The Token System5 / 1154

The Token System – Chapter 5

7 min read November 6, 2026

मैंने फ़ोन काटा। सड़क पर एक ऑटो रोका। "रामगंज। जल्दी।"

ऑटो चला। मैं अंदर बैठा, हाथ में टोकन। वह अब गरम नहीं था। ठंडा था। बिलकुल।

और उस पर, "तीन सौ" के नीचे, अब कुछ और लिखा था। जो पहले नहीं था।

"लौटाना है।"

और उसके नीचे, ज़रा सा और — "दो दिन"।

मैंने टोकन मुक्के में कस लिया।

ऑटो वाले ने पीछे मुड़कर कहा, "भाई साहब, रामगंज के पास आज जीप दिख रही है। कोई फ़िल्म की शूटिंग है क्या?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

गली के मोड़ पर ऑटो रुका। मैं उतरा। दूर मैंने वह जीप देखी — सफ़ेद, हुड पर मिट्टी। और उसके पास खड़े दो आदमी।

एक ने मुझे देखा। उसने दूसरे को कोहनी मारी।

मैंने पलटकर देखा — बंसी की दुकान पर ताला लगा था। पर तिरपाल के नीचे, एक कोने में, बंसी खड़ा था। उसने मुझे हाथ उठाया — दो उँगली ऊपर — यानी माँ और रीना सुरक्षित।

मैंने टोकन जेब में रखा। काग़ज़ जेब में। दोनों को एक साथ छुआ।

और मैं जानता था, आज रात मुझे खेत्री नहीं जाना है।

आज रात मुझे इन दोनों से बात करनी है।

॥

गली के मोड़ से आगे बढ़ते ही सफ़ेद जीप का दरवाज़ा खुला और एक आदमी उतरा। काला चश्मा, मोटी सोने की चेन, और जेब में हाथ। दूसरा जीप के हुड पर बैठा रहा, पान खाते हुए।

"मनोहर?" पहले वाले ने पूछा।

"हाँ।"

"ठाकुर साहब का नमस्ते कहा है।"

"अच्छा। मेरा भी नमस्ते कह देना।"

दूसरा जीप से उतर आया। "बहुत बोलता है रे।"

"बोलने दो।" चश्मे वाले ने हाथ से रोका। "मनोहर, ठाकुर साहब ने कहा है — तू उस बच्चे को लेकर अस्पताल क्यों गया?"

मैं रुका। मेरे हाथ में काग़ज़ था और जेब में टोकन। मैंने शर्ट की जेब पर हाथ रख दिया।

"बच्चा बुख़ार में तप रहा था।"

"तेरा बच्चा था?"

"नहीं।"

"तो तू क्यों बीच में आया? ठाकुर साहब का नर्सिंग होम है ना। वहाँ ले जाते। चार हज़ार का इलाज होता, दो हज़ार चढ़ता, अठारह सौ में बच्चा हँसता-खेलता घर जाता।"

मुझे गुस्सा आया पर हँसी आ गई। "अठारह सौ में बच्चा बचता है, ये ठाकुर साहब ने कब से चालू कर दिया?"

दूसरे आदमी ने मेरी तरफ़ कदम बढ़ाया। चश्मे वाले ने फिर रोका।

"हँस मत। ठाकुर साहब ने कहा है — तू उस झुग्गी वाली औरत से मिला। वो काग़ज़ बच्चे की माँ को दे आया। का काग़ज़ था?"

मेरी जेब में काग़ज़ था। वहीं। मेरे शरीर के साथ।

"कौन सा काग़ज़?"

"वो जो तूने औरत के हाथ में दिया। थैली से निकाल कर।"

"वो मेरा काग़ज़ नहीं था। वो कहीं पड़ा मिला था। मैंने देखा नहीं क्या है।"

चश्मे वाले ने दूसरे की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। "ठाकुर साहब ने कहा है — दो दिन के अंदर तू अपने काम से काम रखे। वरना तेरी बहन की शादी की तारीख़ें देखने का काम ठाकुर साहब करेंगे।"

मेरे भीतर कुछ फिसल गया। ऊपर से नीचे।

"बहन की शादी का ठाकुर साहब के पास क्या?" मैंने पूछा। "वो तो मेरी बहन है।"

"हुई ना। इसीलिए।" चश्मे वाले ने मुस्कुरा कर कहा। "जो तेरा है, वो हमारा भी हो गया। टोकन… वो काग़ज़ जो मिला तुझे। दो दिन में ठाकुर साहब के नर्सिंग होम पहुँचा। काग़ज़ लाएगा तो भाई जैसे बोलेंगे, वरना धमकी जैसे।"

"काग़ज़ कौन सा? मैं झुग्गी से सीधा अस्पताल गया। काग़ज़ कहाँ से आया?"

चश्मे वाले की आँखें धीमी हो गईं। "तू गया था झुग्गी से पहले… कहीं और?"

"मैं सीधा खेत्री की बस से आया।"

"और खेत्री में?"

मैं चुप रहा।

"ठीक है।" उसने जेब से एक काग़ज़ निकाला। छोटा, सफ़ेद, मोड़ा हुआ। "ये क्या है? यही उस औरत के पास मिला था ना?"

मेरी जेब में काग़ज़ पहले से था। मैंने उसे छुआ। गरम नहीं था।

मैंने सफ़ेद काग़ज़ लिया। खोला। सादा काग़ज़ था। खाली।

"खाली है।"

"अच्छा।" मैंने वापस दिया। "तो फिर क्या काग़ज़ ढूँढ रहे हो?"

"जो तेरे पास है।" चश्मे वाले की आवाज़ बदल गई। "वो पीला, पुराना, जिस पर लिखा है। मनोहर, हम अंधे नहीं हैं। तूने कपड़े में कुछ लपेटकर जेब में रखा। तेरी जेब भारी लग रही है।"

मैंने शर्ट की जेब पर दबाव डाला। काग़ज़ वहीं था, टोकन के नीचे।

"मेरी जेब में मेरा ही सामान है।"

चश्मे वाला मुस्कुराया। "दो दिन, मनोहर। दो दिन। याद रखना। बच्चा भी ठीक हो जाएगा, तू भी ठीक हो जाएगा… बस ठाकुर साहब की बात मान ले।"

वो जीप में बैठे। जीप काली धुएँ की रेखा छोड़कर गली से बाहर निकल गई। गली के लोग खिड़कियों से झाँक रहे थे। कोई नहीं बोला।

बंसी तिरपाल के नीचे से निकला। उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर मेरी जेब पर। "अंदर आ।"

दुकान पर ताला लगा था, पर पीछे की तरफ़ एक छोटी खिड़की खुली थी। वो मुझे पीछे के कमरे में ले गया। बंसी ने स्टोव जलाया। दो गिलास पानी वाले।

"बता।"

"क्या बताऊँ?"

"मन्नू। तू चश्मे वाले की बात पर हँस रहा था। जबकि उसने तेरी बहन का नाम लिया। तूने सुना नहीं?"

"सुना।"

"तो तू हँस क्यों रहा था?"

"क्योंकि वो मुझे डरा रहा था। मुझे डर लगता तो काँपता। मैं काँपा नहीं।"

बंसी ने पानी पिया। "काग़ज़ कौन सा है?"

मैंने जेब से निकाला। रख दिया सामने। बंसी ने पढ़ाई वाला चश्मा निकाला। पुराना, एक तरफ़ कील लगी थी। ठीक से पढ़ा।

"छोटू की माँ"।

"हम्म।" उसने चश्मा उतारा। "और ये तीन सौ का क्या है?"

"पता नहीं।"

"मतलब ये कोई हिसाब है। बीस साल पहले मैंने एक बार एक ऐसा काग़ज़ देखा था। ऐसा ही पीला। ऐसी ही स्याही।" बंसी ने नज़रें उठाईं। "मन्नू, ये ऋण का काग़ज़ नहीं है। ये हिसाब वाला काग़ज़ है। जयपुर के पुराने कारोबारियों में एक रिवाज़ था — जब कोई काम किसी के लिए होता था, उसका हिस्सा काग़ज़ पर लिखा जाता था। तीन सौ का मतलब तेरा हिस्सा। और छोटू की माँ का मतलब… जिसके काम का ये काग़ज़ है, वो वो औरत है।"

"मैंने उस औरत के बच्चे को बचाया।"

"तो तेरा हिस्सा।" बंसी ने काग़ज़ मेरी तरफ़ धकेला। "ले, तेरा हक़ है। तूने काम किया।"

"मैंने अस्पताल में काम किया, सरकार का। मेरी तनख़्वाह आएगी सात तारीख़ को। ये… ये क्या है?"

"मन्नू।" बंसी ने पानी का गिलास रखा। "मुझे लग रहा है कि बच्चा अस्पताल पहुँचाने का हिस्सा तीन सौ है। पर किससे लेना है? काग़ज़ से? काग़ज़ पैसा नहीं देता।"

"हाँ।" मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। "बंसी, माँ और रीना कहाँ हैं?"

"मैंने रीना को स्कूल से तेरे मोहल्ले वाली बुआ के घर भेज दिया। माँ भी वहीं है। दरवाज़ा अंदर से बंद है।"

"मैं अभी जाता हूँ।"

"मन्नू, एक बात।" बंसी ने रास्ता रोका। "वो चश्मे वाला… जब वो उस काग़ज़ की बात कर रहा था, उसका मुँह नहीं देख रहा था तू?"

"नहीं।"

"वो ठाकुर के पास से हाल में आया होगा। ठाकुर के पास इसका पता है।" बंसी ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "कहीं ये काग़ज़ ठाकुर का पुराना हिसाब ना हो। पर तेरी जेब से क्यों निकला, ये समझ नहीं आया।"

फिर वो रुक गया। एक पल मेरी तरफ़ देखा। "तेरे दादा ने हवेली में कुछ छोड़ा था, माँ बोली थी।"

"हाँ।"

"मन्नू, तेरे दादा हवेली में माली थे। वो हवेली अब ठाकुर के नाम पर है।" बंसी ने मेरी तरफ़ मुँह घुमाया। "जब हवेली का काग़ज़ ठाकुर के नाम हुआ, उस वक़्त तेरे दादा वहीं थे। जवान थे।"

"तो?"

"तो कुछ देखा होगा। सुना होगा।"

बाहर से किसी ने घंटी बजाई। फिर दो और। बंसी के हाथ रुक गए।

"दुकान बंद है।" उसने कहा।

खिड़की से झाँका। वो रुक गया।

"कौन?"

"अंदर आ रहा हूँ।"

उसने दरवाज़ा खोला। सामने डॉक्टर सुमन खड़ी थीं। सफ़ेद कोट, हाथ में फ़ाइल। "मनोहर कहाँ है?"

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