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The Token System – Chapter 2

7 min read November 6, 2026

पैदल चलते हुए टोकन जेब में ठंडा ही रहा। मैंने एक बार निकालकर देखा भी — "बाकी", वही शब्द। मैंने मन में कहा, बस इस बार कुछ बताना तो है नहीं, तो बता क्यों नहीं रहा। टोकन ने कोई जवाब नहीं दिया। चीज़ें जवाब नहीं देतीं।

खेत्री के मोड़ पर एक बुढ़िया बैठी थी। असली बुढ़िया, वहाँ बेचने के लिए नहीं। उसके सामने मिट्टी का चूल्हा था, ऊपर बेलन के आकार का बर्तन, जिसमें कुछ उबल रहा था। सुबह चार बजे। यह सामान्य नहीं था।

"मन्नू?" उसने मुझे देखकर कहा।

मैं रुक गया। मैंने उसका चेहरा देखा। पहचाना नहीं। पर वह मुझे पहचानती थी।

"तू रुक क्यों गया? जा। तेरा काम है।" उसने लकड़ी करछी से बर्तन हिलाया। "पर लौटते वक्त चाय पीना। मुफ़्त में मिलेगी।"

मैंने पूछा, "आप कौन हैं?"

"कोई नहीं।" उसने ढक्कन रख दिया। "जो नहीं होते, वही सबसे ज़्यादा होते हैं।"

मैं समझा नहीं। आगे बढ़ गया।

इलाके के बीच में पुरानी हवेली के लिए जाने वाला रास्ता था। मुझे हवेली जाना नहीं था। मुझे छोटू जाना था।

छोटू मिला। एक झोपड़ी के बाहर, क्यारी जैसी जगह में, बस चारों तरफ़ घास। वह वहाँ नहीं बैठा था। वह मिट्टी में एक लकीर खींच रहा था, फिर उस पर पैर रख रहा था, फिर मिटा रहा था, फिर नई लकीर खींच रहा था। सुबह चार बजे, बच्चा, झोपड़ी के बाहर अकेला।

मैं दूर से ही रुक गया।

वह और कोई नहीं था। वही छोटू था, वही बड़ी कमीज़। पर उसके चेहरे पर एक भाव था जो दस साल के बच्चे के चेहरे पर नहीं होता — जैसे वह लकीर नहीं खींच रहा, कुछ गिन रहा है। जैसे किसी चीज़ का हिसाब लगा रहा है।

मैंने आवाज़ दी, "छोटू।"

वह रुक गया। उसने सिर उठाया। मुझे देखा। डरा नहीं। भागा नहीं।

"तुम आ गए," उसने कहा। "दादाजी ने कहा था तुम आओगे।"

मेरा मुँह सूख गया।

"कौन दादाजी?"

"वो।" उसने हवेली की तरफ़ इशारा किया। दो मंज़िला हवेली, आधी गिरी, लकड़ी के झरोखे टूटे पड़े, ऊपर बंद कमरे। "वो कहते हैं न, जब एक बच्चा आएगा, तब एक आदमी आएगा।"

"और क्या कहते हैं वो?"

छोटू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके पैर उसकी कमीज़ के नीचे गायब थे।

"कहते हैं, जो छुपाकर रखा है, वह तुम्हारा है।"

जेब में टोकन एक पल के लिए गरम हुआ, फिर ठंडा हो गया। जैसे किसी ने मेरी जेब में अंगुली रखी हो और हटा दी हो।

छोटू वापस मिट्टी में लकीरें खींचने लगा।

"तुम्हारी काकी कहाँ है?"

"अंदर।" उसने बिना ऊपर देखे कहा। "वो बोलती नहीं हैं। तीन दिन से। लेकिन बोलती हैं।"

"क्या मतलब?"

"होंठ नहीं हिलते। पर समझ आ जाता है।"

मैंने झोपड़ी का दरवाज़ा खोला। अंदर अंधेरा था। ज़मीन पर चटाई पर एक बूढ़ी औरत लेटी थी। वही, अस्पताल वाली। उसकी आँखें खुली थीं।

वह मुझे देखकर उठी नहीं। बस हाथ से कोने में रखे मिट्टी के लोटे की तरफ़ इशारा किया।

मैंने लोटा उठाया। वह बोली, "तू वह आदमी है जो दादा के सामान वालों में से है?"

"मैं मन्नू हूँ। मैं अस्पताल में एक्स-रे करता हूँ।"

"मुझे पता है तू क्या करता है।" उसने आँखें बंद कीं। "मुझे पूछना यह है — तेरे हाथ में क्या है?"

"मेरे…"

"जेब में।"

मैंने टोकन निकाला। उसने देखा। उसकी आँखें बदल गईं। बूढ़ी औरत होकर भी एक पल को वह सीधी बैठ गई।

"काकी। यह चीज़…"

"इसे खेत्री में रात नहीं दिखाना।" उसने लोटा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और खेत्री से एक चीज़ लेनी हो तो एक से ज़्यादा नहीं लेना। और न ही देने का।"

"मैं यहाँ क्या लेने आया हूँ?"

"तू नहीं जानता? तो वही लेने आया है जो तू जानता नहीं है।"

मैंने लोटा उसके पास रखा। वह हँसी। बिना आवाज़ के।

"बैठ। तीन सवाल पूछ। ज़्यादा नहीं। जो पूछ लिया, उसका जवाब मिल जाएगा। जो नहीं पूछा, उसका कभी नहीं मिलेगा।"

"तीन सवाल?"

"हाँ। और एक सवाल मेरा। जो मैं तेरे जाते वक्त पूछूँगी।"

मैंने सोचा। मन में बहुत सवाल थे। टोकन क्या है। छोटू कौन है। हवेली में क्या है। मैं कौन हूँ। पर तीन ही मिलेंगे।

मैंने पहला पूछा, "टोकन पर 'बाकी' क्यों उभरा?"

बूढ़ी ने आँखें खोलीं।

"क्योंकि पहला हिसाब पूरा हो गया है। जब 'बाकी' आता है, मतलब बहुत कुछ बाकी है।"

"क्या?"

"तेरे दादा की हवेली में जो चीज़ छोड़कर गए थे। वह।"

मैं चुप रहा। दादा हवेली में माली थे, यह जानता था। यह नहीं जानता था कि उन्होंने कुछ छुपाया।

दूसरा सवाल पूछा, "टोकन का मुझसे क्या रिश्ता?"

बूढ़ी ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने टोकन दिया। उसने उसे हथेली पर रखा, उलटा-पलटा। फिर बोली, "यह सिक्का नहीं। यह नंबर पहचानता है। जो नंबर इस पर एक बार चढ़ गया, वह कभी मिटता नहीं। पहले इसमें एक बच्चे का हिसाब था। अब 'बाकी' है। मतलब तेरा हिसाब शुरू हुआ है।"

"किसका हिसाब?"

"तेरे जाने के बाद।" उसने टोकन वापस किया। "तीसरा सवाल। जल्दी पूछ, सूरज आ रहा है।"

तीसरा सवाल कौन सा। मैंने जल्दी में पूछा, "छोटू कौन है?"

बूढ़ी का चेहरा एकदम बदला। उसने छोटू की तरफ़ देखा।

"तूने वह पूछा जो नहीं पूछना चाहिए था।"

"तो जवाब मत दो।"

"अब दे दिया तो दे दिया।" उसने लंबी साँस ली। "छोटू का हिसाब तेरे नाम पर है। वह तेरे हिस्से का आदमी है। तेरे दादा की गलती का।"

"गलती?"

"अब तीन सवाल पूरे।" बूढ़ी ने आँखें बंद कीं। "बाहर जा। मुझे सुबह की चाय चढ़ानी है। और हाँ — एक सवाल मेरा।"

"पूछिए।"

"तू वह लेने हवेली जाएगा या नहीं?"

मैं रुक गया। पीछे हवेली की तरफ़ नहीं देखा। पर जानता था वह वहीं है — आधी गिरी, ऊपर एक बंद कमरा, जिसकी खिड़की पर बरसों से धूल है।

"मैं…"

"जल्दी मत कर। पर देर भी मत करना।" बूढ़ी हँसी। "जवाब देने के लिए ज़िंदगी नहीं है मेरे पास।"

मैं बाहर आया। छोटू मिट्टी में लकीरों के बीच बैठा था। मैंने उसकी कमीज़ ठीक की। वह मेरी तरफ़ देखकर बोला, "तुम हवेली नहीं जाओगे।"

"तुझे कैसे पता?"

"मुझे नहीं पता।" उसने आकाश देखा, जो अब हल्का नीला हो रहा था। "दादाजी कहते हैं। वो अंदर बैठे रहते हैं। अकेले। बहुत साल से।"

"छोटू, तेरे दादाजी…"

"जिंदा नहीं हैं।" उसने वैसे ही कह दिया, जैसे मौसम बता रहा हो। "पर वो हैं। वो रोज़ आते हैं। जब मैं लकीरें खींचता हूँ, तो वो गिनते हैं।"

मैं वापस लौटा। रास्ते में बुढ़िया वाली जगह से गुजरा। वह अब नहीं थी। चूल्हा भी नहीं था। सिर्फ़ ज़मीन पर एक गीला गोल निशान था, जहाँ चूल्हा था। मैंने वहाँ झुककर देखा। गीली मिट्टी में एक लकड़ी की करछी पड़ी थी। मैंने उसे छुआ। करछी गरम थी। बर्तन जैसी गरम नहीं, पर इतनी कि मैंने हाथ खींच लिया।

शहर आते-आते सुबह के सात बज गए थे। सीधे अस्पताल नहीं गया। घर गया। माँ ने दरवाज़ा खोला। मुझे देखकर पहले सामान्य रही, फिर उनकी आँखें मेरे हाथों पर गईं। मेरी उँगलियों पर मिट्टी थी। मिट्टी में एक अजीब लाल रंग था।

"तू कहाँ गया था?"

"खेत्री।"

माँ ने दरवाज़ा बंद किया। रीना रसोई से झाँक रही थी, पर माँ ने इशारे से उसे अंदर भेज दिया।

"अंदर।"

कमरे में माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और देखा। फिर बोली, "टोकन कहाँ है?"

"जेब में।"

"निकाल।"

मैंने निकाला। माँ ने उसे छुआ नहीं। दूर से देखा।

"इस पर क्या है?"

"'बाकी'।"

माँ की आँख भर आई।

"मन्नू, तू अब खेत्री नहीं जाएगा।"

"माँ, एक बच्चा है—"

"मुझे पता है।" उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा। "उसके दादाजी तेरे दादा के साथ उस हवेली में थे। दादा ने प्रॉमिस किया था। वह प्रॉमिस पूरा नहीं हुआ। अब जो बच्चा वहाँ आया है, वह उसका हिसाब माँगता है।"

"कौन सा हिसाब?"

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