The Token System182 / 1154

The Token System – Chapter 182

7 min read November 6, 2026

बंसी ने शटर उठाया तो बाहर की रोशनी आँखों में चुभी। सुबह के छह बजे का सूरज सामने वाली छत पर चढ़ रहा था और दुकान के अंदर चाय के चार गिलास ठंडे पड़े थे — किसी ने हाथ तक नहीं लगाया।

मैंने पीतल का डिब्बा खोला और टोकन निकालकर बीच में रख दिया। दो नाम सामने थे, और हरि सिंह के नीचे वो नई लकीर। बंसी झुककर देखने लगा।

रीना ने गिलास उठाया, आधा पानी फेंका और नया चाय डालते हुए बोली, "अब सीधा बता, मन्नू। छह बजे दीवार खोलनी है कि नहीं? और जो काग़ज़ निकलेगा, उसे पढ़ेगा कौन?"

"मैं।"

"बस तू? और अगर काग़ज़ में तेरा नाम भी आया तो?"

मैंने टोकन की तरफ़ देखा। "तो वो भी पढ़ूँगा। जिस दिन अपना हिसाब नहीं पढ़ पाऊँगा, उस दिन भवानी का हिसाब पढ़ने का हक़ नहीं रहेगा।"

सुमन ने अपनी चाय उठाई और एक घूँट में आधी कर दी। "मेरी आज छुट्टी है। मैं चलूँगी।"

"अस्पताल में छुट्टी रखी है तो घर जाओ, दीदी।"

"घर में इतनी जल्दी क्या है? मेरे पास किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा।"

बंसी हँसा। "बात तो सही है।"

तभी टोकन ठंडा हो गया। मेरी उँगली नीचे चिपक गई। और कान में आवाज़ आई, छोटी और दबी हुई — "पुलिस थाना। एक रिपोर्ट। दो दिन।"

मैंने टोकन हथेली पर पलटा। लकीर वहीं थी, न नई, न मिटी।

"क्या बोला?" बंसी ने पूछा।

"थाने जाना है। रिपोर्ट दर्ज करनी है। दो दिन में।"

"कौन सी रिपोर्ट?"

"वो तो टोकन बताएगा जब वक़्त आएगा। अभी सिर्फ़ इतना कहा है।"

सुमन ने गिलास मेज़ पर रखा। "अकेले मत जा। थाने में भवानी के दो आदमी हमेशा बैठे रहते हैं — एक तहसील का रिश्तेदार है, एक को जानता हूँ।"

"मैं अकेले जाऊँगा।"

"मन्नू —"

"सुमन दीदी, रिपोर्ट मेरे नाम की दर्ज होगी। अगर मेरे साथ कोई दिखा, तो भवानी का आदमी उसी को घेर लेगा, और मेरी रिपोर्ट को मेरी बहन के नाम से जोड़ देगा। मुझे ये नहीं चाहिए।"

रीना ने चाय मेरी तरफ़ सरका दी। "ठीक है। पर एक बात — थाने से लौटकर सीधा दुकान पर आना। घर नहीं, पहले दुकान।"

"क्यों?"

"क्योंकि माँ सुबह से छत पर बैठी हैं और वो वहाँ से हवेली की तरफ़ देख रही हैं। उन्हें लगता है तू अकेला गया तो कुछ हो जाएगा।"

मैंने गिलास ख़त्म किया। "माँ को बता देना, थाना दस मिनट का रास्ता है।"

बाहर निकला तो गली खाली थी। सफ़ेद जीप कल रात से नहीं लौटी थी। बंसी दरवाज़े तक आया और धीरे से बोला, "थाने में राजेंद्र मिलेगा क्या?"

"उसकी शिफ़्ट सुबह आठ बजे शुरू होती है। मैं साढ़े सात तक पहुँच जाऊँगा।"

"तो सुन — थाने के बाहर एक पान की दुकान है। वहाँ जो लड़का बैठता है, वो मेरा भांजा है। रिपोर्ट लिखवाते वक़्त तू मेज़ पर मेरा नाम मत लेना, बस इतना कहना कि बंसी की दुकान का आदमी आया है। वो समझ जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "बंसी, तेरे भांजे की जान खतरे में पड़ जाएगी।"

"मेरे भांजे की जान पहले से खतरे में है। वो थाने के सामने बैठता है, भाई। वहाँ से रोज़ भवानी के आदमी गुज़रते हैं।"

मैं चल पड़ा।

थाने का गेट खुला था। अंदर बरामदे में दो तख़्त थे और एक पुरानी मेज़ थी जिस पर लोहे की जाली लगी थी। मैंने अंदर झाँका। एक सिपाही बैठा था, युवा, मूँछें अभी पूरी नहीं आई थीं। उसने सिर उठाया।

"किस काम से?"

"रिपोर्ट दर्ज करनी है।"

"किस बारे में?"

मैं कुर्सी पर बैठ गया। "अपने ख़िलाफ़।"

सिपाही ने कलम रख दी। "क्या कहा?"

"मेरे पास एक चीज़ है जो मेरी नहीं है। उस पर दो नाम खुदे हैं जो मेरे परिवार के नहीं हैं। मैं उसे दो दिन से इस्तेमाल कर रहा हूँ। और मैं उसे उस जगह लौटाने जा रहा हूँ जहाँ से वो निकली थी। पर उससे पहले मैं चाहता हूँ कि काग़ज़ पर लिखा जाए कि ये चीज़ मेरे पास थी और मैंने इसे किसी को नहीं दिखाया, न बेचा।"

सिपाही ने मुझे देर तक देखा। फिर उसने पास रखी पीली फ़ाइल खोली और उसमें पन्ना निकाला।

"तुम्हारा नाम?"

"मनोहर। अस्पताल में एक्स-रे टेक्नीशियन। रामगंज।"

उसने लिखना शुरू किया, फिर रुक गया। "चीज़ कौन सी है?"

मैंने जेब से टोकन निकाला और मेज़ पर रख दिया।

सिपाही ने हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया। "ये पीतल का है। सिक्का है?"

"पता नहीं क्या है। सिक्का दिखता है। पर सिक्का नहीं है।"

उसने टोकन उठाया, पलटा, देखा। "इस पर नाम खुदे हैं।"

"हाँ।"

"ये नाम किसके हैं?"

"हरि सिंह और कन्हैया माली। एक मेरा दादा है। दूसरा —"

मैं रुक गया।

"दूसरा कौन?"

"दूसरा वो आदमी है जिसका नाम आज भी हवेली के काग़ज़ों पर है।"

सिपाही ने टोकन मेज़ पर रख दिया और पीछे झुक गया। "तुम ठाकुर भवानी सिंह की बात कर रहे हो?"

"मैं किसी की बात नहीं कर रहा। मैं रिपोर्ट दर्ज करवा रहा हूँ।"

उसने कलम उठाई और पन्ने पर लिखने लगा। मैंने देखा — उसकी लिखाई धीमी थी, जैसे हर शब्द तोलकर लिख रहा हो। बीच में उसने सिर उठाया।

"तुम्हें पता है, इस थाने में भवानी सिंह का नाम लिखने से पहले लोग दस बार सोचते हैं?"

"मुझे पता है। इसलिए मैं अपने नाम से लिखवा रहा हूँ, उनके नाम से नहीं।"

वो हँसा। पहली बार। फिर उसने काग़ज़ पूरा किया और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "दस्तख़त करो।"

मैंने पढ़ा। चार लाइनें थीं — मेरा नाम, टोकन का हाल, ये कि ये मेरे पास था, ये कि मैं इसे लौटाने जा रहा हूँ। भवानी का नाम नहीं था। कन्हैया माली का नाम था।

मैंने दस्तख़त किए।

सिपाही ने काग़ज़ मोड़ा और एक और पन्ने पर कॉपी करने लगा। "एक तुम्हारे लिए, एक हमारे यहाँ।"

"इसकी कॉपी भवानी के आदमी देखेंगे तो?"

"तो देखेंगे। थाने का रजिस्टर सबका है।" उसने कॉपी की और मुझे दी। "अब सुनो। मैंने इसे दर्ज कर लिया है, पर फ़ाइल में ये सिर्फ़ तब जाएगा जब कोई अफ़सर दस्तख़त करे। अफ़सर अभी नहीं आया।"

"कब आएगा?"

"दस बजे।"

"तो मैं दस बजे आ जाऊँगा।"

"तुम आ जाओ। पर एक बात — दस बजे तक भवानी सिंह के वकील यहाँ पहुँच जाते हैं। रोज़। चाय पीने।"

मैं उठा। "मैं दस बजे आऊँगा।"

बाहर निकला तो पान की दुकान पर बैठा लड़का मुझे देखकर मुस्कुराया। मैंने सिर हिलाया, वो समझ गया। गली के मोड़ पर मुड़ा तो एक ऑटो रुका। उसमें से उतरकर एक औरत आई — काला थैला, भारी शरीर, पैंतालीस-पचास के बीच। वो वही औरत थी जो कल अस्पताल के पिछले फाटक से भागी थी।

"मनोहर जी?"

मैं रुका।

"मैं कमलेश हूँ। सुनीता की बहन।"

"आप कल अस्पताल में थीं?"

"हाँ। मैं आपको ही ढूँढ रही थी। सुनीता ने कहा था — मनोहर से मिलना, उसके सामने खोलना।"

उसने थैले से एक लिफ़ाफ़ा निकाला, सीलबंद। मैंने लिया। ऊपर मेरा नाम लिखा था, स्याही में, किसी औरत के हाथ से।

"इसमें क्या है?"

"मुझे नहीं पता। सुनीता ने दिया था। बोली थी — सुबह छह बजे से पहले नहीं देना।"

"सुनीता कहाँ है?"

कमलेश ने चारों तरफ़ देखा। "एक कमरे में। कहाँ, ये वो खुद बताएगी। पर वो अभी किसी से मिल नहीं सकती। डरती है।"

"किससे?"

"बाबा से।"

मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। "आप कहाँ रुकी हैं?"

"बसवा के बस स्टैंड के पीछे। मेरी बहन वहीं छिपी है। पर ज़्यादा दिन नहीं रुक सकती। भवानी के आदमी बसवा भी पहुँच गए हैं।"

"कमलेश जी, आप वापस जाइए और सुनीता से कहिए — आज दोपहर तक मैं उससे मिलने आऊँगा।"

वो चली गई।

मैं दुकान की तरफ़ लौटा। रास्ते में लिफ़ाफ़ा जेब में रखा था, और उसका कोना मेरी जाँघ से टकरा रहा था, जैसे बंद लिफ़ाफ़े भी बोलते हों।

दुकान पहुँचा तो बंसी दरवाज़े पर खड़ा था। "क्या हुआ?"

"रिपोर्ट दर्ज हो गई। अफ़सर के दस्तख़त बाकी हैं।" मैंने लिफ़ाफ़ा निकाला। "और ये सुनीता ने भेजा है।"

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