The Token System – Chapter 181
"तेरी माँ कल शाम से होम से निकल चुकी है," भवानी ने कहा। "बद्री को मैंने खुद भेजा था, तेरे घर से। तू बाहर बैठा था, तुझे पता नहीं चला।"
सूरज उठ खड़ा हुआ। "झूठ!"
"तेरे घर के पिछले कमरे में है," भवानी ने कहा। "फ़ोन कर, बंसी की दुकान का फ़ोन तेरे घर वाले को याद है।"
सूरज ने फ़ोन माँगा। बंसी ने अपना मोबाइल दिया। सूरज ने नंबर मिलाया। दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई — पुरानी, थकी। सूरज की आँखें भर आईं। "माँ। हाँ मैं। तू घर में है? कब आई?" उसने मुँह फेर लिया और दीवार की तरफ़ देखकर बोलता रहा।
माँ ने उसकी पीठ पर हाथ रखा। सुमन ने दुकान के दरवाज़े का पर्दा खींच दिया।
"क्यों किया?" मैंने भवानी से पूछा।
"क्योंकि तेरा सूरज बयान देने वाला था," भवानी ने कहा। "और मैं चाहता था कि वो बयान दे — अपनी मर्ज़ी से। जबरदस्ती से नहीं। अगर मैं उसकी माँ को बंद रखता, तो वो बयान देता और मुझे लगता कि ये मेरा जीत है। अब वो बयान देगा, तो मुझे लगेगा कि ये उसका हिसाब है। दोनों में फ़र्क़ है।"
"आप कहानियाँ बड़ी अच्छी सुनाते हो," मैंने कहा।
"ये कहानी नहीं है," भवानी ने कहा। "अब डिब्बा खुला है, टोकन निकाला है, काग़ज़ का रास्ता साफ़ है। मेरे सवाल का जवाब दे। कल सुबह जब दीवार खुलेगी, तू उसे खोलेगा या मुझे?"
मैंने अपनी जेब की तरफ़ हाथ किया — वहाँ टोकन था, उससे ऊपर काग़ज़, चिट्ठी, फोटो। वो सब जो पापा ने छोड़ा था। पापा ने दीवार में काग़ज़ छिपाया था — किसी को बचाने के लिए? या कोई और वजह थी?
"भवानी जी," मैंने कहा, "आपने मुझे टोकन पर दादा का नाम दिखाया, मुझे डगमगाया, मुझे कहा कि पापा ने क्यों छिपाया। पर आपने एक बात नहीं बताई।"
"क्या?"
"इस टोकन पर मेरे दादा का नाम है, तो आपके पापा का नाम क्यों है? ये टोकन तो हवेली का हिसाब है — तो इसमें माली के नाम से क्या मतलब? कोई ठाकुर का नाम होना चाहिए। कोई मालिक का। पर आपने अपने पापा का नाम क्यों खुदवाया?"
भवानी का मुँह खुला रह गया। कुछ पल वो ऐसे बैठा जैसे साँस भूल गया हो।
"क्योंकि…" वो रुका।
"क्योंकि ये टोकन हवेली का नहीं है," मैंने कहा। "ये उन दोनों का है जो गवाही देने आए थे। और उन्हें सज़ा दी गई। ये हिसाब का टोकन नहीं — ये सज़ा का टोकन है।" मैंने टोकन भवानी के सामने रख दिया। "और अगर पापा ने उस काग़ज़ को छिपाया, तो इसलिए कि उसमें यही लिखा था — कि टोकन का नंबर जिसका, हिसाब उसका नहीं।"
भवानी ने टोकन उठाया। उसके हाथ धीरे-धीरे खुल रहे थे, जैसे ठंड लग रही हो। उसने अपने पापा का नाम उँगली से छुआ। कुछ बोला नहीं। सिर्फ़ देखता रहा।
फिर उसने टोकन मेरी तरफ़ सरका दिया। और खड़ा हो गया।
"दीवार सुबह खुलेगी," उसने कहा। "तू खोलेगा। मैं देखूँगा। और तेरा अगर मेरे से कोई हिसाब बाकी रह गया हो — वो उस काग़ज़ से पहले ले लेना। बाद में मुझे कोई हिसाब नहीं सुनना।"
"आप मेरा हिसाब सुनने से डर रहे हो?"
भवानी दरवाज़े की तरफ़ चला। वो रुका, पर पलटा नहीं।
"मैं अपने हिसाब से डर रहा हूँ," उसने कहा। "तेरे से नहीं।"
वो बाहर निकला। जीप की धूल दुबारा उड़ी। बंसी ने पर्दा हटाया और दुकान के बाहर झाँका — गली खाली थी, सिर्फ़ धूल थी जो बैठ रही थी।
सूरज ने मोबाइल बंद करके हमारी तरफ़ देखा। "माँ घर में है," उसने कहा। "कल सुबह अस्पताल, फिर अदालत।"
"पहले दीवार," मैंने कहा।
सब मेरी तरफ़ देखने लगे।
"ठाकुर साहब ने खुद कहा — दीवार सुबह खुलेगी," मैंने कहा। "पर सुबह नौ बजे अदालत है। हम सुबह छह बजे खोलेंगे।" मैंने माँ की तरफ़ देखा। "माँ, पापा की चिट्ठी में ये भी लिखा है कि तू जानती है दीवार कहाँ है। तू आएगी?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। सुमन ने उसका हाथ थामा। वो बोली नहीं — सिर्फ़ सिर हिलाया।
"और रीना," मैंने कहा, "मुझे अपने साथ रखना, पीछे मत छोड़ना। तेरे पापा का हिसाब भी उसी काग़ज़ में है।"
रीना ने आँखें भर लीं, पर मुस्कुराई। "मैं पीछे नहीं रहूँगी," उसने कहा। "जिस दिन मन्नू की दीवार खुलेगी, उस दिन मैं सामने रहूँगी।"
बंसी ने अपना गिलास उठाया और सबके गिलास की तरफ़ इशारा किया। "सब चाय ठंडी हो गई," उसने कहा। "पर एक बार फिर बना लेता हूँ। अब थोड़ी जल्दी में है चाय वाला।"
सब हँसे। पहली बार सुबह से हँसी निकली। सुमन ने दुकान के बाहर से चाय का डिब्बा उठाया। राजेंद्र ने दरवाज़े की जाली खींच दी।
मैंने जेब से पीतल का टोकन निकाला और उसे एक बार फिर देखा। दो नाम। हरि सिंह। कन्हैया माली। दो आदमी जिन्होंने शायद एक ही दिन में हवेली के ख़िलाफ़ गवाही दी होगी। मेरे दादा और ठाकुर के पापा — एक ही टोकन पर, एक ही सज़ा पर। और पापा ने यही काग़ज़ छिपाया था — इसलिए नहीं कि उसमें भवानी का नाम था, बल्कि इसलिए कि उसमें ये भी लिखा था कि भवानी का पापा भी कभी उनके साथ खड़ा था।
तभी मेरे हाथ में टोकन और ठंडा हुआ — पिछली रात जैसे रसोई की खिड़की के नीचे। मैंने उसे हथेली पर पलटा। एक नाम — हरि सिंह — के नीचे एक लकीर थी जो पहले नहीं थी। जैसे अभी किसी अँगुली ने खींची हो। मैंने उसे रगड़ा। लकीर मिटी नहीं।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी नज़र टोकन पर पड़ी। "मन्नू," उन्होंने धीरे से कहा, "वो लकीर तेरे दादा की है। वो इसी टोकन पर हर सुबह एक लकीर खींचते थे — अपने हिसाब की याद के लिए।"
"माँ, ये तो अभी निकली है, कल इस पर सिर्फ़ नाम थे।"
माँ ने टोकन उँगलियों में लिया और देर तक देखती रही। फिर उन्होंने टोकन मेरे हाथ पर रख दिया।
"तेरे पापा ने भी यही कहा था," उन्होंने कहा। "उस दिन, जब उन्होंने दीवार खोदी थी। बोले थे — ये टोकन उसी आदमी के हाथ आएगा जो अपना हिसाब पूरा करेगा, और अपना हिसाब पूरा करने वाला हर सुबह एक लकीर देखेगा — जो उसके दादा ने उसके लिए छोड़ी होगी।"
बंसी ने चाय का गिलास मेरी तरफ़ सरका दिया। "अब बता, भाई," उसने कहा, "कल सुबह दीवार खोलने से पहले इस टोकन पर एक और लकीर आएगी?"
मैंने टोकन जेब में रखा। "आए या न आए," मैंने कहा, "दीवार खुलेगी। और उस काग़ज़ के हर शब्द को सब सुनेंगे — चाहे उसमें कोई भी नाम हो।"
सूरज ने अपना गिलास उठाया। "मैं अदालत में बोलूँगा," उसने कहा, "पर उससे पहले उसी दीवार के सामने खड़ा रहूँगा। माँ के साथ।"
"सब जाएँगे," मैंने कहा।
सुमन ने चाय बाँट दी। बंसी ने दुकान का शटर आधा गिरा दिया — अंदर जितने थे, बाहर किसी को दिखने की ज़रूरत नहीं थी। राजेंद्र ने दरवाज़े के पास कुर्सी रखी और खुद उस पर बैठ गया, जैसे पहरा दे रहा हो।
मैंने अपनी जेब से चिट्ठी निकाली, फिर टोकन, फिर फोटो — पापा, सोमनाथ, बंसी, सूरज की माँ। चार लोग एक साथ, हवेली के सामने। पीछे दीवार पर एक तरफ़ ईंट का निशान था, और उस निशान के नीचे एक छोटा-सा लिखा हुआ था — जो पुराना था, फीका। मैंने उँगली से उसे साफ़ किया।
वहाँ लिखा था: "हिसाब उसका, जो हिस्सा न खाए।"
मैंने फोटो सबको दिखाई। सुमन ने उसे हाथ में लिया, फिर माँ को दिया।
बंसी ने बाहर गली की तरफ़ देखा — सफ़ेद जीप का नामोनिशान नहीं था।
"कल छह बजे," मैंने कहा। "हवेली की पिछली दीवार। जो न आए, उसका नाम काग़ज़ में नहीं पढ़ा जाएगा।"
सब चुप हो गए। सिर्फ़ चाय की भाप उठ रही थी, और बंसी का चिमटा स्टोव पर एक बार खटका।
मैंने टोकन जेब से निकालकर एक बार आख़िरी बार देखा। हरि सिंह। कन्है
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