The Token System – Chapter 198
दरवाज़ा टूटा। मैंने सामने के कमरे की बत्ती बुझा दी थी, इसलिए आदमी भीतर आकर एक पल के लिए रुके।
"शेखर बाबू?" एक आवाज़ आई।
मैं खिड़की के पर्दे के पीछे खड़ा था। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
आदमी आगे बढ़ा। उसने टॉर्च जलाई और कमरे में घुमाई। बत्ती की रोशनी मेज़ पर पड़ी — जहाँ चाबी रखी थी, वो अब मेरी जेब में थी।
"कमरा खाली है," आदमी ने दूसरे से कहा।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई — दीपा के पैरों की आहट। वो शायद दरवाज़े की चौखट से टकरा गई थी।
आदमी तुरंत मुड़ा।
"पीछे से!"
मैंने बिना सोचे खिड़की खोली और बाहर कूद गया। मेरा पैर ज़मीन पर पड़ा और घुटने में झटका लगा।
"भागो!" मैंने चिल्लाकर कहा।
बंसी ने दीपा को खींचकर गाड़ी की तरफ़ भगाया। शेखर बाबू लड़खड़ाते हुए उनके पीछे भागे।
मैंने गाड़ी की चाबी बंसी की तरफ़ फेंकी। उसने लपक ली।
गाड़ी स्टार्ट हुई। मैंने पीछे वाले आदमी को धक्का दिया और कूदकर गाड़ी की पिछली सीट पर चढ़ गया।
गाड़ी भागी।
पीछे भवानी के आदमी अपनी गाड़ी में बैठ रहे थे, पर बंसी ने गाड़ी को गली से सड़क पर तेज़ मोड़ दिया और हम बाज़ार की तरफ़ निकल आए।
दीपा काँप रही थी। उसने अपना हाथ मेरी बाजू पर रखा।
"आप वो हैं जो सुबह आए थे?" उसने फुसफुसाकर पूछा।
"हाँ।"
"पापा को भवानी ने डराया था। मैंने सुना था। मैं सो रही थी, पर मैंने सुना था। उस रात मैंने पापा को रोते हुए देखा था।"
शेखर बाबू ने कुछ कहना चाहा, पर उनकी आवाज़ नहीं निकली।
बंसी ने गाड़ी एक सुनसान चौराहे पर रोकी। पीछे कोई नहीं था।
मैंने जेब से पर्ची निकाली और फिर पढ़ी। 'हरि सिंह कौन है, ये मुझे बाद में पता चला।'
"बाबू," मैंने कहा, "पापा ने ये नहीं बताया कि हरि सिंह कौन था। पर आपने कहा कि वो भवानी का साझेदार था। ये बात किसी और को पता है?"
"हरि सिंह की बीवी अब भी शहर में रहती है," शेखर बाबू ने कहा। "पुराने बाज़ार में। ज़मीन के विवाद में उसका घर छिन गया था, अब किराए के मकान में रहती है।"
"उसका नाम?"
"कमला देवी।"
बंसी ने गाड़ी की तरफ़ देखा। "पहले हवेली चलें?"
"नहीं," मैंने कहा। "पहले कमला देवी। अगर हरि सिंह भवानी का साझेदार था, और हरि सिंह के पास बही का कोई हिस्सा था, तो कमला देवी उससे कुछ जानती होगी।"
दीपा ने अचानक कहा, "पापा, वो पर्ची मुझे दिखाइए।"
शेखर बाबू ने उसे पर्ची दी। दीपा ने पढ़ा और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
"यहाँ एक बात है जो आपने नहीं पढ़ी," उसने कहा।
"क्या?"
"पापा की लिखाई के नीचे, बिल्कुल किनारे पर, पेंसिल से कुछ लिखा है। बहुत हल्का है। मुश्किल से दिखता है।"
मैंने पर्ची उससे ली और गाड़ी की लाइट में पास ले जाकर देखा। पेंसिल के अक्षर थे, फीके — जैसे कोई जल्दी में लिखकर चला गया हो।
पढ़ा — 'भवानी के मकान की नींव में।'
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"नींव में?"
शेखर बाबू ने साँस रोकी।
"तेरे पापा ने कभी कुछ नींव में नहीं छिपाया," उन्होंने कहा। "पर अगर उन्होंने यहाँ लिखा है, तो वहाँ कुछ है।"
तभी मेरी जेब में टोकन हिला। मैंने उसे बाहर निकाला। वो गरम था।
बंसी ने देखा।
"फिर गरम हुआ?"
"हाँ।"
दीपा ने टोकन की तरफ़ देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"ये टोकन मैंने पहले देखा है," उसने धीरे से कहा।
सब चुप हो गए।
"कब?" मैंने पूछा।
"पिछले साल। जब भवानी के बेटे विक्रम की सगाई थी। मैं वहाँ गई थी, पापा के साथ। विक्रम की जेब से यही टोकन गिरा था। मैंने उठाकर दिया था।"
शेखर बाबू ने दीपा की तरफ़ देखा, जैसे पहली बार देख रहे हों।
"तूने मुझे ये कभी नहीं बताया।"
"आपने कभी पूछा नहीं, पापा। और मुझे लगा था कि ये कोई आम सिक्का है।"
मैंने टोकन को उँगलियों में घुमाया। वो मेरे हाथ में गरम था, पर धीरे-धीरे उसका ताप कम होने लगा।
"यानी ये टोकन विक्रम के पास भी था," मैंने कहा। "और ये टोकन पापा के पास था। और अब मेरे पास है।"
"इसका मतलब?" बंसी ने पूछा।
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब डर से नहीं, किसी और चीज़ से भरी थीं — शायद पछतावे से।
"इसका मतलब," उन्होंने कहा, "कि ये टोकन किसी एक आदमी का नहीं है। ये उन सबका है जिन्होंने इसे छुआ। हरि सिंह ने छुआ। तेरे पापा ने छुआ। भवानी ने छुआ। विक्रम ने छुआ।"
मैंने टोकन जेब में रखा।
"तो अब हम कमला देवी के पास जाएँगे," मैंने कहा। "और फिर हवेली।"
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।
शेखर बाबू ने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ अब भी ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत थी।
"एक बात है," उन्होंने कहा, "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"भवानी के टोकन पर जो अंक चलते हैं, उनका हिसाब उसके बेटे विक्रम के नाम पर है। हर पन्ने पर दो नाम — हरि सिंह और विक्रम। और अब मुझे लगता है कि हरि सिंह के मरने के बाद वो हिसाब पूरा विक्रम के नाम पर चला। भवानी ने उसे नहीं छोड़ा। उसने बेटे को ढाल बना दिया।"
गाड़ी सड़क पर भागती रही। दीपा ने अपना सिर शेखर बाबू के कंधे पर रख दिया। मैंने जेब में हाथ डाला और टोकन को दबाया — वो अब ठंडा था।
"बाबू," मैंने कहा, "हवेली की नींव में कुछ है। और अगर वहाँ कुछ है, तो भवानी आज रात सो नहीं पाएगा।"
शेखर बाबू ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा, जहाँ सड़क के किनारे पेड़ों की परछाइयाँ भाग रही थीं।
"वो सो नहीं रहा होगा," उन्होंने कहा। "वो कभी सोता ही नहीं। वो
॥
गाड़ी जब पुराने बाज़ार की गली में रुकी तो बंसी ने इंजन बंद किया और पीछे मुड़कर देखा।
"यहीं रुकते हैं। आगे गली तंग है, गाड़ी फँस जाएगी।"
शेखर बाबू की पीठ दर्द से अकड़ी हुई थी, पर वो खिड़की से बाहर देखकर बोले, "तीसरा मकान, नीले दरवाज़े वाला। कमला देवी वहीं रहती है।"
हम उतरे। दीपा ने बाप का हाथ थामा। टोकन मेरी जेब में ठंडा था, पर मैंने उसे जान-बूझकर हाथ नहीं लगाया।
नीले दरवाज़े पर टाट पटा था। बंसी ने दो बार खटखटाया। अंदर से चलने की आवाज़ आई, फिर बंदर जैसा ज़ंजीर खुलने का धातु-स्वर।
दरवाज़ा आधा खुला। सामने पैंसठ साल के आसपास की औरत खड़ी थी, हाथ में लाठी, आँखों पर मोटा चश्मा।
"कौन?"
"कमला देवी?" बंसी ने कहा। "हम हरि सिंह जी के बारे में बात करने आए हैं।"
औरत की पकड़ लाठी पर कस गई।
"हरि सिंह दस साल पहले मर गया। मरने वाले के पास बात नहीं होती।"
"तो उनकी मौत के बारे में बात करेंगे," मैंने कहा।
औरत ने मुझे ऊपर से नीचे देखा। फिर शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदला।
"तुम?" उसने शेखर बाबू को पहचान लिया। "तुम आज भी ज़िंदा हो? मुझसे कहा गया था तुम्हें दूर रखो।"
शेखर बाबू नीचे देखकर रहे।
"अंदर आओ," उसने दरवाज़ा खोल दिया। "और जल्दी बोलो, मुझे सुबह काम पर जाना है।"
अंदर कमरा छोटा था, पर साफ़। दीवार पर एक ही तस्वीर टँगी थी — हरि सिंह की, सफ़ेद शेरवानी में। तस्वीर के नीचे छोटी सी अलमारी थी, जिस पर ताला लगा था।
कमला देवी ने हमें बैठने को चारपाई दिखाई और खुद ज़मीन पर बैठ गई।
"बोलो।"
मैंने सीधा पूछा, "हरि सिंह की मौत हार्ट अटैक से हुई थी?"
"डॉक्टरों ने यही कहा।" उसका चेहरा सपाट था।
"और आपको क्या लगता है?"
कमला देवी ने लाठी मज़बूती से पकड़ी। "मुझे क्या लगता है, वो मेरे साथ ही रहेगा। तुम कौन हो?"
"मनोहर। अस्पताल में एक्स-रे टेक्नीशियन। और ये सब —"
"ये सब?" उसने काटा। "मैं जानती हूँ ये सब कौन हैं। शेखर बाबू तो पुराने जाने-पहचाने हैं।" उसने शेखर बाबू को देखा। "तुमने उस रात के बाद मुझसे बात नहीं की। न मेरे पति की श्राद्ध में आए, न मुझे खबर की।"
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