नहीं आ रही। हवेली काग़ज़ से भवानी के नाम हो चुकी थी — तो वो लालाजी के अंगूठे के पीछे क्यों पड़ा है? उसके पास तो काग़ज़ पहले से हैं।”
बंसी ने कप रखा। “क्योंकि हवेली अभी उसके नाम नहीं है, मन्नू। जो काग़ज़ काकी ने दिखाए थे, उन पर सेठ का नाम है — सेठ की मौत के बाद बंटवारा अधूरा रहा। भवानी के दादा हरि सिंह ने काग़ज़ों पर कब्ज़ा किया, पर उसमें एक अंगूठा बाकी रह गया।”
“किसका अंगूठा?”
“जो हवेली के आख़िरी हिस्से का मालिक था,” बंसी ने कहा। “और वो अंगूठा लालाजी के पास था — क्योंकि लालाजी के पिता उस हिस्से के गवाह रहे। अब लालाजी के ज़रिए भवानी वो आख़िरी काग़ज़ पूरा करना चाहता है।”
मैंने टोकन जेब में टटोला।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “क्या?”
“तो लालाजी मरे हुए आदमी के अंगूठे से काम नहीं चला रहा,” मैंने कहा। “वो भवानी की लिस्ट में सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि वो काग़ज़ का आख़िरी कड़ी है।”
“हाँ,” बंसी ने कहा। “और अगर वो कड़ी टूट गई, तो भवानी का पूरा हिसाब अधूरा पड़ जाएगा।”
टोकन जेब में गरम हुआ। मैंने खींचकर निकाला। उस पर लकीर उभर रही थी, धीरे-धीरे गहरी होती हुई।
बंसी ने मेरी मुट्ठी की तरफ़ देखा। “क्या हुआ?”
मैंने टोकन हथेली में रखा, पढ़ा, और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
“क्या लिखा है?”
मैंने टोकन उसकी तरफ़ सरकाया। उस पर तीन लाइनें थीं — “दूसरा टोकन सक्रिय हुआ। दो पीतल, एक खाता।”
नीचे छोटा सा — “आज रात से, दोनों हाथों में हिसाब चलेगा।”
बंसी ने चाय की तरफ़ देखा। “दो पीतल?”
“भवानी के पास नकली नहीं था,” मैंने कहा। “याद है काग़ज़ में क्या मिला था — असली टोकन हवेली की छत के बक्से में है।”
“मतलब भवानी ने वो बक्सा खोल लिया।”
मैंने टोकन जेब में रखा। आज पहली बार उसका वज़न जेब में भारी लग रहा था।
मैंने चाय का प्याला उठाया। “बंसी, एक बात कह। अगर दोनों टोकन एक ही खाते के हैं, तो भवानी का हिसाब भी अब मेरे सामने आएगा?”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “या तेरा उसके सामने।”
मैंने प्याला वापस रख दिया। “सुबह होते ही बसवा चलना है। पर उससे पहले मुझे वो बक्सा देखना है।”
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