The Token System – Chapter 3
माँ ने मुँह फेर लिया।
"एक पुरानी चीज़। जो लोग छुपाकर रखते हैं, वह उसी घर से बाहर नहीं जाती। मैंने सोचा था दादा के जाने के साथ सब खत्म। इसीलिए सामान बेच दिया।" उन्होंने अपने आँसू पोंछे। "यह टोकन उस सामान में क्यों बचा रह गया, पता नहीं।"
"माँ, चीज़ क्या है?"
"मत पूछ। अभी मत पूछ।"
"कब पूछूँ?"
"जब तेरे पास लौटाने को कुछ हो।" माँ चली गई।
दोपहर में मैं अस्पताल गया। शेखर बाबू ने देखते ही कहा, "तू लेट क्यों है? कल का फ़ोन आया था, भवानी सिंह के नर्सिंग होम से। उनका एक्स-रे रिकॉर्ड भेजना है।"
मैंने सिर हिलाया। काम में लग गया। पर मेरा हाथ एक्स-रे प्लेट पर नहीं, जेब में था। टोकन ठंडा था। बिलकुल ठंडा। जैसे कुछ बोलना ही नहीं चाहता।
एक बजे मेरा फ़ोन बजा। रीना का नंबर।
"भाई, माँ को…"
मैं दौड़ा।
माँ चूल्हे के पास ही चक्कर खाकर गिरी थीं। होश में थीं, पर आँखें खुल नहीं रही थीं। रीना रो रही थी। सुमन डॉक्टर मिल गई थीं, वो पास ही मिलीं, उन्होंने देख लिया था। पच्चीस मिनट में सब ठीक हो गया — कमज़ोरी में गिरना, ऐसा होता है। पर सुमन ने मुझे अलग बुलाया।
"मन्नू, तुम्हारी माँ का ब्लड प्रेशर लगातार कम है। मुझे उनका पूरा रिकॉर्ड चाहिए। कल तक ले आना प्राइवेट लैब से।"
"मैडम, कल तक…"
"जल्दी हो तो।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "मुझे ठीक से देखना है।"
रात को घर लौटा। रीना माँ के पास बैठी थी। मैं अपने कमरे में गया। टोकन निकाला। उसे मेज़ पर रखा। बल्ब जलाया। पानी पिया। फिर टोकन उठाया।
वह ठंडा था। पर जो अब उस पर था, वह "बाकी" नहीं था।
"बाकी" की जगह अब एक किनारे शब्द उभरा था — "लौटाना"।
और उसके नीचे छोटे अंक में, जैसे किसी ने पीस कर लिखा हो — "तीन दिन"।
मैंने उसे पलटा। दूसरी तरफ़ वही गोल घेरा था, जिसमें पहले "बाकी" था। अब खाली। वह घेरा वही था, पर अब उसमें भीतर की तरफ़ एक रेखा उभरी थी, जैसे सुई। वह सुई हिल रही थी।
दरवाज़े पर दस्तक हुई। रीना खड़ी थी।
"भाई, माँ कुछ बोल रही हैं।"
मैं अंदर गया। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। बुखार था, हाथ गरम था। वह धीरे से बोलीं, "हवेली?"
"माँ, तुम…"
"ऊपर के कमरे में। दादा ने तीन अलमारियाँ छोड़ी थीं। एक में कुछ नहीं। दूसरी में ज़मीन के नक्शे। तीसरी में…" वह खाँसी। "तीसरी में सबसे ऊपर, छत के नीचे, एक संदूक। उसे मत छेड़। उसी में…"
"क्या?"
माँ की आँख बंद होने लगी।
"वही जिसने तेरे दादा को चैन से नहीं मरने दिया।"
मैं बाहर आया। आँगन में खड़ा रहा। रात में तारे दिख रहे थे।
रीना ने दरवाज़े से कहा, "भाई, तुम्हें कुछ पता है जो मुझे नहीं?"
"रीना, तीन दिन बाद…"
"तीन दिन बाद क्या?"
"तीन दिन बाद मुझे कहीं जाना है।"
"कहाँ?"
"पता नहीं।" मैं अंदर गया। टोकन उठाया। अब उस पर तीन दिन और लौटाना ही नहीं था। अब वहाँ शब्द उभर आया था — "लौटाना" के नीचे — "छत के नीचे"।
और सबसे नीचे, ज़रा सा और, एक शब्द जो मैंने पढ़ा और मेरा हाथ काँप गया।
"राखी"।
रीना का दूसरा नाम।
मैंने टोकन मेज़ पर रख दिया।
कुछ नहीं बोला।
बाहर कुत्ते भौंकने लगे। दूर कहीं, बहुत दूर, जैसे किसी की आवाज़ आई।
"तीन दिन।"
॥
सुबह चार बजे मेरी आँख खुली। कोई अलार्म नहीं बजा। कोई शोर नहीं था। बस आँख खुली, जैसे किसी ने अंदर से धक्का दिया हो। पंखा छत पर धीमी रफ़्तार से घूम रहा था और बाहर कुत्ते एक-दो बार भौंककर चुप हो गए।
मैं उठा। टोकन जेब में डाला। चाय का बर्तन चूल्हे पर रखा था, कल रात का। छुआ तक नहीं। चप्पल पहनी और दरवाज़ा खोला।
गली में एक भी आदमी नहीं। ठंडी हवा में कूड़े का डिब्बा खड़ा था, बंद। बंसी की दुकान पर तिरपाल बँधा था। मैंने उसकी तरफ़ देखकर सोचा — अगर ये आदमी अभी जगा होता, तो पूछ लेता, "बंसी, कहीं जाने का मन कर रहा है। क्या करूँ?" और वह हँसकर कहता, "मन कर रहा है तो जा। हिसाब बाद में।"
बस स्टैंड पर पहुँचा तो पहली बस खड़ी थी, इंजन गरम कर रही थी। कंडक्टर ने पूछा, "कहाँ?"
"खेत्री की तरफ़।"
"खेत्री?" उसने मुझे ऊपर-नीचे देखा। "वहाँ कोई ढाबा नहीं, कुआँ है। सुबह-सुबह क्या करोगे?"
"काम है।"
"तीस रुपये।"
मैंने जेब टटोली। टोकन के नीचे, जैसे किसी ने चुपचाप रख दिया हो, दो नोट थे — बीस और दस। मैंने उन्हें निकाला और सोचा, कल तक इनका पता नहीं था। मैंने टिकट लिया।
खिड़की के पास बैठा। शहर पीछे छूटता गया। बाहर दूर खेत थे, धुंध थी, और एक जगह छोटा सा मंदिर था जिसके आगे एक आदमी सो रहा था, चादर ओढ़े।
मुझे अपने ऊपर हँसी आई। सच में। अट्ठाईस साल का आदमी, अस्पताल में नौकरी, सुबह चार बजे उठकर बस में बैठा है क्योंकि एक पीतल के टुकड़े पर तीन दिन लिखा आया। क्या यही है मेरी ज़िंदगी? काश माँ को यह पता चलता तो कहती — "इसी दिमाग़ से तो पैसा भी नहीं कमाया।"
अच्छा हुआ माँ नहीं जानती।
बस रुकी। कंडक्टर ने कहा, "खेत्री मोड़। आगे पक्की सड़क खत्म। तुम्हें पैदल जाना पड़ेगा।"
उतरा। मोड़ पर वही गीला गोल निशान था, बस अब सूख रहा था। चूल्हा नहीं था। करछी नहीं थी। बुढ़िया नहीं थी। सिर्फ़ ज़मीन पर एक गड्ढा था, जैसे रोज़ कोई वहाँ बैठता हो।
मैं कच्ची सड़क पर चल पड़ा। दस मिनट, बीस मिनट। ईंटों के टीले आने लगे। कुछ घर थे, आधे गिरे। किसी के आँगन में बकरी बँधी थी और बकरी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मुँह फेर लिया।
फिर आवाज़ आई।
रोने की आवाज़। दबी हुई। औरत की। बच्चा भी रो रहा था, पर कमज़ोर, जैसे रोने की ताकत भी न बची हो।
मैं आवाज़ की तरफ़ मुड़ा। झुग्गी थी, प्लास्टिक के टुकड़ों और टीन की छत की। दरवाज़े पर कोई पर्दा नहीं, बस एक पुरानी साड़ी लटकी थी। मैंने साड़ी हटाई।
अंदर एक औरत बैठी थी। उम्र तीस के आसपास। कपड़े मैले, बाल बिखरे। गोद में एक बच्चा था, दो-तीन साल का। बच्चे का शरीर लाल, आँखें आधी बंद, साँस तेज़। औरत उसे सीने से चिपकाए बैठी थी और रो रही थी — न ज़ोर से, न चुपचाप। बस रो रही थी।
मेरे पैर रुक गए। मैंने देखा — पास में एक बोतल पड़ी थी, पानी की। एक कटोरी में कुछ ठंडा पानी। कोई दवा नहीं। कोई डॉक्टर नहीं। कोई काग़ज़ नहीं।
"दीदी।"
औरत ने सिर उठाया। उसकी आँखों में वह डर था जो अक्सर मैं अस्पताल के बाहर देखता हूँ — वह डर जो आदमी के मुँह से पहले आँखों में आता है, कि "अब कौन काटेगा?"
"तुम कौन हो?"
"मैं अस्पताल में काम करता हूँ।"
"कौन सा अस्पताल?"
"बड़ा वाला, शहर में। सरकारी।"
उसने अपने बच्चे को और कस लिया। "मेरे पास पैसा नहीं है।"
मैं बैठ गया, उसके सामने, ज़मीन पर। "दीदी, पैसा पहले मत सोचो। बच्चा तप रहा है।"
"कल से।" उसकी आवाज़ टूटी। "कल से। कोई डॉक्टर नहीं आया। यहाँ कोई नहीं आता। दो दिन पहले एक जीप आई थी, बोले थे बच्चा ले जाएँगे, पैसा चाहिए। मेरे पास कहाँ है। मैंने मना कर दिया। फिर वो नहीं आए।"
अब मैं समझ गया। यह वही जगह थी। यही वह जगह थी जहाँ भवानी के आदमी रुकते थे — गरीब, बीमार, कोई पूछने वाला नहीं। उन्हें पता था कौन मर रहा है और कहाँ।
"दीदी, बच्चा दो।"
वह पीछे हटी। "नहीं।"
"देखो, उसका बुख़ार बहुत तेज़ है। अगर दौरा पड़ा तो हम कुछ नहीं कर पाएँगे।"
"तुम ले जाओगे और फिर?"
"मैं उसे अस्पताल ले जाऊँगा। डॉक्टर के पास। वहाँ मेरे जान-पहचान के लोग हैं।"
"कौन?"
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