The Token System – Chapter 180
भवानी ने एक पीतल का डिब्बा मेज़ पर रख दिया। मेरे करीब। इतना करीब कि उसकी ठंडक मेरी उँगलियों तक पहुँच गई, जबकि मैंने उसे छुआ नहीं था। सब चुप हो गए। बंसी के हाथ को चाय का गिलास नीचे रखने की जल्दी थी, पर उसने रखा नहीं — बल्कि पकड़े रहा, जैसे सहारा चाहिए।
"आज तू मेरा हिसाब सुन ले," भवानी ने कहा। "फिर मैं तेरा सुनाऊँगा।"
सूरज ने कुर्सी पर हाथ रखकर खुद को सँभाला। "पापा," वो फुसफुसाया।
भवानी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। मेरी ओर ही देखता रहा।
"तू क्या सोचता है, तेरे पापा ने वो काग़ज़ क्यों छिपाया?" उसने कहा। "इसलिए कि वो तेरे लिए बचा रहा था? नहीं। इसलिए कि उसने देख लिया था — उस काग़ज़ में मेरा नाम भी है। और उसका नाम भी। दोनों एक ही जगह, एक ही दीवार, एक ही काग़ज़।"
मैंने पीतल का डिब्बा खोला। टोकन में अंक नहीं थे — सिर्फ़ दो नाम खुदे हुए थे। पहला, हरि सिंह। दूसरा, कन्हैया माली।
मेरे हाथ रुक गए। दो नाम। पर एक नाम वो था जो पापा का था — मेरे दादा का।
भवानी ने देखा कि मैं रुक गया। उसने आवाज़ धीमी की और कहा:
"अब समझा, तेरे पापा ने वो काग़ज़ क्यों छिपाया था?"
मैंने टोकन को उँगलियों के बीच घुमाया। पीतल पुराना था, किनारों पर हरा ज़ंग लगा था, पर खुदाई इतनी गहरी थी कि उँगली रखने पर नाम उभरे महसूस हुए। हरि सिंह। मेरे दादा। जिन्हें मैंने कभी देखा नहीं, सिर्फ़ माँ की एक बात याद थी — कि वो आदमी हँसता बहुत था और मरते वक़्त भी हँसा था।
"दादा का नाम इस टोकन पर क्यों है?" मैंने पूछा। आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी।
भवानी ने कुर्सी खींची और बिना पूछे बैठ गया। पीछे खड़े उसके दोनों आदमी दरवाज़े के बाहर रुक गए, ऐसे जैसे अंदर आने की इजाज़त नहीं थी।
"तेरे दादा और मेरे पापा," भवानी ने कहा, "दोनों इसी हवेली के हिसाब-किताब के बाहर खड़े थे। दादा तेरे — हरि सिंह — बंसी के पापा के साथ मिलकर ईंटें ढोते थे। और मेरे पापा, कन्हैया माली, माली थे। हवेली के बाग़ीचे के। दोनों ने एक ही साल में एक ही आदमी के लिए गवाही दी थी — ठाकुर साहब के ख़िलाफ़।"
बंसी ने गिलास मेज़ पर रखा। इस बार रखा। "मेरे पापा का नाम इसमें क्यों नहीं?"
"क्योंकि तेरे पापा ने गवाही वापस ले ली थी," भवानी ने कहा। "डर गए थे। उन्हें छोड़ दिया गया। और ये दोनों — हरि और कन्हैया — नहीं डरे। सो दोनों का नाम इस टोकन पर खुद गया। हर टोकन पर एक नंबर होता था, पर इन दोनों पर नंबर नहीं — नाम। क्योंकि ये दोनों हिसाब से बाहर के लोग थे। इन्हें हिसाब की भाषा नहीं आती थी। इन्हें सिर्फ़ इंसाफ़ की भाषा आती थी।"
माँ ने धीरे से कहा, "हरि सिंह…" जैसे कोई पुराना नाम ज़ुबान पर पहली बार आया हो।
"हाँ, बहू," भवानी ने माँ की तरफ़ देखा। "तेरे ससुर। और तेरे पति के पापा। जिस काग़ज़ को तेरे पति ने दीवार में छिपाया, उसमें यही टोकन का हिसाब लिखा है। दोनों टोकन — ये और तेरा — दीवार में हैं। और उसी काग़ज़ में ये भी लिखा है कि ये दोनों टोकन आख़िर किसके हाथ लगेंगे।"
"मेरे हाथ?" मैंने कहा।
"अगर तू किसी का हिस्सा न खाए," भवानी ने कहा। "यही तो लिखा है न काग़ज़ पर? और यही तो मैं तुझसे कह रहा हूँ। तेरे पापा ने इसलिए नहीं छिपाया कि वो तुझे बचा रहे थे। उन्होंने इसलिए छिपाया कि उस काग़ज़ में मेरा और उनका नाम एक साथ था — और वो जानते थे कि जिस दिन तू उसे पढ़ेगा, तू मुझसे लड़ने निकलेगा। पर उन्हें ये नहीं पता था कि लड़ाई का रास्ता काग़ज़ से नहीं, हिसाब से निकलता है।"
राजेंद्र, जो अब तक चुप बैठा था, उठकर खड़ा हो गया। "ये सब बातें बड़ी अच्छी हैं, ठाकुर साहब। पर तीन साल पहले मेरे बेटे का पैर टूटा तो आपकी गाड़ी ने उसे अस्पताल नहीं पहुँचाया। आपका हिसाब वहाँ कहाँ था?"
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा, बिना नाराज़गी के। "तेरे बेटे का पैर…" वो रुका। जैसे याद कर रहा हो। "वो मेरे गाड़ी वाले की गलती थी। मुझे उस दिन पता नहीं चला। गाड़ी वाला दस दिन बाद बोला। तब तक…" उसने जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और मेज़ पर रखा। "ये उसका हिसाब है। जो खर्चा तुझे करना पड़ा था, वो लिखा है। उस दिन का ब्याज भी। मैं आज नहीं लाया तो कल ले जाना, पर ये तेरा है।"
राजेंद्र ने काग़ज़ नहीं उठाया। उसने भवानी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"मन्नू," उसने कहा, "तेरा फ़ैसला।"
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पुरानी सफ़ेद जीप वाली ठंडक नहीं थी। कुछ और था। थकान। जैसे बीस साल से कोई बोझ उठाए खड़ा हो।
"आप मुझसे क्या चाहते हैं?" मैंने सीधे पूछा। "आप सुबह छह बजे यहाँ आए हो, दो आदमी साथ लाए हो, डिब्बा रखा है। मुझे धमकाने आए हो तो बोलो साफ़।"
"धमकाने?" भवानी हँसा। हँसी अजीब थी, फटी हुई। "मन्नू, जिस दिन मैं तुझे धमकाना चाहूँ, उस दिन मैं अकेला आऊँगा — तेरा दुकानदार दोस्त गवाह नहीं होगा, तेरी माँ दीवार से नहीं टेकेगी, और ये काग़ज़ तेरे जेब में नहीं होगा। मैं यहाँ लड़ने नहीं आया। मैं यहाँ…" वो रुका।
"किसलिए?"
"क्योंकि मेरे पास बयालीस दिन हैं," भवानी ने कहा। "डॉक्टर ने कहा। दिल। दो साल से बता रहे हैं, मैंने सुना नहीं। अब सुन लिया। और जब आदमी को पता चले कि बयालीस दिन बचे हैं, तो वो अपना हिसाब बंद करना चाहता है। साफ़ हिसाब के साथ मरना चाहता है।"
सुमन ने चाय का गिलास नीचे रखा। इस बार उसकी आवाज़ आई।
"आप मरने की बात इसलिए कर रहे हैं," सुमन ने कहा, "ताकि हम बाकी बात भूल जाएँ?"
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। "नहीं मालिन। मैं इसलिए बोल रहा हूँ कि मेरे बाद ये हवेली का हिसाब किसी को सँभालना है। और वो कोई मेरे खानदान से नहीं सँभाल सकेगा। मेरे बेटे ने आज तक एक ईंट नहीं उठाई। उसे हिसाब की भाषा नहीं आती।"
"तो आप मुझे सँभालने देने आए हो?" मैंने कहा।
"मैं तुझे सँभालने नहीं, तुझे चुनने आया हूँ," भवानी ने कहा। "दो रास्ते हैं। एक — तू मेरे टोकन से लड़ता रह, जैसा तेरे पापा सोचते थे। दूसरा — तू ईंट के पीछे से निकले उस काग़ज़ को खोलता है और देखता है कि उसमें क्या लिखा है। पर काग़ज़ खोलने का एक शर्त है, जो तेरे पापा ने खुद लिखी है।"
"क्या शर्त?"
"उसे खोलने के बाद तू उस चीज़ का हक़दार नहीं रहेगा जो उसमें लिखा है। और तेरे पापा जानते थे — जो आदमी हक़ छोड़कर काग़ज़ खोलता है, वो ही उसे सही पढ़ सकता है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "भाई, चारा…" वो बोला और रुक गया। इस बार हँसी नहीं निकली।
मैंने डिब्बे को बंद किया और टोकन जेब में रखा। भवानी के आदमी बाहर हिले।
"ठाकुर साहब," मैंने कहा, "अभी आपने मुझे एक झटके में दो चीज़ें दीं — डर और हिसाब। मैं एक चीज़ माँगता हूँ।"
"माँग।"
"सुबह नौ बजे अदालत में सूरज बयान देगा। उसकी माँ यहाँ से निकलनी चाहिए। आप होम में बंद रखते हैं, वही जवाब देते हैं। आज सूरज जो कहेगा, आप उसके सामने कुछ और नहीं कहेंगे। कोई वकील झूठा, कोई गवाह झूठा, कोई धमकी नहीं। बोलिए।"
भवानी ने सूरज की तरफ़ देखा। सूरज के हाथ कुर्सी पर थे, और वो ऐसे बैठा था जैसे मार खाने से पहले आदमी बैठता है।
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