The Token System – Chapter 186
"तो फ़ाइल अभी कहाँ है?"
तहसीलदार ने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और मेज़ पर रख दी। "रिकॉर्ड रूम में। और बंदा जो आने वाला है, उसके पास भवानी की तिजोरी की दूसरी चाबी है।"
मैंने चाबी उठाई।
तभी बाहर गेट पर ज़ोर की आवाज़ हुई। चौकीदार की घबराई आवाज़ आई, "साहब, भवानी सिंह का आदमी आया है। कह रहा है — फ़ाइल लेने आया हूँ।"
तहसीलदार का चेहरा सफ़ेद हो गया। मैंने चाबी जेब में डाली और खिड़की की तरफ़ देखा। नीचे गली में काला कोट पहने एक आदमी खड़ा था, और उसके पीछे दो और।
तहसीलदार ने धीरे से कहा, "अब बताओ, तुम इस काग़ज़ को लेकर कहाँ जाओगे? भवानी का आदमी दरवाज़े पर है, और तुम्हारे पास वक़्त दो बजे तक का है।"
मैंने टोकन जेब में छुआ — वो ठंडा था। और ठीक उसी वक़्त कान में आवाज़ आई, बहुत धीमी, "तिजोरी की चाबी तेरे पास नहीं है। पर तिजोरी का पता तेरे पास है।"
मैंने तहसीलदार की तरफ़ देखा। "साहब, आपके पास भवानी की तिजोरी की चाबी क्यों नहीं है?"
तहसीलदार ने सिर नीचा किया।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक आवाज़ आई — "तहसीलदार साहब, फ़ाइल निकालिए। वक़्त हो गया।"
तहसीलदार ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो रामदीन की आँखों में था। मैंने चाबी जेब में दबाई और खिड़की से नीचे देखा। काला कोट वाला अब गेट के अंदर आ रहा था।
तहसीलदार उठे और दरवाज़े की तरफ़ बढ़े।
मैंने उनका हाथ पकड़ा। "साहब, अगर आज आप दरवाज़ा खोलेंगे, तो कल आपका दस्तख़त वाला ये रजिस्टर भवानी की तिजोरी में जाएगा। और आप वहीँ रुक जाएँगे जहाँ रामदीन रुका।"
तहसीलदार रुक गए। बाहर से फिर दस्तक हुई, इस बार तेज़।
तहसीलदार ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोले, "फ़ाइल रिकॉर्ड रूम के पीछे वाली खिड़की से निकालो। चाबी तुम्हारे पास है। मैं दरवाज़ा खोलकर उसे बैठा लेता हूँ — दो-चार मिनट।"
मैंने सिर हिलाया और पीछे के रास्ते की तरफ़ बढ़ा। पीछे मुड़कर देखा तो तहसीलदार दरवाज़े की तरफ़ जा रहे थे, और उनके कदम आज सुबह से थोड़े सीधे थे।
मैं रिकॉर्ड रूम की खिड़की तक पहुँचा। चाबी घुमाई। अंदर रैक पर फ़ाइलें रखी थीं, धूल में लिपटी। मैंने रामलाल का नाम ढूँढा। तीसरी रैक पर, सबसे ऊपर, एक पीली फ़ाइल थी।
मैंने फ़ाइल खोली। अंदर रामलाल के बाप का नाम था, और उसके नीचे एक और काग़ज़ — जिस पर लिखा था कि ये ज़मीन गिरवी है, और गिरवी रखने वाले का नाम भवानी सिंह के कारिंदे के रूप में लिखा था।
मैंने फ़ाइल अपने सीने से लगाई और खिड़की से बाहर कूदा।
पीछे से आवाज़ आई — "रुको!"
मैं दौड़ा। गली के मोड़ पर मुड़ा और थाने की तरफ़ भागा। सामने बंटी दिखा, दौड़ता हुआ आ रहा था, पीछे रामलाल — पगड़ी बँधी हुई, कदम धीमे पर आँखों में कुछ जल रहा था।
मैं थाने के गेट पर पहुँचा। हवलदार बाहर बेंच पर बैठा था। मुझे देखकर उठा।
"फ़ाइल मिली?" उसने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये वही हवलदार था जिसने उस रात रामदीन की मेज़ पर आँखें नीची की थीं।
मैंने फ़ाइल उसकी तरफ़ बढ़ाई। "ये रिपोर्ट के साथ जाएगी। और अब आप कहिए — तहसील का काग़ज़ भवानी की तिजोरी में है या इस फ़ाइल में?"
हवलदार ने फ़ाइल ली, खोली, और एक पल को उसका चेहरा बदला। फिर उसने फ़ाइल बंद की, मेरी तरफ़ बढ़ाई, और कहा, "रिपोर्ट तो लिखी जाएगी, पर उसके लिए तहसील का काग़ज़ चाहिए, और वो काग़ज़ अभी भवानी सिंह की तिजोरी में है।"
"पर ये
॥
थाने के गेट से लौटते वक़्त मेरी जेब में रामलाल की फ़ाइल थी और सिर में बस एक बात — हवलदार कह रहा था काग़ज़ भवानी की तिजोरी में है। मैंने बंटी की तरफ़ देखा, वो रामलाल को पकड़े खड़ा था, और रामलाल की आँखें अब भी उसी फ़ाइल पर टिकी थीं जो मेरे सीने से चिपकी थी।
"काका, आप घर जाइए," मैंने कहा। "अस्पताल में आपकी औरत है, वहाँ से लौटकर आ जाइएगा।"
रामलाल ने सिर हिलाया, पर पैर नहीं हिले। "बेटा, वो काग़ज़ मेरे बाप का है। मैंने बीस साल उसके लिए भटकते हुए गुज़ार दिए। अगर वो तिजोरी से निकलेगा, तो मैं वहीं खड़ा रहूँगा।"
"अभी नहीं।" मैंने उसका कंधा थामा। "पहले मुझे एक काग़ज़ की कॉपी चाहिए। अस्पताल का पुराना रिकॉर्ड कमरा। शेखर बाबू।"
बंटी ने मेरी तरफ़ देखा। "शेखर बाबू? वो आपको कुछ नहीं देगा।"
"देगा," मैंने जेब में हाथ डाला। "मेरे पास एक चीज़ है जो वो रात-रात भर नहीं सोने वाली है।"
अस्पताल पहुँचा तो सुबह के नौ बज चुके थे। इमरजेंसी के बाहर मरीज़ों की कतार थी, स्ट्रेचर पर एक बूढ़ी औरत कराह रही थी, और एक नर्स हाथ में फ़ाइल लिए भाग रही थी। मैं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ा। दूसरी मंज़िल पर बायीं तरफ़ पीली दीवार वाला वो कमरा — जहाँ से हवेली की चाबी मिली थी। उसके बगल में एक और कमरा, जिसका दरवाज़ा हमेशा थोड़ा खुला रहता था।
शेखर बाबू मेज़ के पीछे बैठे थे। सामने फ़ाइलों का ढेर था, इतना ऊँचा कि उनका चेहरा आधा छिपा था। चश्मा नाक पर फिसला हुआ था, और वो एक फ़ाइल खोलकर उस पर उँगली फिरा रहे थे, जैसे गिन रहे हों कि कितने पन्ने हैं।
"शेखर बाबू।"
उनका हाथ रुक गया। सिर उठाया, चश्मा ठीक किया, और मुझे देखकर होठों पर एक पतली सी लकीर आई।
"मनोहर। तुम? ये वक़्त? तुम्हारी ड्यूटी तो बारह बजे की है।"
"ड्यूटी के लिए नहीं आया।" मैंने सामने की कुर्सी खींची और बैठ गया। "एक काग़ज़ की कॉपी चाहिए। तहसील के पुराने रिकॉर्ड से।"
शेखर बाबू ने फ़ाइल बंद की। उनकी उँगली उसके किनारे पर रुकी। "तहसील से मेरा क्या रिश्ता? मैं अस्पताल का क्लर्क हूँ, तहसील का नहीं।"
"आप अस्पताल के हो या तहसील के, ये बात अब बहुत लोगों को पता है।" मैंने जेब से वो कोना निकाला — भवानी के टूटे टोकन का पीतल का कोना, धूल में सना, एक तरफ़ टूटी लकीर के निशान के साथ। मैंने उसे मेज़ पर, फ़ाइलों के ढेर के ऊपर, धीरे से रखा।
शेखर बाबू की नज़र उस पर पड़ी। उनका चेहरा नहीं बदला, पर हाथ जो फ़ाइल के किनारे पर था, वो हिल गया। उन्होंने दोबारा चश्मा ठीक किया, और इस बार उँगली काँप रही थी।
"ये… ये कहाँ से?" उनकी आवाज़ पतली हो गई।
"आप जानते हैं कहाँ से।" मैंने कोने को उँगली से घुमाया। "ये उसी का है जिसकी तिजोरी में रामलाल के बाप का काग़ज़ है। और मुझे पता है कि उस काग़ज़ का आपके पास क्या रिश्ता है।"
शेखर बाबू उठ खड़े हुए। कुर्सी पीछे सरककर दीवार से टकराई। उन्होंने दरवाज़े की तरफ़ देखा, फिर बाहर गलियारे में झाँका, और दरवाज़ा बंद कर दिया। लौटकर मेज़ के पास आए, दोनों हाथ उस पर टिकाए, और झुककर मेरी तरफ़ देखा।
"सुन मनोहर," उनकी आवाज़ में अब वो चापलूसी नहीं थी, सिर्फ़ घबराहट थी। "तू जो समझ रहा है, वो आधा सच है। मैंने वो काग़ज़ नहीं बदला। मैंने सिर्फ़ उसमें जो लिखा था, उसे आगे बढ़ाया। मेरा दस्तख़त नीचे है, ये सच है, पर मैंने अपनी मर्ज़ी से नहीं किया।"
"किसकी मर्ज़ी से किया?"
"तू जानता है किसकी।" उन्होंने मेज़ पर कोना उठाया और उसे हथेली पर रखा, जैसे वज़न नाप रहे हों। "ये कोना मेरी गर्दन का फंदा है। अगर भवानी को पता चला कि ये तेरे पास है और तूने मुझे दिखाया…" उन्होंने कोना वापस मेज़ पर रख दिया और आँखें बंद कर लीं। "मेरी बेटी है। तेरह साल पहले उसकी शादी टूटी थी, और आज तक वो अपनी मौसी के घर में पड़ी है। भवानी ने उसी दिन कहा था — शेखर, तेरी बेटी की शादी का ख़र्च मेरे ऊपर। उसने ख़र्च दिया भी, और फिर जो काग़ज़ उसके हाथ लगे, उसमें मेरी बेटी का नाम आ गया। उसने रिश्ता तुड़वा दिया। मेरी बेटी आज तक पूछती है — बाबू, मेरा कसूर क्या था?"
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