The Token System – Chapter 4
"डॉक्टर सुमन। इमरजेंसी में। सीधी औरत है, काग़ज़ बाद में देखती है।"
औरत ने मेरी आँखों में देखा। मैंने पलक नहीं झपकी। उसने फिर बच्चे को देखा।
"मेरे पास कुछ नहीं है।" उसने कहा।
मैंने जेब से वे दो नोट निकाले, उसके सामने रख दिए। "अभी तुम्हारे पास इतना हो गया। यह तुम्हारा है। देना हो तो बाद में देना, जब मैं लौटाऊँ।"
उसने नोटों को देखा। फिर मुझे देखा। फिर बच्चे को। कुछ देर वह चुप रही। मुझे लगा वह और लड़ेगी। फिर उसने बच्चा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने उसे सँभाला। वह बहुत हल्का था। शरीर में तप। साँस छोटी-छोटी।
बाहर आते-आते मैंने सुना — औरत कुछ बुदबुदा रही थी। मैं मुड़ा। वह दरवाज़े पर खड़ी थी, साड़ी उसके एक हाथ में थी।
"तुम्हारा नाम?"
"मनोहर।"
"मनोहर।" उसने गले को साफ़ किया। "लौटा देना। वरना मैं पुलिस में जाऊँगी।"
मैंने बच्चे को कसकर पकड़ा और भागा। पीछे से उसकी आवाज़ आई।
"लौटा देना!"
"लौटाऊँगा," मैंने चलते-चलते पीछे मुड़े बिना कहा। "सिर्फ़ बच्चा तो ज़िंदा रहे।"
कच्ची सड़क पर दौड़ना आसान है, अगर पैर में ताकत हो। मेरे पैर में तो थी। पर बच्चा हल्का होने के बाद भी भारी लग रहा था। तप से।
मोड़ तक पहुँचा। बस नहीं थी। तीस मिनट रुका। फिर एक जीप आई, उसमें सब्ज़ी की टोकरियाँ थीं। उसने लिफ्ट दी। चालक ने पूछा, "बच्चा ठीक है?"
"अभी नहीं। अस्पताल जा रहा हूँ।"
"पाँच मिनट लगेंगे। रास्ता बंद होगा सामने, हम किनारे से जाएँगे।"
अस्पताल के फाटक पर पहुँचा तो मेरा हाथ काँप रहा था। इमरजेंसी के दरवाज़े पर एक नर्स खड़ी थी। मैंने चिल्लाया, "डॉक्टर सुमन!"
दूर से आवाज़ आई, "रोओ मत। अंदर लाओ।"
सुमन डॉक्टर आई। उन्होंने एक नज़र में बच्चा देखा और कहा, "पलंग तीन पर। नर्स, सैलीन। बुख़ार नापो।"
मैंने बच्चा पलंग पर रखा। सुमन डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप निकाला। मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।
फिर कुछ देर बाद उन्होंने कहा, "मन्नू, ये बच्चा एक घंटे देर से आता तो…" वह रुकीं। "तुम इसे कहाँ से लाए?"
"खेत्री से।"
"खेत्री?" अब उन्होंने मुझे देखा। "वहाँ तुम क्या कर रहे थे?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वह हँसी। "ठीक है। मत बताओ। पर मन्नू, इसके हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे थे। बुख़ार तेज़ है। डेंगू के लक्षण लग रहे हैं। ब्लड भेज रही हूँ। तुम यहीं रुको। माँ का रिकॉर्ड लाया?"
"आज दोपहर तक लाऊँगा।"
"रिकॉर्ड अब भी नहीं लाया और खेत्री में बच्चे उठा रहे हो।" उन्होंने सिर हिलाया। "जाओ, बाहर बैठो। बहुत देर तक बुख़ार का असर रहता है, चलना-फिरना मुश्किल होगा।"
मैं बाहर आया। बरामदे में बेंच पर बैठा। घुटने अभी भी काँप रहे थे।
और तब मैंने जेब में हाथ डाला।
टोकन गरम था। न ज़्यादा, न कम। बस गरम। जैसे किसी ने अभी-अभी हाथ में पकड़ा हो और छोड़ दिया हो।
मैंने उसे बाहर निकाला। "लौटाना" शब्द अब भी वहाँ था। "छत के नीचे" अब भी वहाँ था। "राखी" अब भी वहाँ था। पर उसके ऊपर, जहाँ सुई घूमती थी, अब कुछ और था।
शब्दों में लिखा था — "तीन सौ"।
मैंने उसे पलटा। दूसरी तरफ़, जो अब तक खाली था, वहाँ उभरा था — "एक"।
मैंने उसे दुबारा पलटा। कुछ नहीं। बस बैठा रहा।
तीन सौ क्या? एक क्या?
और तभी एक परिचित आवाज़ आई।
"मनोहर।"
मैंने सिर उठाया। शेखर बाबू थे। चश्मा, फ़ाइल हाथ में, धीमी चाल। वह मेरे पास आए और बेंच पर बैठ गए, जैसे इत्तेफ़ाक़ से आए हों।
"तू सुबह से दिख नहीं रहा। कहाँ था?"
"बाहर काम था।"
"बाहर?" उन्होंने फ़ाइल खोली। "भवानी सिंह के नर्सिंग होम का रिकॉर्ड आज जाना है। तीन बजे तक। उनका आदमी फ़ोन कर रहा है।"
"शेखर बाबू, उनका मरीज़ अस्पताल में है? नर्सिंग होम में?"
वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे।
"उनके यहाँ मरीज़ अस्पताल से जाते हैं। यहाँ से भेजे जाते हैं। तुझे तो पता है काम क्या है।"
"जानता हूँ।"
"फिर पूछता क्यों है?" उन्होंने आवाज़ धीमी की। "मन्नू, आज डॉक्टर सुमन से तेरी बातचीत हो रही थी। मैंने देखा। ये अच्छा नहीं। वो औरत सीधी है, पर सीधी औरतें इस शहर में ज़्यादा दिन नहीं चलतीं। तू अपना काम देख।"
वह उठे। दो कदम चले। फिर रुके।
"वो बच्चा जो तू लाया — बुख़ार वाला — कहाँ से लाया?"
"पता नहीं। रास्ते से।"
"रास्ता बहुत बड़ा है, मन्नू।" वह चले गए।
मैं बेंच पर बैठा रहा। अंदर से बच्चा रो रहा था, धीरे-धीरे। नर्सें बोल रही थीं। दूर कहीं ट्रॉली की आवाज़ आई।
मैंने टोकन फिर निकाला। तीन सौ। एक।
मैंने सोचा — तीन सौ रुपये? इतने तो मैंने उस औरत की जेब में रख दिए थे। और वह "एक" क्या?
मैं उठा। इमरजेंसी के दरवाज़े से अंदर झाँका। सुमन डॉक्टर ने मुझे देखा और इशारा किया — "अभी आ रही हूँ।"
वह बाहर आईं। "बुख़ार उतर रहा है। बच्चा सो गया। पर मन्नू, इसकी माँ का कोई पता-ठिकाना?"
"खेत्री में झुग्गी है।"
"उसे बताओ कि बच्चा यहाँ है। वो आए और काग़ज़ दे।"
"वो डरेगी। उसके पास कुछ नहीं है।"
"तो तू उसे लेकर आ।" उन्होंने देखा। "और ये पैसे?" उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ इशारा किया।
"क्या?"
"तेरी जेब से काग़ज़ निकल रहा है।"
मैंने देखा। जेब के किनारे से एक पुराना मुड़ा काग़ज़ निकला हुआ था। मैंने उसे खींचा। पीला काग़ज़, टूटा किनारा। ऊपर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी, स्याही में, बहुत पुरानी स्याही में, और वह लाइन थी — "काम का हिस्सा: तीन सौ।"
नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में — "बाकी: पूरा करना।"
सुमन डॉक्टर ने उस काग़ज़ की तरफ़ देखा। "क्या है ये?"
"पुराना कुछ।"
"मन्नू, तेरा चेहरा सफ़ेद है।"
"मैडम, मैं आज माँ का रिकॉर्ड लाऊँगा। आप उस बच्चे को रखिए।"
उन्होंने एक पल मेरी तरफ़ देखा। जैसे कुछ और पूछना चाहती थीं। फिर नहीं पूछा।
"जाओ। पर ये बच्चा दो दिन रहेगा। माँ को बता देना।"
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ।
मेरे पास अब सवाल नहीं था। मेरे पास सिर्फ़ यह था — उस काग़ज़ पर, उस लाइन के नीचे, जो मैंने पहले नहीं देखा था, जब मैं सुमन डॉक्टर के सामने खड़ा था।
अब मैंने देखा।
"तीन सौ" के नीचे, पेंसिल से, हल्का सा, एक नाम लिखा था।
नाम था — "छोटू की माँ"।
मैं सीढ़ी पर रुक गया। एक हाथ की हथेली रेलिंग पर टिकी। दूसरे हाथ में काग़ज़।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। सुमन डॉक्टर बाहर खड़ी थीं, बच्चे के पलंग की तरफ़ देख रही थीं।
मैंने काग़ज़ मोड़ा। जेब में रखा। टोकन उसके ऊपर आ गया। जैसे किसी ने अपनी जगह ले ली हो।
बाहर निकला। अस्पताल का फाटक। सामने बसें रुक रही थीं, रिक्शे, लोग। कोई तेज़ धूप नहीं थी, बादल छाए थे। पर मेरे सिर पर पसीना था।
मैंने फ़ोन निकाला। रीना का नंबर। एक घंटी। दो घंटी। उठाया नहीं।
फिर फ़ोन आया। रीना नहीं। बंसी।
"भाई, तू कहाँ है?"
"अस्पताल में।"
"अस्पताल में तो तू रोज़ होता है। पर आज तेरे मोहल्ले में एक जीप घूम रही है। दो आदमी बैठे हैं, पूछ रहे हैं — मनोहर कहाँ है?"
मैं रुक गया।
"कौन पूछ रहे हैं?"
"पता नहीं। मैंने कहा, अस्पताल गया होगा। उन्होंने पूछा, उसकी बहन कहाँ है?"
मेरा हाथ काँपा।
"बंसी।"
"हाँ।"
"रीना को बोल — अभी घर पर ताला लगाकर कहीं बाहर चली जाए। कहीं भी। पड़ोस में। किसी के घर।"
"अभी?"
"अभी। बंसी, अभी।"
"ठीक है।"
"और माँ…"
"माँ तेरे साथ नहीं? वो तो घर पर…"
"बंसी, निकलवा उन्हें। मैं दस मिनट में पहुँच रहा हूँ।"
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