The Token System – Chapter 178
"कह दिया है," मैंने कहा। "अब मेरी बारी है। राजेंड्र सुबह छह बजे बगीचे के पीछे आएगा। हमें छह से पहले अंदर होना है।"
"अंदर?" माँ ने कहा। "तू होम में घुसेगा?"
"नहीं। टूटे तालाब से। उसके पीछे ज़ंग लगी सलाखें हैं, उनके नीचे जाली तोड़कर सुरंग जैसा रास्ता — रामलाल ने बताया था। रामलाल, जो बारह साल वहाँ चौकीदार था।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सूरज की तरफ़, फिर अपनी गोद में पड़ी घड़ी की तरफ़। "तेरे पापा ने भी एक रात ऐसा ही कहा था। 'एक काम बाकी है।' और फिर कभी नहीं लौटे।"
"मैं लौटूँगा," मैंने कहा। "मुझे एक पर्ची पर हिसाब लिखकर देना है।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उसने बस घड़ी उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "इसे अपने पास रख। अब तेरी है।"
रात का खाना चुपचाप हुआ। सूरज ने दो रोटियाँ खाईं और उठ गया। रीना ने उसके लिए पिछली कोठरी में चारपाई बिछा दी थी, और जाते वक़्त उसने कहा, "तू मेरे भाई के साथ चल रहा है, तो तेरी माँ पर भी मेरा हक़ है। सुबह मैं भी चलूँगी।"
"तू नहीं चलेगी।"
"मैं चलूँगी।" वो रुकी, और उसकी आवाज़ नरम हुई। "भाई, मैं स्कूल में पढ़ाती हूँ। मैं उन लड़कियों को जानती हूँ जिन्हें भवानी वाले उनके घर से ले गए। एक लड़की की माँ आज भी मेरे स्कूल के फाटक पर खड़ी रहती है। मैं तेरे पीछे नहीं रहूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तो ठीक है। पर तू गाड़ी में बैठेगी। पीछे।"
"अपनी शर्तें अपने पास रख।"
रात ग्यारह बजे के करीब मैं आँगन में बैठा था। बंसी की साइकिल की घंटी दरवाज़े पर बजी — घंटी उसने कभी नहीं बदली, छोटी-सी, टेढ़ी आवाज़। पर आज घंटी नहीं थी। दरवाज़े पर कोई खड़ा था, साये में, और उसने दरवाज़े के नीचे से कुछ सरका दिया। मैं उठा, दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। गली के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी का पिछला हिस्सा गायब हुआ — इतनी जल्दी कि अगर मैं उस वक़्त नीचे न देखता, तो कहता कि भ्रम था।
नीचे एक लिफ़ाफ़ा था। सादा, भूरा, बिना नाम का।
मैं उसे लेकर अंदर आया। रीना और सूरज दोनों जाग रहे थे। माँ भी उठ आई थी, और रसोई से आती रोशनी में उसका चेहरा आधा दिख रहा था।
लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर दो चीज़ें थीं — एक काग़ज़ जिस पर रीना की शादी की तारीख़ लिखी थी, वही तारीख़ जो लालाजी के यहाँ तय हुई थी, और एक छोटी पर्ची। पर्ची पर सिर्फ़ एक लाइन थी।
"शादी हो जाएगी। बस लड़का बदल जाएगा।"
रीना ने वो लाइन पढ़ी। उसका हाथ काँपा, पर उसने पर्ची छीनने की कोशिश नहीं की। वो उठी, किताब उठाई, और सीधी अपनी कोठरी में चली गई। दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ नहीं आई। वो खुला ही छोड़ गई — जैसे कह रही हो, मैं डरने नहीं आई, मैं इंतज़ार करने आई हूँ।
सूरज ने पर्ची उठाई, पलटी, दोबारा पढ़ी। "ये उसका आदमी छोड़ गया। वही बूढ़ा जो कल अस्पताल आया था।"
"हाँ।"
"तू डरा हुआ नहीं है।"
"मैं डरा हुआ हूँ," मैंने कहा। "पर डर कर बैठ जाने का वक़्त नहीं है।"
मैंने पर्ची उसके हाथ से ली, और दो हिस्सों में फाड़ दी। फिर चार में। फिर उन्हें मुट्ठी में भींचकर आँगन के कोने में रखे चूल्हे में डाल दिया।
"अब मैं तेरे हिसाब को तेरे ही घर में बंद करूँगा," मैंने कहा, और मुझे लगा कि मैंने ये ज़ोर से बोला, पर माँ की तरफ़ देखा तो वो होंठ हिला रही थी, जैसे दुआ पढ़ रही हो।
तभी जेब में कुछ हुआ।
पहले लगा जैसे ठंड लगी है — एक ठंडी सुई जेब के अंदर से जाँघ तक उतर गई। मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया। उँगलियों के नीचे टोकन था, और वो बर्फ़ की तरह ठंडा था, जबकि बाहर की रात में भी इतनी ठंड नहीं थी।
और फिर उसने कहा। सिर्फ़ चार शब्द, धीरे से, ऐसे जैसे कोई मेरे कान के अंदर खड़ा हो।
"आख़िरी काम शुरू।"
मैंने जेब से हाथ बाहर निकाला। उँगलियों पर कुछ नहीं था। मैंने सूरज की तरफ़ देखा। वो मुझे ही देख रहा था, और उसके चेहरे पर वो डर नहीं था जो पहले था — अब कुछ और था। जैसे उसने भी कुछ सुना हो।
"क्या हुआ?" माँ ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "जेब में चाबी चुभ गई।"
वो झूठ हल्का था और माँ ने उसे पहचाना भी, पर उसने पूछा नहीं। उसने सिर्फ़ उठकर रसोई की तरफ़ चलते हुए कहा, "चाय पी लो सब। सुबह जल्दी उठना है।"
चाय आई। रीना बाहर आई, आँखें लाल, और चुपचाप अपना कप उठा लिया। सूरज ने अपने कप पर दोनों हाथ रखे और देर तक उसे गरम होने दिया।
"सुबह क्या होगा?" उसने पूछा।
"पहले हम रामलाल के पास जाएँगे। वो होम के पीछे वाली गली में रहता है। उसके पास हर कमरे की चाबी है, या कम से कम ये पता है कि कौन सी चाबी कहाँ है। फिर छह बजे से पहले टूटे तालाब वाली सुरंग से अंदर। राजेंड्र बाहर रहेगा, और जैसे ही मैं तेरी माँ को बाहर निकालूँ, वो अंदर आ जाएगा।"
"और भवानी?"
"भवानी को हम सुबह नौ बजे अदालत में मिलेंगे।" मैंने कप नीचे रखा। "पर उससे पहले, आज रात, उसका ये लिफ़ाफ़ा — ये उसका आख़िरी दाँव था, और वो फ़ेल हो गया। अब वो अंधेरे में है। और अंधेरे में जो आदमी दाँव लगाता है, वो ग़लती करता है।"
सूरज ने कप ख़त्म किया। "मेरे पापा ग़लती नहीं करते। वो इंतज़ार करते हैं।"
"तो हम इंतज़ार नहीं करेंगे।"
रात के दो बजे मैं आँगन में लेटा था, और नींद नहीं आ रही थी। ऊपर छत पर बबूल की टहनी हवा में खड़खड़ा रही थी। मैंने जेब टटोली। टोकन अब ठंडा नहीं था। वो सामान्य था — जितना हमेशा रहता था। पर मेरी उँगलियों को अब भी उसका वो ठंडा स्पर्श याद था, जैसे कोई गीली उँगली मेरी हथेली पर फेर गया हो।
मैं उठा। माँ की कोठरी की तरफ़ देखा। रोशनी बंद थी। रीना की कोठरी से आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा — वो बंद था, और उसके नीचे से आँगन की रोशनी आ रही थी।
और उसी रोशनी में, दरवाज़े के नीचे की खाली जगह में, एक परछाईं हिली। किसी के पैर थे। बाहर। फिर हट गए।
मैंने हाथ में घड़ी ली, पापा की घड़ी, और धीरे से दरवाज़े तक गया। सिटकनी खोली। दरवाज़ा खोला।
सामने कोई नहीं था। गली सूनी थी। पर नीम की छाया वाली जगह पर, जहाँ सुबह मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया था, अब एक और चीज़ पड़ी थी — छोटी सी, किसी कपड़े में लिपटी।
मैं उतरा। उठाई। कपड़ा खोला — अंदर पीतल का एक टुकड़ा था, छोटा, कोने जैसा, और उस पर वही दो लकीरों-बिंदु वाला निशान खुदा था जो टोकन पर था, जो पापा की घड़ी पर था। वो भवानी के टूटे टोकन का टुकड़ा था। और कपड़े पर एक लाइन लिखी थी, किसी तेज़ हाथ से, शायद उसी बूढ़े ने, जो अभी-अभी गया था।
"तेरे पास जो है, वो मेरा है। और तेरे पास जो नहीं है, वो भी मेरा होगा।"
मैंने टुकड़ा जेब में डाला और दरवाज़ा बंद किया।
भीतर आकर मैंने घड़ी मेज़ पर रखी और उसके पास ही भवानी के टोकन का टुकड़ा। दोनों पीतल के, दोनों पर एक ही निशान। पर एक चलती थी, दूसरा सिर्फ़ टुकड़ा था। और मेरी जेब में वो था जो इन दोनों से जुड़ा था, चुप, पर ज़िंदा।
खिड़की के बाहर आसमान स्याह था, पर पूरब में जो लकीर सुबह दिखी थी, वो अब और गहरी हो रही थी।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो सो रही थी, या सोने का नाटक कर रही थी। मैंने चादर उसके कंधे तक खींच दी, और फिर अपनी चारपाई की तरफ़ बढ़ा। पर लेटा नहीं।
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