The Token System179 / 1154

The Token System – Chapter 179

7 min read November 6, 2026

मैं बैठ गया, घड़ी उठाई, और उसकी सुइयों को देखता रहा — क्योंकि सुबह के काम की शुरुआत से पहले मुझे एक बात तय करनी थी, और वो बात टोकन की नहीं थी। वो बात ये थी कि सुरंग में जाने वाला पहला आदमी अगर भवानी का आदमी निकला, तो उसे रोकने वाला मैं अकेला रहूँगा।

और जब ये बात मैंने खुद से कही, तो जेब में टोकन ने कोई जवाब नहीं दिया। शायद इसीलिए कि सवाल का जवाब वो कभी नहीं देता।

॥

रात के तीन बजे मैंने सूरज को उठाया। वो पिछली कोठरी में चारपाई पर पड़ा था, आँखें खुली थीं — वो भी नहीं सोया था।

"चल," मैंने कहा। "लिफ़ाफ़ा लेने।"

उसने चादर सरका दी और जूते पहनने लगा। "अभी? इतनी रात?"

"अभी। भवानी को पता है कि तेरे पास कुछ है। जितनी देर करेंगे, उतना वो पहले पहुँचेगा।"

हम निकले। गली में कुत्ते भी नहीं भौंके। साइकिल पर दोनों बैठे — सूरज पीछे, और सामने की टोकरी में माँ का दिया हुआ वो पुराना काला कपड़ा। राह में पुलिस चौकी आई तो मैंने गति धीमी रखी। चौकी पर एक सिपाही बैठा था, सिर नीचे, सोया हुआ। हम निकल गए।

खेत्री का रास्ता कोयले की तरह काला था। नीम का पेड़ जब सामने आया तो सूरज ने हाथ से इशारा किया — छोड़ दो यहीं। हम उतरे। उसका मकान पेड़ के पीछे था, दो कमरे का पक्का, पर छत भी आधी गिरी हुई। दरवाज़े पर ज़ंग लगा ताला, जिसकी चाबी सूरज ने अपनी जेब से निकाली।

"अब भी रखी है तेरे पास?" मैंने पूछा।

"इसी चाबी के डर से तो मैं ज़िंदा रहा," उसने कहा। "पापा सोचते रहे कि ऐसी चाबी खो गई।"

अंदर घुसे। एक कमरे में चारपाई, दूसरे में रसोई की तरह। दीवार सादी थी, पर सूरज एक ईंट के सामने रुक कर खड़ा हो गया। मुझे लगा वो गिन रहा है — नीचे से ऊपर, ईंटें गिनकर। फिर उसने उँगलियाँ डालकर एक ईंट हिलाई। वो ईंट सीमेंट की जगह मिट्टी से लगी थी। बाहर आ गई।

अंदर एक गड्ढा था, और उसमें कपड़े में लिपटा एक लिफ़ाफ़ा। पीला, मोटा, ऊपर से धूल और मकड़ी के जाले।

"बीस साल?" मैंने कहा।

"बीस साल," सूरज ने कहा। "मैंने इसे एक ही बार छुआ था, बस छुआ था। पापा सामने खड़े थे। उन्होंने कहा — बस इतना ही। बाकी मत देखना।"

मैंने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा। किनारे से फाड़ा, ध्यान से, ताकि अंदर का काग़ज़ न फटे।

पहले काग़ज़ पर लिखावट देखी। पापा की लिखाई थी — मैं उनकी लिखाई उनकी घड़ी के पीछे खुदे नाम और उस डायरी से पहचान गया था जो माँ ने पिछली रात दी थी। छोटे अक्षर, जल्दी में लिखे, पर साफ़।

"मन्नू।" पत्र शुरू ही मेरे नाम से हुआ था। सूरज ने काग़ज़ पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। मैंने ज़ोर से पढ़ा।

"यह काग़ज़ तक तू तभी पहुँचेगा जब भवानी तुझे खुद बुला चुका होगा या तू उसके सामने खड़ा हो चुका होगा। अगर समय से पहले मिला है तो लौटा देना। बात सुन। हवेली की उस दीवार में सिर्फ़ टोकन नहीं हैं। उसमें उस बाप की बही का असली आख़िरी काग़ज़ भी है जिसने टोकन बनवाए थे। जो उसे खोलेगा, वो यह भी तय करेगा कि हिसाब किसे फायदा देगा। पर उसे खोलने का हक़ सिर्फ़ उसी को है जो किसी का हिस्सा न खाए। अगर तेरे हाथ में यह काग़ज़ आया है तो मेरी आँख बंद करने से पहले मेरी आख़िरी बात मान ले — दीवार के भीतर जो है, वो बाँटने के लिए नहीं है। वो ठीक करने के लिए है।"

"…कन्हैया।" मैंने नीचे पढ़ा। और उसके नीचे एक तारीख़। वो तारीख़ उस हादसे से एक हफ़्ता पहले की थी जिसमें पापा गए थे।

काग़ज़ के साथ एक फोटो थी। ब्लैक एंड व्हाइट, किनारे से टेढ़ी कटी — शायद तस्वीर के बाकी हिस्से में कुछ और था जो जान-बूझकर काट दिया गया था।

फोटो में आदमी चार थे और एक औरत। बीच में पापा — जवान, दुबले, उसी तरह सीधे खड़े जैसे घड़ी में खुदे हुए। उनके बाएँ खड़ा था वो आदमी जिसे मैं अब जान चुका था — सोमनाथ। सफ़ेद कुर्ता, दुबला, आँखें हठी। पापा के दाएँ बंसी था — मोटा नहीं, पर युवा बंसी भी वही हँसता चेहरा। और सबसे दाएँ, एक औरत खड़ी थी, उम्र के हिसाब से चेहरा उतना ही चमकीला जितना खेत्री के पीछे वाले इलाक़े में किसी औरत का नहीं दिखता। मैंने सूरज की ओर देखा।

"तेरी माँ?" मैंने पूछा।

सूरज ने फोटो उठाई, करीब लाई। "लगती है," उसने कहा। "ये वही साड़ी है जो उसने मुझे दिखाई थी।" उसकी आँखें गीली हो गईं — वो रोया नहीं, बस पलकें झपकीं और काग़ज़ की तह को अपनी जगह पर रख दिया।

"कुछ और?" मैंने पूछा।

उसने काग़ज़ उलटा किया। पीछे एक लाइन थी, पापा की लिखाई। "तीसरे हिस्से को मत भूलना। उसका हिस्सा सबसे छोटा, और सबसे बड़ा।"

हम दोनों चुप हो गए। बाहर आकाश की लकीर अब गुलाबी हो रही थी।

रास्ते में लौटते हुए सूरज ने पूछा, "वो तीसरा हिस्सा किसका?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर आज पता चलेगा।"

साढ़े चार बजे बंसी की दुकान पर मैंने सबको बुलाया — बंसी, सुमन, राजेंद्र, सूरज, रीना और माँ।

राजेंड्र सबसे पहले आया, सिपाही वाली वर्दी में नहीं — सादा कुर्ता-पाजामा। बंसी ने चाय के पाँच गिलास लगा दिए और एक साथ बैठ गया। रीना माँ को सहारा देकर लाई, दीवार के पीछे बने बेंच पर बिठाया।

मैंने काग़ज़ जेब से निकालकर मेज़ पर रखा — पापा की चिट्ठी, फोटो, और चौथे खाँचे की पर्ची भी।

"मैंने रात भर सोचा है," मैंने कहा। "अब मैं भवानी के टोकन से नहीं लड़ूँगा। मैं अपना हिसाब पूरा करूँगा और उसे उसके ही हिसाब से बाँध दूँगा। उसका टोकन टूटा, तो टूटा। पर जिस दिन उसकी बही खुलेगी, उसके हिसाब में से हर नाम वापस अपने लोगों तक जाएगा — सुनीता, बद्री, साजन, श्रीराम, काकी, सब। और मेरा टोकन — इसके आठ हज़ार बाकी हैं। वो मैं अपने तरीक़े से चुकाऊँगा।"

"कैसे?" सुमन ने पूछा।

"पापा की चिट्ठी कहती है कि दीवार में जो काग़ज़ है वो ठीक करने के लिए है। तो आज पहले हम उसे खोलेंगे — और जो भी उसमें लिखा है, सबके सामने पढ़ेंगे। कोई हिस्सा छिपाकर नहीं।"

"माने?" बंसी ने कहा।

"माने ये," मैंने कहा, "कि मैं उस चीज़ का मालिक नहीं बनूँगा। जो काग़ज़ हमें मिलेगा, वो उसी के नाम होगा जिसका हक़ है — न मेरे, न भवानी के। और जो मेरे हाथ आया, उसे मैं आज यहीं सबके सामने रख दूँगा।"

राजेंड्र ने पूछा, "उस आदमी को इसका पता चलेगा?"

"चल कर देखते हैं," मैंने कहा।

सुमन ने चाय का गिलास उठाया, "मैं हाँ कहती हूँ।"

बंसी ने मुँह बनाया, "तेरे पास चारा क्या है, भाई? हाँ ही कहूँगा।"

"मैं हाँ," रीना ने कहा।

"हाँ," माँ ने कहा। ज़ोर से नहीं, पर साफ़।

सूरज ने कहा, "पर सुबह नौ बजे अदालत में मैं बयान दूँगा। माँ को निकालना पहले।"

"होगा," राजेंद्र ने कहा। "छह बजे होम के पीछे बगीचे की तरफ़। खाई जाली लगी है, पर सुरंग का रास्ता याद रखना।"

ठीक उसी वक़्त बाहर गली के मोड़ पर सफ़ेद जीप रुकी। धूल खड़ी हुई। पिछले दरवाज़े से कोई उतरा। जब वो दुकान की तरफ़ आया तो बंसी का हाथ चाय के गिलास पर जम गया और सुमन ने अपना गिलास नीचे रखा — बिना आवाज़ किए।

वही था। ठाकुर भवानी सिंह। सादा सफ़ेद कुर्ता, पीछे दो आदमी, पर कोई बंदूक नहीं, कोई लाठी नहीं।

बंसी उठा। "ये तो हमारी नई मीटिंग है, भाई। दुकान पर कुर्सी और भवानी सिंह — दोनों का दुर्लभ दिन।"

भवानी मुस्कुराया — मुस्कुराहट पतली, किसी लाइन की तरह मुँह पर खींची हुई। "मुझे पता था, तू यहीं होगा," उसने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा। "तू सोचता है मैंने तुझे छोड़ दिया है। मैंने तुझे बैठाया है — तेरे ही हिसाब को देखने के लिए।"

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