The Token System197 / 1154

The Token System – Chapter 197

7 min read November 6, 2026

बंसी ने गाड़ी की चाबी घुमाई ही थी कि हाथ रुक गया।

"क्या मतलब?"

"मतलब ये कि भवानी टोकन खुद नहीं चलाता। वो अपना हिसाब दूसरों से करवाता है — और हर बार हिसाब जब भारी होता है, तो वो अपने बेटे के नाम पर चढ़ जाता है। टोकन गवाही माँगता है, बेटे के नाम की।"

"ये तुम्हें कैसे पता?"

"मैंने एक बार भवानी की तिजोरी खोली थी," शेखर बाबू ने धीरे से कहा। "जब वो शहर में नहीं था। उसमें एक बही थी। उस बही के हर पन्ने पर दो नाम थे — हरि सिंह और विक्रम। और एक तारीख़। बस। मैंने वो बही वापस रख दी और तिजोरी बंद कर दी। उसके बाद तीन महीने तक मुझे रात में नींद नहीं आई।"

"वो बही अब है तो?"

"उसी तिजोरी में होगी।"

बंसी ने गाड़ी स्टार्ट कर दी।

"अब कहाँ?" उसने पूछा।

"एक जगह है," मैंने कहा। "जहाँ से सब शुरू हुआ था। हवेली।"

बंसी ने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा।

"इस वक़्त?"

"इस वक़्त।"

शेखर बाबू ने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"मनोहर, एक बात और।"

"क्या?"

"तेरे पापा ने मुझे एक बार कुछ दिया था। तेरे पापा ने, वो भी उस वक़्त जब मैं उनके ख़िलाफ़ खड़ा था। उसने कहा था — शेखर, मैं जानता हूँ तू मेरे बेटे को धमकाएगा। पर मैं तुझे एक चीज़ देता हूँ, इसलिए देता हूँ कि तेरी बेटी मेरी बेटी जैसी है। और उसने मुझे एक पर्ची दी जिसे मैंने आज तक नहीं खोला।"

मेरी साँस अटक गई।

"वो पर्ची कहाँ है?"

"मेरे घर के उसी संदूक में जहाँ मेरी बेटी की तस्वीर है। उसे मैं कभी नहीं जलाऊँगा, चाहे भवानी कुछ भी कहे।"

बंसी ने गाड़ी आगे बढ़ाई।

"हवेली की तरफ़?"

"नहीं," शेखर बाबू ने कहा। "पहले मेरे घर। वो पर्ची तेरे पास होनी चाहिए, मनोहर। तेरे पापा ने लिखी थी।"

रात गहरी थी। गाड़ी की लाइट सड़क पर पीली पड़ रही थी। मैंने जेब में हाथ डाला — टोकन ठंडा था, जैसे कोई लंबी यात्रा से लौटा हो।

मैंने पीछे मुड़कर शेखर बाबू को देखा।

"बाबू।"

"हाँ?"

"एक बात साफ़ कर लें। आपने मेरे पापा के साथ बहुत किया। पर आज आपने वो पर्ची देनी है। बाद में कोई शर्त नहीं। चाहे आपकी बेटी हो, चाहे आपकी नौकरी हो।"

शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। गाड़ी की लाइट में उनका चेहरा सफ़ेद लग रहा था।

"मनोहर," उन्होंने कहा, "मैं पचपन साल का हूँ। मैंने इस शहर में हर किस्म का आदमी देखा है। पर तेरे जैसा 'ना' कहने वाला लड़का पहली बार देख रहा हूँ।"

"ये 'ना' नहीं है, बाबू। ये हिसाब है।"

शेखर बाबू चुप रहे। फिर उन्होंने बंसी से कहा — "तेज़ चलाओ।"

गाड़ी शेखर बाबू के घर के गेट पर रुकी। घर अँधेरा था, बस बरामदे की एक बत्ती जल रही थी।

शेखर बाबू ने चाबी जल्दी-जल्दी घुमाई, पर ताले ने दो बार धोखा दिया। तीसरी बार में खुला।

"दीपा सो रही होगी," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "धीरे बोलना।"

हम अंदर गए। कमरे में पुरानी अलमारी, एक मेज़, और कोने में एक लकड़ी का संदूक रखा था। संदूक पर धूल की मोटी परत थी।

शेखर बाबू ने संदूक खोला। ऊपर उनकी बेटी की तस्वीर थी, स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में। उन्होंने तस्वीर उठाई और उसके नीचे से एक मुड़ी हुई पर्ची निकाली। काग़ज़ पीला पड़ गया था, किनारों से फटा हुआ।

"ये है," उन्होंने कहा। उनका हाथ काँप रहा था।

मैंने पर्ची ली।

बंसी मेरे कंधे के ऊपर से झाँका।

पर्ची पर मेरे पिता की लिखाई थी। मैंने वो लिखाई जानी पहचानी — स्कूल की कॉपी पर साइन करते वक़्त, वो हमेशा 'अ' के ऊपर एक छोटा सा झुकाव डालते थे।

पर्ची पर लिखा था —

'भवानी की तिजोरी में बही है। बही के पहले पन्ने पर मेरा नाम नहीं, मेरे हाथ की नहीं। दूसरे पन्ने पर हरि सिंह का नाम है। हरि सिंह कौन है, ये मुझे बाद में पता चला। जब पता चला, तो मैंने इस पर्ची को शेखर के पास रख दिया, क्योंकि मैं जानता हूँ कि अगर मेरे साथ कुछ हो गया, तो शेखर कभी न कभी तिजोरी खोलेगा। शेखर को लालच है, पर शेखर का पेट भर जाएगा, तो वो सच बोल देगा। — नंदकिशोर'

मैंने पर्ची पढ़कर बंसी को दी। बंसी ने दो बार पढ़ा।

"हरि सिंह?" बंसी ने शेखर बाबू की तरफ़ देखा।

शेखर बाबू चुप थे।

"बाबू, आपने कहा था कि बही में दो नाम थे — हरि सिंह और विक्रम। हरि सिंह कौन है?"

शेखर बाबू ने बरामदे की तरफ़ देखा, जैसे वहाँ कोई खड़ा हो।

"हरि सिंह भवानी का पुराना साझेदार था," उन्होंने धीरे से कहा। "उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं है, किसी सरकारी फ़ाइल में नहीं है। पर जो भी इस शहर में ज़मीन का पुराना खेल जानता है, वो हरि सिंह का नाम जानता है। हरि सिंह अब नहीं है। मर गया। दस साल पहले।"

"मर गया?"

"हार्ट अटैक कहा गया था। पर शहर में ये भी कहा गया कि हरि सिंह को भवानी ने ही मरवाया। क्योंकि हरि सिंह ने भवानी को धमकाया था — कहा था कि वो बही किसी और के पास भेज देगा अगर भवानी उसका हिस्सा नहीं देगा।"

मेरी जेब में टोकन ठंडा था, पर मुझे ऐसा लगा जैसे वो ज़रा गरम हुआ। मैंने जेब में हाथ डालकर उसे दबाया।

"बाबू," मैंने कहा, "आपने सुबह कहा था कि पापा के पास एक टोकन था जो उन्होंने भवानी से लिया या भवानी को दिया। साफ़ बताइए।"

शेखर बाबू ने कुर्सी पकड़ी और बैठ गए। उनके घुटने टेढ़े हो गए थे।

"तेरे पापा ने वो टोकन भवानी से नहीं लिया था। उसने वो टोकन हरि सिंह से लिया था। हरि सिंह के मरने से दो दिन पहले।"

बंसी ने साँस खींची।

"ये आपने अब तक क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि इस बात में मेरी गर्दन भी फँसती है," शेखर बाबू ने कहा। "हरि सिंह के मरने की रात मैं उसके घर पर था। मैं गया था उससे कुछ माँगने। जब मैं गया, वो मरा पड़ा था। मैंने कुछ छुआ नहीं, मैं भाग आया। पर अगले दिन भवानी ने मुझे बुलाया और कहा — शेखर, तू उस रात वहाँ था, मेरे आदमी ने तुझे देखा है। तू चुप रहेगा, तो मैं तेरी बेटी की शादी अपने खर्चे से करवा दूँगा।"

"तो आपने चुप्पी बेच दी," मैंने कहा।

"हाँ।"

शेखर बाबू ने अपना चश्मा उतारा। उनकी आँखों के नीचे काला घेरा था।

"पर आज," उन्होंने कहा, "मैं चुप नहीं रहूँगा। चाहे जो हो।"

तभी बाहर गली में गाड़ी की आवाज़ आई। बंसी दौड़कर खिड़की के पास गया।

"दो गाड़ियाँ," उसने कहा। "भवानी के आदमी हैं। शायद तीन-चार।"

शेखर बाबू उठ खड़े हुए। उनका चेहरा फिर सफ़ेद हो गया।

"दीपा," उन्होंने कहा। "मेरी बेटी अंदर सो रही है।"

"बाबू, आप पीछे के दरवाज़े से दीपा को लेकर निकलिए," मैंने कहा। "बंसी, तुम उनके साथ जाओ।"

"और तुम?"

"मैं सामने से जाऊँगा। उन्हें लगेगा हम सब भाग गए।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। वो कुछ कहना चाहता था, पर फिर भीतर गया।

दरवाज़े पर तेज़ दस्तक हुई। फिर आवाज़ आई — "शेखर बाबू! खोलिए। भवानी जी ने बुलाया है।"

मैंने पर्ची अपनी जेब में रखी, टोकन के साथ। मैं सामने के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, पर पीछे से बंसी की आवाज़ आई — "मन्नू, गाड़ी की चाबी मेज़ पर है।"

मैं मुड़ा। मेज़ पर चाबी पड़ी थी। मैंने उसे उठाया।

बाहर दस्तक तेज़ हो गई। "शेखर बाबू! खोलिए, वरना तोड़ देंगे!"

मैं खिड़की के पास गया और सावधानी से बाहर झाँका। दो आदमी गेट पर खड़े थे, एक हाथ में डंडा लिए। तीसरा गाड़ी के पास था।

मैंने पीछे की तरफ़ जाने वाला रास्ता देखा। शेखर बाबू अपनी बेटी को जगा रहे थे। दीपा ने कंबल ओढ़े हुए दरवाज़े से झाँका — उसकी आँखें डर से फैली थीं।

"बेटा, चुपचाप मेरे पीछे आ," शेखर बाबू ने कहा।

मैंने बंसी को इशारा किया। वो दीपा के साथ पीछे के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

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