The Token System183 / 1154

The Token System – Chapter 183

7 min read November 6, 2026

सुमन ने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया। "इसे यहाँ मत खोल।"

"क्यों?"

"क्योंकि भवानी के आदमी इस गली में घूम रहे हैं। अगर इसमें कुछ है जो उनके काम का है, तो दुकान जल जाएगी।"

बंसी ने दुकान का शटर गिराया। "अंदर आ। पीछे की कोठरी में खोल।"

हम पीछे गए। सुमन ने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक पुराना पन्ना था, मुड़ा हुआ, और साथ में एक छोटी पर्ची।

पर्ची पहले पढ़ी — "मनोहर, ये पन्ना सुनीता ने तीन महीने पहले किसी की जेब से निकालकर छिपाया था। ये बही का वो पन्ना है जो बाबा ने निकलवाया था। और बाबा सेठ गोवर्धनदास का बेटा है — सोमनाथ नहीं, दूसरा। जो कभी काग़ज़ों पर मरा नहीं। जो हवेली की छत के बक्से में रहता था।"

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "सोमनाथ का भाई?"

सुमन ने पन्ना खोला। उस पर बही की लिखाई थी, हिसाब के खाने, नाम, तारीख़ें। आख़िरी लाइन पर लिखा था — "चौथा हिस्सा मेरा नहीं है। चौथा हिस्सा उस आदमी का है जिसने हवेली को बचाया।"

बंसी ने देखा और पीछे हट गया। "ये लिखाई मैं जानता हूँ।"

"किसकी है?"

"सेठ गोवर्धनदास की। बिल्कुल उनकी। मैंने तहसील में उनके काग़ज़ देखे थे।"

सुमन ने पन्ना मेज़ पर रखा। "तो चौथा हिस्सा किसी और का है। और वो किसी का नहीं, उसका है जिसने हवेली बचाई — यानी तेरा, मन्नू। या तेरे दादा का।"

"रुको," मैंने कहा। "पहले ये समझो — सुनीता ने लिखा है कि बाबा सेठ का दूसरा बेटा है। मतलब सोमनाथ का भाई। ज़िंदा।"

बंसी ने अपना सिर पकड़ लिया। "ये तो और बड़ी बात हो गई।"

मैंने पर्ची उठाई। "और उसने सुनीता से बही का पन्ना निकलवाया था — मतलब वो जानता है कि असली हिसाब किसके पास है।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, अगर चौथा हिस्सा तेरे दादा का है, तो तेरे पास हवेली पर हक़ है।"

"मुझे हक़ नहीं चाहिए। मुझे हिसाब चाहिए।"

दरवाज़े पर दस्तक हुई। बंसी गया। लौटा तो उसके हाथ में एक और पर्ची थी, मुड़ी हुई, कोना-चिह्न के साथ।

"कौन लाया?"

"कोई लड़का। भाग गया।"

मैंने पर्ची खोली। उस पर लिखा था — "दोपहर दो बजे, तहसील के पीछे वाला क्वार्टर। रामदीन। अकेले। बही लेकर आना। वरना बही का असली पन्ना कभी नहीं मिलेगा।"

बंसी ने पर्ची पढ़ी। "अकेले मत जा।"

"पिछली बार भी यही कहा था।"

"और पिछली बार तू बच गया क्योंकि मैं पीछे था।"

मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था। उस पर नई लकीर के नीचे एक और पतली लकीर उभर रही थी — धुँधली, जैसे अभी बन रही हो।

"क्या हुआ?" सुमन ने पूछा।

"लकीर। नई।"

सब झुककर देखने लगे।

"ये तो अभी नहीं थी," बंसी ने कहा।

"अभी आई है।" मैंने टोकन उलटा किया। पीछे भी एक लकीर थी — बहुत पुरानी, घिसी हुई।

रीना ने कहा, "मन्नू, अगर हर सुबह दादा एक लकीर खींचते थे, तो ये लकीरें क्या गिनती हैं?"

"पता नहीं। पर शायद हर लकीर एक दिन है। और नीचे वाली लकीरें पुरानी हैं, ऊपर वाली नई।"

सुमन ने टोकन हाथ में लिया। "अब मैं चलूँगी। अस्पताल में एक बच्चा है जिसे आज देखना है। डेढ़ बजे तक लौट आऊँगी।"

"तुम दोपहर में तहसील वाले क्वार्टर पर मत आना।"

"मैं नहीं आऊँगी। पर तू एक काम कर — रामदीन से मिलने से पहले राजेंद्र को बता देना। वो तहसील का पुराना आदमी है, रामदीन को जानता होगा।"

"राजेंद्र आठ बजे ड्यूटी पर आएगा। मैं उससे पहले ही निकल जाऊँगा।"

"तो फ़ोन कर दे।"

"उसके पास फ़ोन है क्या?"

सुमन हँसी। "पुलिस के पास नहीं होगा तो किसके पास होगा?"

मैंने सिर हिलाया। "ठीक है। दस बजे थाने जाऊँगा, अफ़सर के दस्तख़त करवाऊँगा, और राजेंद्र से मिलकर दो बजे से पहले निकलूँगा।"

सुमन चली गई। रीना ने गिलास उठाए और पीछे रसोई में रखने लगी। बंसी दुकान का शटर आधा उठाकर बाहर झाँका।

तभी मेरे कान में आवाज़ आई — वही दबी हुई, जैसे किसी ने दूर से पुकारा हो। "रिपोर्ट में एक नाम छूट गया।"

मैं रुका। "कौन सा नाम?"

टोकन चुप रहा।

मैंने उसे जेब में रखा और बंसी की तरफ़ देखा। वो अभी भी बाहर झाँक रहा था।

"बंसी, तहसील के पीछे वाले क्वार्टर में रामदीन अकेला रहता है?"

"हाँ। तीस साल से। उसका कोई नहीं।"

"तो उसने पर्ची क्यों भेजी? वो तो खुद भवानी के डर से काँप रहा था।"

बंसी ने शटर गिराया। "शायद वो अब डरा नहीं है।"

"या शायद उसे भी कोई डरा रहा है — और वो हमें फँसाने के लिए बुला रहा है।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "तो जाना क्यों?"

"क्योंकि बही का असली पन्ना उसी के पास है। और अगर आज वो नहीं मिला, तो सुबह दीवार खुलेगी और हमारे पास सिर्फ़ आधा सच होगा।"

मैंने जेब से टोकन निकाला और एक बार फिर देखा। नई लकीर के नीचे वाली पतली लकीर अब साफ़ हो गई थी। दो लकीरें। दो दिन। और उनके नीचे वो पुरानी, घिसी लकीरें — गिनती में कितनी, गिनना मुश्किल था।

"दस बजे थाना," मैंने कहा। "दो बजे तहसील। और छह बजे — हवेली।"

बंसी ने अपना सिर हिलाया। "आज के तीन पड़ाव हैं, भाई। ध्यान से चलना।"

मैं दुकान से निकला। बाहर धूप तेज़ हो रही थी। गली के मोड़ पर मुड़ा तो पीछे से बंसी की आवाज़ आई — "मन्नू!"

मैं रुका।

"अगर रामदीन के क्वार्टर में कुछ गड़बड़ दिखे, तो अंदर मत जाना। बाहर से आवाज़ देना।"

"क्या सोच रहा है?"

"कुछ नहीं। बस — तू अकेला है।"

मैं हँसा। "अकेला हूँ तो क्या हुआ? टोकन तो साथ है।"

बंसी नहीं हँसा। "टोकन से बात करना बंद कर, भाई। वो साथ है, पर वो तेरी जगह नहीं लड़ेगा।"

मैं चल पड़ा।

रास्ते में मैंने टोकन जेब से निकाला और उसे हथेली पर रखकर देखा। दो नाम। दो लकीरें। और नीचे वो पुरानी, घिसी हुई लकीरें।

तभी एक लकीर अपने आप उभरी — बहुत पतली, जैसे किसी ने सुई से खींची हो। और जेब में टोकन ठंडा हो गया।

मैं रुका। मैंने उसे पलटा। लकीर वहीं थी, और उसके नीचे एक और लकीर बन रही थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई गिनती शुरू कर रहा हो।

और कान में आवाज़ आई, बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाहट — "अब तेरा हिसाब शुरू।"

॥

थाने के बाहर बेंच पर तीन आदमी बैठे थे। एक के हाथ में काग़ज़ था जो हवा से उड़ने को मचल रहा था, दूसरा अपने पैर की उँगली से ज़मीन खुरच रहा था, और तीसरा — जो सबसे बूढ़ा था — रो रहा था। ऐसे रो रहा था जैसे रोना उसकी आदत न हो, इसलिए आँसू आ भी रहे थे तो पूरे नहीं आ रहे थे। जैसे पुराने नल से पानी टपकता है।

मैंने उसे देखकर पहले अपना काम सोचा। दस बजे की बात थी, अभी सवा नौ ही थे। अंदर काउंटर पर एक हवलदार मुँह छिपाए बैठा था और चाय की ट्रे उसके आगे रखी थी, जिसमें से धुआँ नहीं उठ रहा था। चाय ठंडी थी, या हवलदार ही ठंडा था।

मैंने पूछा, "बाबू कब तक आएँगे?"

हवलदार ने चाय से नज़र उठाए बिना कहा, "कौन बाबू?"

"रिपोर्ट लिखने वाला।"

"आज नहीं आएगा।"

"क्यों?"

"जाने क्यों। हमें क्या, हम तो पहरा देते हैं।"

बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं और सूजी हुईं। उसने मेरी शर्ट देखी, मेरी जेब देखी, और फिर मेरे हाथ में लिपटी रिपोर्ट की कॉपी देखी। कुछ नहीं बोला, पर उसकी नज़र में वो बात थी जो हर थके आदमी की आँख में होती है — कि कोई हो जिसे फ़र्क़ पड़े।

मैं उसके पास बैठ गया। "क्या हुआ, काका?"

वो बोला तो आवाज़ फटी हुई थी। "मेरी ज़मीन।"

"कितनी?"

"दो बीघा। जोतते-जोतते जोड़ी। मेरी नहीं थी — मेरे बाप की थी, पर मैंने उस पर बैठकर उसे अपनी बना लिया था।"

"अब?"

"अब किसी और के नाम लिखी जा रही है। कारिंदा आया था कल, काग़ज़ दिखाया, कहा चार दिन में खाली कर देना।"

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