The Token System – Chapter 199
शेखर बाबू की आवाज़ काँपी। "मैं… मैं डर गया था।"
"डर?" कमला देवी हँसी, वो हँसी नहीं थी। "तुम डरे थे या तुम्हें किसी ने डराया था?"
कमरा चुप हो गया। दीपा ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे पूछ रही हो कि क्या वो बोलेगी।
शेखर बाबू ने सिर उठाया। "दोनों। मैं डरा भी था और डराया भी गया था।"
कमला देवी ने लाठी ज़मीन पर टिका दी।
"तो अब सच बोलने का मन है? अचानक क्या हो गया? ये लड़का तुम्हारा क्या लगता है?"
"मेरा कोई नहीं," शेखर बाबू ने कहा। "पर शायद यही सही आदमी है जिसके सामने सच बोलना चाहिए।"
कमला देवी ने एक गहरी साँस ली और अलमारी से एक चाय की केतली निकाली।
"बैठो। चाय पियो। फिर बात करते हैं।"
चाय बनाते वक़्त उसने पीठ किए हुए पूछा, "तुम भवानी के पास से आ रहे हो या भवानी के ख़िलाफ़?"
"भवानी के ख़िलाफ़," मैंने कहा।
"तो याद रखना, भवानी के ख़िलाफ़ खड़े होने का मतलब है उसके दुश्मनों की सूची में नाम चढ़ाना। और वो सूची लंबी है। पर उस सूची में ज़िंदा लोग बहुत कम हैं।"
चाय हमारे सामने रखकर वो बैठी।
"हरि सिंह उसकी सूची में था। वो भवानी के काग़ज़ों पर दस्तख़त करता था, शुरू से। पहले दोस्ती थी, फिर हिस्सेदारी, फिर… फिर झगड़ा। मुझे पता नहीं क्या हुआ, पर उस आख़िरी साल में हरि सिंह रात-रात भर जागता था। कहता था — भवानी ने बहुत लोगों का हिसाब अपने नाम पर चढ़ा लिया है। मैंने कहा, तो छोड़ दो उसका साथ। वो बोला — ये इतना आसान नहीं है।"
कमला देवी ने चाय की चुस्की ली।
"एक रात वो बहुत डरा हुआ आया। कहने लगा, आज मैंने उसके बेटे से काग़ज़ पर दस्तख़त करवा दिए। बेटा सिर्फ़ चौदह साल का था। मैंने पूछा, ऐसा क्यों किया? तो बोला — भवानी ने ही बोला था। भवानी ने कहा, लड़का मेरा है, जो मैं कहूँगा सो करेगा।"
बंसी ने चाय का कप नीचे रख दिया। "ये आप आज तक किसी को नहीं बताया?"
"किसे बताती? मेरा आदमी मर गया। भवानी के आदमी हर गली में हैं। जो बोलता है, वो ग़ायब हो जाता है।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। कमला देवी ने देखा और उसकी आँखें सिकुड़ गईं।
"ये? ये कहाँ से आया?"
"ये मेरे पापा के पास था। हरि सिंह के पास भी था, उनकी मौत से पहले।"
कमला देवी ने टोकन को देखा, फिर हाथ बढ़ाकर छुआ। उसकी उँगली काँप रही थी।
"ये तो वही है," उसने धीरे से कहा। "यही चीज़ हरि सिंह की जेब में रात-रात भर रहती थी। वो कहता था, ये चीज़ गरम होती है तो आवाज़ आती है। पर मैंने उसे कभी गरम होते नहीं देखा। पागल हो गया था वो आख़िरी महीनों में।"
"पागल नहीं था," मैंने कहा। "ये चीज़ काम देती है।"
कमला देवी ने मुझे बहुत देर तक देखा। फिर धीरे से बोली, "तो ये सच है।"
"आपको क्या लगा था?"
"मुझे लगा था कि हरि सिंह का दिमाग़ ख़राब हो गया है। डॉक्टर ले जाने की सोच रही थी। फिर वो रात आई।"
कमरा फिर चुप हो गया। दीपा ने आगे झुककर पूछा, "कौन सी रात?"
कमला देवी ने दीपा को देखा। जैसे पहली बार देखा हो। "ये तुम्हारी बेटी है?" उसने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। शेखर बाबू ने हाँ में सिर हिलाया।
"बेटी।" कमला देवी ने दीपा की तरफ़ देखा। "तुम्हारे बाप ने तुम्हें यहाँ क्यों लाया, ये जानते हो?"
दीपा ने सीधा जवाब दिया, "क्योंकि हमें सच चाहिए।"
कमला देवी मुस्कुराई, पहली बार। "तो सुनो। उस रात हरि सिंह घर नहीं आया। दो दिन बाद उसकी लाश मिली। रेलवे फाटक के पार, सड़क किनारे, गाड़ी में बैठा हुआ। डॉक्टर ने कहा हार्ट अटैक। मैंने शरीर देखा — गर्दन पर नीला निशान था। छोटा सा। मैंने पुलिस को बताया तो उन्होंने कहा, चोट लगी होगी। बस। बात ख़त्म।"
"और भवानी?" मैंने पूछा।
"भवानी श्राद्ध में आया। सबसे आगे बैठा। रोया भी। मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कुछ जानती नहीं। फिर तीन महीने बाद ये मकान मेरे नाम पर खरीद दिया।"
"मतलब चुप्पी का दाम।"
"हर दाम का हिसाब होता है," कमला देवी ने कहा। "मैंने मकान लिया, पर काग़ज़ नहीं माँगे। मैं जानती थी, जो काग़ज़ माँगेगा, वो मेरे हरि जैसा मरेगा।"
शेखर बाबू ने अचानक कहा, "उस रात मैं वहाँ था।"
सब उनकी तरफ़ देखने लगे।
"कौन सी रात?" मैंने पूछा।
"जिस रात हरि सिंह मरा। मुझे भवानी ने बुलाया था। गाड़ी में बैठकर कहा — हरि सिंह को समझा दो, वो अपनी जगह भूल रहा है। मैंने कहा, मैं क्या कर सकता हूँ? भवानी ने कहा, तुमने उसके साथ इतने साल काम किया है, तुम जाकर बात करो। मैं गया। हरि सिंह ने मुझे देखकर कहा — तू भी उसी की तरफ़ है? मैंने कहा नहीं, मैं सिर्फ़ कहने आया हूँ कि भवानी नाराज़ है। तो वो हँसा। बोला — नाराज़ नहीं है, डरा हुआ है। मेरे पास वो काग़ज़ हैं जो उसे ज़मीन दे जाते हैं।"
शेखर बाबू रुके। उनके गाल पर पसीना था।
"फिर?" मैंने कहा।
"फिर मैं चला आया। रात दस बजे। अगली सुबह खबर आई। मैं वापस नहीं गया। मैं… मैं डर गया था।"
कमला देवी ने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सख़्त था, पर आवाज़ धीमी।
"तो तुम भी उसके पीछे खड़े थे।"
"मैं पीछे खड़ा नहीं था। मैं बस… बस कमरे से बाहर खड़ा था।"
"बस कमरे से बाहर खड़े आदमी ने उन काग़ज़ों को यहाँ तक पहुँचने से रोक दिया।" कमला देवी ने शेखर बाबू की तरफ़ इशारा किया। "तुम मरे हुए आदमी के दोस्त थे, और मेरे आदमी का काग़ज़ तुमने उसके मारने वाले को दिया?"
"नहीं!" शेखर बाबू उठ खड़े हुए। "मैंने कुछ नहीं दिया। मैंने उन काग़ज़ों को छिपा दिया।"
कमरा फिर चुप हो गया।
"कहाँ?" मैंने पूछा।
शेखर बाबू ने कमला देवी की तरफ़ देखा। "तुम्हारे ही घर में।"
कमला देवी उठ खड़ी हुई। लाठी उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी।
"क्या?"
"उस रात, उसके जाने से पहले, हरि सिंह ने दो लिफ़ाफ़े मुझे दिए थे। कहा था — एक तू भवानी को दे देना, ताकि वो समझ जाए कि मैं खेल छोड़ रहा हूँ। दूसरा तू अपने पास रखना, अगर मुझे कुछ हो जाए तो कमला को दे देना। जो पहला था, वो भवानी को दे दिया। जो दूसरा था, वो मैंने… मैंने कहीं रख दिया।"
"कहाँ रखा?" कमला देवी की आवाज़ कड़की।
"यहाँ। तुम्हारे दरवाज़े के नीचे। अगली सुबह। जब तुम रो रही थीं। मैं अंदर नहीं आया।"
कमला देवी ने अपना सिर पकड़ लिया। "तुम्हारा मतलब है कि वो काग़ज़ दस साल से मेरे ही घर में थे और मुझे पता नहीं?"
"पता होता तो तुम भी मर जाती," शेखर बाबू ने कहा। "मैंने यही सोचा था।"
कमला देवी बैठ गई। उसकी आँखों में आँसू थे, पर छलके नहीं।
"कौन सा लिफ़ाफ़ा — क्या रंग था?"
"भूरा। मोटा। ऊपर हरि सिंह की लिखाई — अपनी गिनती का।"
कमला देवी उठी। तस्वीर के नीचे की अलमारी खोलकर उसने नीचे से एक गत्ते का डिब्बा निकाला। अंदर पुराने काग़ज़ थे, ज़्यादातर पानी के बिल, कुछ तस्वीरें। फिर उसने आख़िरी तह से एक भूरा लिफ़ाफ़ा निकाला। मोटा। फूला हुआ।
"ये? मुझे लगा सिर्फ़ पुरानी रसीदें हैं। खोलने की हिम्मत नहीं हुई कभी।"
शेखर बाबू ने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया। उँगलियाँ काँप रही थीं।
"यही है।"
मैंने आगे बढ़कर उसे खोला। अंदर तीन चीज़ें थीं — चार पन्नों का मुड़ा काग़ज़, एक छोटी चाबी, और एक फोटो। फोटो में हरि सिंह था, भवानी का पिता था, और… दादा थे। तीनों हवेली के आगे खड़े, हाथ में पीतल का डिब्बा।
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