The Token System196 / 1154

The Token System – Chapter 196

7 min read November 6, 2026

रसोई के दरवाज़े पर खड़ा आदमी पीछे मुड़ा ही था कि बंसी ने मेरा कंधा दबाया। मैं दीवार से चिपक गया। चारों तरफ़ अंधेरा, बस दूर बरामदे में एक पीली बत्ती जल रही थी, जिसमें धुआँ-सा उठता दिख रहा था — कोई बीड़ी पी रहा था।

"दो आदमी हैं," बंसी ने फुसफुसाया। "एक रसोई के अंदर, एक सीढ़ी के मोड़ पर।"

"तीसरा?"

"तीसरा गेट पर। चार तो बाहर ही हैं।"

मैंने धीरे से कदम बढ़ाया। होम की पिछली दीवार के साथ-साथ कूड़े का ढेर था, उसके ऊपर एक टूटी खिड़की — जिसकी सलाखें ज़ंग खाकर झुक गई थीं। मैंने उँगलियाँ डालकर सलाख खींची। कच्ची थी, एक झटके में निकल आई।

"यहाँ से अंदर क्या है?"

"धीरे बोल," बंसी ने कहा। "अंदर जो कमरा है, वो मुझे याद है।"

मैं झाँककर देखने लगा।

कमरा बड़ा था, पर सामान से भरा — पुरानी कुर्सियाँ, टूटी मेज़ें, कोने में एक लोहे का डिब्बा। बीच में कुर्सी पर शेखर बाबू बैठे थे। हाथ पीछे बँधे थे, चश्मा एक काँप पर टेढ़ा लटका था। सामने खड़ा आदमी लंबा था, सफ़ेद कुर्ता, कमर पर पेटी। उसकी उँगली में वही पीतल की अँगूठी चमक रही थी।

"शेखर बाबू," आदमी ने कहा, आवाज़ में वो ठंडक थी जो धमकी में नहीं, हिसाब में होती है। "आपने सुबह से बहुत सारी बातें बताई हैं। पर एक बात अभी बाकी है।"

"मैंने सब बता दिया," शेखर बाबू की आवाज़ काँप रही थी। "जो जानता था, सब।"

"टोकन का सच। कहाँ है, कैसे चलता है, किसके हाथ में।"

"मुझे नहीं पता।"

आदमी ने झुककर उनका टेढ़ा चश्मा सीधा किया। "शेखर बाबू, आप पचपन के हैं। मैं तीस का हूँ। मुझे आपसे ज़्यादा वक़्त है।"

"मैं सच कह रहा हूँ," शेखर बाबू ने हाथ जोड़ने की कोशिश की, पर हाथ पीछे बँधे थे। "टोकन के बारे में मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि वो अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड कमरे में किसी दराज़ में रखा था। मैंने उसे कभी नहीं छुआ। छूने की हिम्मत नहीं हुई।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो उसे छूता है, उसका हिसाब बदल जाता है। और मैं अपने हिसाब से डरता हूँ।"

आदमी हँसा। हँसी छोटी थी, जैसे कोई काग़ज़ फाड़ रहा हो।

"आपका हिसाब तो पहले ही बदल चुका है, शेखर बाबू। आपने सुनीता देवी का नाम रजिस्टर से मिटाया। आपने आठ साल में तीन सौ सत्ताईस मरीज़ भेजे। इनमें से कितने लौटे?"

शेखर बाबू ने आँखें नीची कर लीं।

"सवाल का जवाब दीजिए।"

"मुझे गिनती नहीं याद।"

"तो मैं याद दिला दूँ। चौदह लौटे। बाकी — मरे, बिके, या गुम।"

मेरी मुट्ठी भर गई। बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी।

"अभी नहीं," उसने फुसफुसाया।

मैंने आसपास देखा। खिड़की के नीचे ईंटें रखी थीं। मैंने धीरे से एक छोटी ईंट उठाई और दूसरी तरफ़, दूर दरवाज़े की तरफ़ फेंकी। ईंट जाकर एक टूटी बाल्टी से टकराई। खड़खड़ाहट से पूरा कमरा गूँज उठा।

सफ़ेद कुर्ते वाला सिर उठाकर सुनने लगा।

"क्या था?"

रसोई के दरवाज़े से दूसरा आदमी आया। छोटा, गठीला, सिर पर पगड़ी जैसा कुछ।

"मुझे नहीं पता। बाहर कोई है?"

"जाकर देख।"

वो बाहर गया। सफ़ेद कुर्ते वाले ने शेखर बाबू की तरफ़ फिर मुँह किया, पर उसका ध्यान बँट चुका था।

मैंने बंसी की तरफ़ देखा।

"दो मिनट," बंसी ने कहा। "और अगर वो लौट आया तो?"

"तो तेरे पास मेरी चप्पल है। कुछ न कुछ सोच लेना।"

बंसी ने सिर हिलाया और खिड़की के रास्ते अंदर उतर गया। उसका शरीर भारी था, पर वो किसी बिल्ली की तरह ज़मीन पर पहुँचा। मैंने उसके हाथ में चाकू पकड़ाया — मेरी जेब में ही था, बंसी ने रास्ते में दिया था।

बंसी दीवार के साथ सरककर शेखर बाबू के पीछे पहुँचा। रस्सी काटने में उसे एक पल लगा। शेखर बाबू ने पीछे हाथ खींचे और चौंककर बंसी को देखा।

"चुप," बंसी ने फुसफुसाया। "चुप रहो, बाबू।"

तभी बाहर वाला आदमी लौट आया। "कुछ नहीं, बिल्ली थी।"

"अच्छा," सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा। "तो शेखर बाबू, सुनो। मैं तुम्हें एक बार फिर मौका देता हूँ। टोकन जिस दराज़ में था, वो दराज़ अब खाली है। तुम्हारे जाने के बाद कोई उसे ले गया। कौन था?"

"मुझे क्या पता?"

"तुम्हारे पास उस कमरे की चाबी थी। तुम्हारे सिवा कोई नहीं जा सकता था।"

"चाबी…" शेखर बाबू ने धीरे से कहा, "चाबी तो अस्पताल के सब क्लर्कों के पास रहती है। तीन लोगों के पास।"

सफ़ेद कुर्ते वाले ने उन्हें घूरा।

"तीन लोग? नाम?"

"मैं… मैं, और…" शेखर बाबू ने आँखें बंद कर लीं, "और जो अब नहीं है। और एक और था, पर वो रिटायर हो गया।"

"झूठ।"

"सच कह रहा हूँ।"

आदमी ने झपटकर उनका कॉलर पकड़ा। बंसी पीछे खड़ा था, चाकू हाथ में। मैंने देखा कि शेखर बाबू की नज़र बंसी की ओर उठी और फिर तुरंत नीची हो गई, जैसे कुछ न देखा हो।

मैं समझ गया — शेखर बाबू खुद वक़्त खींच रहे थे।

तभी सीढ़ी से आवाज़ आई। "भैया! भैया, तीसरी मंज़िल से आवाज़ आ रही थी।"

सफ़ेद कुर्ते वाले ने शेखर बाबू को छोड़ा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

"तुम दोनों यहीं रहो। मैं देखकर आता हूँ।"

वो निकल गया।

बंसी ने शेखर बाबू को उठाया। "चलिए, बाबू।"

"मेरी कमर," शेखर बाबू ने कराहकर कहा, "मेरी कमर टूट गई है।"

"अभी नहीं टूटी," बंसी ने उनका हाथ खींचा। "चलिए।"

हम खिड़की तक आए। शेखर बाबू को ऊपर चढ़ाना मुश्किल था। मैंने उन्हें कमर से पकड़ा और खींचा। बंसी ने नीचे से धक्का दिया। शेखर बाबू कराह रहे थे, पर चुप थे — होंठ भींचे हुए।

हम बाहर कूड़े के ढेर पर गिरे। मैंने धूल झाड़ी।

"अब कहाँ?"

"पीछे के फाटक से," बंसी ने कहा। "पर वो रास्ता अब भरा हुआ है। पहले जो मोटा पहरेदार था, वो अब चौकन्ना है।"

"तो?"

बंसी ने आसपास देखा। "बगीचे से होकर चलो। टूटे तालाब के पास से।"

हम बगीचे की तरफ़ बढ़े। झाड़ियाँ घुटनों तक थीं। शेखर बाबू बीच में थे, हम दोनों उन्हें सहारा दे रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक बार पीछे देखा — होम की इमारत पेड़ों के पीछे छिप रही थी।

"मनोहर," उन्होंने कहा, आवाज़ में अब वो कंपन नहीं थी, कुछ और था। "मैंने तुम्हारा नाम क्यों लिया, जानते हो?"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारे पापा ने एक बार मेरी बेटी को बचाया था।"

मैं रुका। शेखर बाबू ने कहा, "बाद में बताता हूँ। पहले यहाँ से निकलो।"

टूटे तालाब के पास ज़ंग लगी सलाखें थीं, जो काई से ढकी थीं। उनके नीचे से एक सूखी नाली जाती थी — बंसी ने रास्ता जाना हुआ था। हम झुककर उसमें घुसे। नाली सँकरी थी, पर आगे जाकर चौड़ी हो गई और एक टूटी दीवार से आ मिली।

मैंने साँस रोकी। दीवार के उस पार एक आदमी पेशाब कर रहा था और सीटी बजा रहा था। हम दीवार के इस तरफ़ चिपके रहे। फिर, जब सीटी की आवाज़ दूर गई, हमने दीवार की ईंट हटाई और गली में आए।

वहाँ बंसी की गाड़ी खड़ी थी।

बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।

शेखर बाबू पीछे बैठे थे, साँस फूल रही थी। उनका चश्मा अब भी टेढ़ा था, पर उन्होंने उसे सीधा नहीं किया।

गाड़ी बीस मिनट चली। फिर बंसी ने उसे गली के कोने पर एक पेड़ के नीचे रोका। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"अब बताओ, बाबू।"

शेखर बाबू ने गले में उतरती साँस ली।

"मैंने तुम्हें सुबह सच नहीं बताया था," उन्होंने कहा। "मैंने कहा था — मैं डर के मारे भवानी के साथ था। सच ये है कि मैं लालच के मारे था। डर तो बाद में आया, जब बेटी की शादी टूटी।"

मैं कुछ नहीं बोला।

"पर एक बात," उन्होंने मेरी तरफ़ मुँह किया, "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई। और जिसे जानकर मैं आज भी काँपता हूँ।"

"क्या?"

"भवानी के टोकन पर जो अंक चलते हैं… उनका हिसाब उसके बेटे के नाम पर है। विक्रम के नाम पर।"

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