The Token System185 / 1154

The Token System – Chapter 185

7 min read November 6, 2026

रामलाल ने धीरे से कहा, "वो मेरे सामने ही बैठा था।"

मैं रुक गया।

"उसने अपना नाम नहीं बताया। बस बोला — तेरी ज़मीन तो चली जाएगी। पर जिसने इसे ख़रीदा है, वो तुझे इलाज के पैसे देगा।"

"तुमने पैसे लिए?"

"नहीं।" बूढ़े ने सिर झुकाया। "मैंने कहा — ज़मीन उसकी, इलाज भगवान का। और मैं उठ आया।"

मैंने उसका हाथ छोड़ा। "काका, वो आदमी आज भी ज़िंदा है। और उसका काग़ज़ मेरी जेब में है। पर वो काग़ज़ भवानी की तिजोरी में जाते-जाते रास्ते में एक और हाथ से गुज़रेगा। तुम उस हाथ को नहीं जानते, पर वो आज दो बजे तुम्हारे काग़ज़ को तुम्हारे हाथ में रख सकता है।"

रामलाल ने मुझे देखा। फिर उसने जेब से एक काग़ज़ निकाला — फटा हुआ, मैला। "ये उस आदमी ने मुझे दिया था, जिसने ज़मीन ख़रीदी। बोला — अगर कभी लड़ना हो, तो इसे दिखाना।"

मैंने काग़ज़ खोला। ऊपर भवानी के कारिंदे का नाम था। नीचे एक और नाम — रामदीन।

मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने टोकन जेब से निकाला। वो इस वक़्त गरम था। गरम नहीं, जल रहा था। जैसे किसी ने उसे अंगारे पर रख दिया हो। मैंने उसे हथेली पर रखा तो उँगली जल गई। मैंने उसे झटककर जेब में डाला।

कान में आवाज़ आई, बहुत साफ़। "तहसील का काग़ज़ वो नहीं है जो भवानी के पास है। तहसील का काग़ज़ वो है जो रामदीन के पास है।"

मैंने रामलाल को देखा। उसकी आँखें सूखी थीं। "काका, तुम घर जाओ। पत्नी के पास। मैं तहसील जा रहा हूँ।"

"दो बजे?"

"नहीं। अभी।"

मैंने टोकन जेब में रखा और थाने के गेट की तरफ़ चल दिया। पीछे से हवलदार की आवाज़ आई — "दस बजे क्या करेगा?"

"दस बजे तक मैं वो काग़ज़ लेकर आऊँगा जो रामलाल के नाम होगा। और उसके साथ एक रिपोर्ट भी लाऊँगा — जिसमें भवानी का नाम होगा।"

हवलदार एक पल को रुका। फिर बोला, "भवानी का नाम काग़ज़ में नहीं होता, भाई। उसका नाम दूसरों के अँगूठे में होता है।"

"तो आज वो अँगूठा भी साथ लाऊँगा।"

मैंने जेब में टोकन को छुआ। वो ठंडा हो गया था। और कान में आवाज़ आई — "अब शुरू हुआ। तेरा हिसाब नहीं। रामलाल का हिसाब।"

तहसील का रास्ता मैंने पैदल ही पकड़ा। साइकिल वाला एक लड़का दौड़कर आया, बोला, "अन्ना, थाने में हवलदार ने भेजा है। बोला, तुम्हें रिक्शा कर दूँ।" मैंने उसके हाथ में दस रुपये रखे और कहा, "रिक्शा नहीं, तू मेरे साथ चल। रास्ते में कुछ पूछना है।"

लड़के का नाम बंटी था। सोलह साल का, थाने के बाहर चाय बेचता था। वह चलते-चलते बोला, "रामदीन मुंशी का क्वार्टर तो मालूम है मुझे। पर अन्ना, वहाँ जाना ठीक नहीं। बोलते हैं वो पागल हो गया है। तीन साल से किसी से बोलता नहीं।"

"पागल नहीं है।" मैंने कदम तेज़ किए। "डरा हुआ है।"

तहसील का दफ़्तर बंद था — रविवार। पीछे कर्मचारियों की कॉलोनी थी, पुरानी, पीली दीवारें, छतों पर कबूतर। बंटी ने सबसे आख़िरी क्वार्टर की तरफ़ उँगली उठाई। दरवाज़े पर ताला नहीं था, बस एक कील टेढ़ी लगी थी।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कोई जवाब नहीं। फिर धक्का दिया तो खुल गया।

अंदर अंधेरा था। बदबू आ रही थी — बंद कमरे की, पुराने काग़ज़ों की। एक खिड़की थी जिस पर अख़बार चिपका था। उसी की पतली दरार से रोशनी आ रही थी। कोने में एक चारपाई थी, और उस पर कोई बैठा था — सफ़ेद बाल, झुकी कमर, हाथों में एक रजिस्टर।

"रामदीन जी?"

वो हिला नहीं। मैंने पास जाकर देखा। वो जाग रहा था। आँखें खुली थीं, पर खिड़की की दरार पर टिकी थीं।

"मैं मन्नू हूँ। रामलाल का काग़ज़ लेकर आया हूँ।"

रजिस्टर उसके हाथ से फिसला। मैंने झटकर पकड़ा। वो बोला, आवाज़ सूखी, "तुम उस दिन के बाद पहले आदमी हो जो इस कमरे में आया है।"

"हवलदार ने भेजा है। वो कहता है तुम्हें दो बीघा का हिसाब मालूम है।"

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। फिर रजिस्टर मेरे हाथ से लिया और उलटने लगा। "लालाजी के बाप ने ज़मीन गिरवी रखी थी — दो हज़ार के लिए। काग़ज़ मैंने ही लिखा था।" उसकी उँगली एक पन्ने पर रुकी। "पर ये जो अब भवानी के नाम चढ़ी है, ये काग़ज़ मैंने नहीं लिखा।"

"तो किसने?"

"मेरे हाथ से लिखवाया गया।" उसने रजिस्टर मेरी तरफ़ सरका दिया। "उस रात दो आदमी आए थे। एक ने मेरी मेज़ पर बंदूक रख दी। दूसरे ने काग़ज़। बोले — लिखो। मैंने लिख दिया। सुबह अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया।"

मैंने रजिस्टर में देखा। नीचे हाशिये पर एक तारीख़ थी, और उसके नीचे दो गवाहों के दस्तख़त। एक दस्तख़त पढ़ते ही मेरा हाथ रुक गया।

"ये दूसरा दस्तख़त किसका है?"

रामदीन ने मेरी आँखों में देखा। "तुम्हारे हवलदार का।"

मैं वहीं खड़ा रह गया। कमरे की बदबू अचानक तेज़ हो गई।

"वो उस रात वहाँ था?"

"वो चपरासी था। काग़ज़ उसी ने मेरी मेज़ तक लाया था।" रामदीन की आवाज़ टूटी। "पर उसने बंदूक नहीं उठाई। उसने बस आँखें नीची कर लीं। और मैंने लिख दिया। दोनों ने कुछ नहीं किया। इसीलिए आज तक दोनों ज़िंदा हैं।"

मैंने रजिस्टर बंद किया। "ये रजिस्टर मुझे चाहिए।"

"ले जाओ।" उसने हाथ उठाया। "तीन साल से मैं इसी रजिस्टर को छुपा रहा था। अब तुम्हें देकर हल्का लगा।" फिर वो फुसफुसाया, "पर एक बात — जब थाने पहुँचो, तो हवलदार से अकेले में नहीं मिलना।"

मैंने रजिस्टर जेब में रखा और बाहर निकला। बंटी बाहर दरवाज़े पर बैठा था। मुझे देखकर खड़ा हो गया। "अन्ना, थाने से एक आदमी आया था। पूछ रहा था — कोई मन्नू नाम का आदमी इधर आया?"

"कैसा दिखता था?"

"काला कोट, मोटी मूँछ। बोला, भवानी सिंह का आदमी है।"

मैंने बंटी का कंधा पकड़ा। "तू अभी थाने जा। हवलदार को बता — मैं रामदीन का रजिस्टर लेकर सीधा तहसील के तहसीलदार के घर जा रहा हूँ। रामलाल को भी साथ ले जाना। और किसी को कुछ मत बताना।"

बंटी दौड़ गया। मैं उल्टी तरफ़ मुड़ा — पीछे के रास्ते से, जहाँ से मुंशियों की कॉलोनी कटती थी। जेब में टोकन ठंडा था, पर रजिस्टर भारी लग रहा था।

कान में आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ एक बात मेरे अंदर चल रही थी — जिस हवलदार ने आज सुबह रिपोर्ट लिखवाने में मदद की, वो उस रात मेज़ के पास खड़ा था।

तहसीलदार का घर कॉलोनी के बाहर था, नीली बत्ती वाली गली में। मैंने गेट खटखटाया। एक बूढ़ा चौकीदार आया।

"तहसीलदार जी से मिलना है।"

"रविवार को नहीं मिलते।"

"कहो — रामलाल के काग़ज़ की बात है। और ये भी कहो कि भवानी सिंह की तिजोरी का रास्ता मुझे मालूम है।"

चौकीदार घबराया। वो अंदर गया। दो मिनट बाद लौटा। "अंदर आ जाओ।"

अंदर हॉल में तहसीलदार बैठे थे — चालीस के आसपास, चश्मा, हाथ में अख़बार। मैंने रामदीन का रजिस्टर मेज़ पर रख दिया। "साहब, इस रजिस्टर में दो गवाहों के दस्तख़त हैं। एक हवलदार का, और दूसरा —"

"दूसरा मेरा।" तहसीलदार ने अख़बार रख दिया। "तुम कौन हो?"

मैं चुप खड़ा रहा।

तहसीलदार उठे, खिड़की की तरफ़ गए, पीठ करके बोले, "उस रात मैं नायब तहसीलदार था। मुझे बस इतना कहा गया था कि काग़ज़ पर दस्तख़त कर दो, बात आगे नहीं जाएगी। मैंने कर दिए।" फिर वो मुड़े। "अब बताओ, तुम किसके आदमी हो? भवानी के, या उस बूढ़े के?"

"उस बूढ़े के। और मेरे पास वो काग़ज़ भी है जो भवानी के कारिंदे ने रामलाल को दिया था।"

तहसीलदार ने हाथ आगे बढ़ाया। "दिखाओ।"

मैंने जेब से काग़ज़ निकाला और झट से वापस रख दिया। "पहले ये बताओ — दो बजे क्या होने वाला है?"

तहसीलदार एक पल रुके। फिर बोले, "दो बजे भवानी का आदमी तहसील के रिकॉर्ड रूम से असली फ़ाइल निकालेगा। उस फ़ाइल में रामलाल के बाप का गिरवी काग़ज़ है — असली, बिना दस्तख़त वाला। उसके बाद भवानी के पास काग़ज़ भी होगा और रिकॉर्ड भी।"

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