The Token System – Chapter 166
“कुआँ यहीं कहीं था,” सोमनाथ ने कहा। “सेठ की बही में लिखा है — पीपल के दक्षिण में, दीवार से सटा।”
हम पीपल के दक्षिण में गए। ज़मीन पर सूखी पत्तियाँ थीं और ईंटों का टीला सा दिख रहा था। बंसी ने टीले पर लात मारी तो ईंटें खिसकीं और नीचे से अंधेरा दिखा।
“ये कुआँ है,” बंसी ने कहा। “ढका हुआ।”
मैंने झुककर ईंटें हटाईं। नीचे लोहे का चौकोर ढक्कन था, जंग लगा, पर पूरा सलामत। उस पर एक ताले जैसी कुंडी थी, पर बिना ताले के। बंसी ने ढक्कन उठाया तो कूएँ से ठंडी हवा और सीलन की बदबू आई।
“रस्सी नहीं है,” बंसी ने कहा।
“रस्सी की ज़रूरत नहीं,” सोमनाथ ने कहा। “दीवार पर पत्थरों के दोनों तरफ़ खाँचे हैं। ज़रा उतरकर देख।”
“तू कैसे जानता है?”
“सेठ की लिखाई है काग़ज़ पर — ‘बाहर से सीढ़ी, अंदर से पत्थर।’”
बंसी ने अंदर झाँका, फिर मेरी तरफ़ देखा। “मैं उतरता हूँ।”
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं उतरूँगा।”
“मन्नू…”
“तेरे पास गाड़ी है, तू ऊपर रहेगा। अगर कुछ हो तो शोर मचाकर लोगों को बुला लेना।” मैंने अपनी जेब से टोकन निकाला। “और ये तेरे पास रहेगा।”
बंसी ने टोकन लिया और उसे गौर से देखा। “तू अंदर जा रहा है और टोकन बाहर छोड़ रहा है? अगर अंदर कुछ हो जाए…”
“तो टोकन बेकार हो जाएगा,” मैंने कहा। “इसलिए वो बाहर रहेगा।”
सोमनाथ पीपल की जड़ पर बैठ गया। “मन्नू, एक बात। अंदर जो भी दीवार मिले, उसे खोलने की कोशिश मत करना। सिर्फ़ देखकर आ जाना। खोलने के लिए दोनों टोकन चाहिए।”
“समझ गया।”
मैं कुएँ में उतरा। पत्थरों के किनारे थे, बड़े-बड़े खुरदुरे, जिन पर पैर रखा जा सकता था। मैं धीरे-धीरे नीचे गया। ऊपर से बंसी का चेहरा छोटा होता गया। फिर मेरा पैर सपाट ज़मीन पर पड़ा।
नीचे अंधेरा था, पर कुएँ के पीछे की तरफ़ से थोड़ी रोशनी आ रही थी — कहीं से दरार। मैं उस तरफ़ बढ़ा। सामने एक ईंटों की दीवार थी। मैंने हाथ लगाया तो ठंडी थी।
और फिर मैंने देखा — दीवार के साथ-साथ ज़मीन पर चूने से खींची एक लकीर, जो दीवार के नीचे एक गड्ढे सी जगह पर रुकती थी। उस जगह पर ईंटें अलग तरह से लगी थीं, जैसे किसी ने उन्हें बाद में रखा हो। मैंने घुटने टेके और उँगली से खुरचा। ईंट हिली।
मैंने दोनों हाथों से ईंट को हिलाया। वो निकल आई। अंदर अंधेरा था। मैंने जेब से माचिस निकाली — शाम को घर से ली थी — और एक तीली जलाई। तेज़ रोशनी में मैंने अंदर झाँका।
ईंटों के पीछे एक छोटा सा खोखला था। और उस खोखले में कुछ नहीं था। खाली।
मैंने तीली और करीब की। खोखले की ज़मीन पर कुछ पीला दिखा — जैसे कोई कोना छूट गया हो। मैंने हाथ डाला और उँगलियों से खींचा। पीले काग़ज़ का एक कोना निकला, फटा हुआ, बस दो उँगलियों जितना।
काग़ज़ का कोना। बस। जिस पर कुछ लिखा था, पर अधूरा — सिर्फ़ एक टेढ़ी लकीर और कुछ नहीं। बाकी काग़ज़ पहले ही निकाला जा चुका था।
यहाँ से किसी ने काग़ज़ निकाल लिया है। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
बीस साल से ये काग़ज़ यहाँ था, और आज ये खाली है। जबकि बद्री का काग़ज़ भी इसी दीवार में बताया गया था।
मैंने तीली बुझाई, ईंट वापस लगाई, और कुएँ से ऊपर चढ़ने लगा। रास्ते में घुटने छिल गए, पर फ़र्क़ नहीं पड़ा।
ऊपर आते ही बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। “क्या मिला?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “खाली दीवार।”
“खाली?” सोमनाथ उठ खड़ा हुआ। “नहीं हो सकता। सेठ ने खुद लिखा था।”
“हो सकता है,” मैंने कहा। “अगर भवानी ने पहले निकाल लिया हो।”
सोमनाथ की आँखें बड़ी हो गईं। “तो भवानी ने काग़ज़ निकालकर कहीं और छिपा दिया है।”
“या फिर एक और आदमी है जो ये जानता था,” बंसी ने कहा।
हम तीनों चुप खड़े रहे। पीपल की पत्तियाँ हवा में खड़खड़ा रही थीं।
मैंने बंसी से टोकन वापस लिया और जेब में रखा। हाथ जेब से बाहर आया ही था कि टोकन गरम होने लगा — हल्का गरम नहीं, जलाने वाला। मैंने झटके से जेब से हाथ निकाला।
बंसी ने मेरा चेहरा देखा। “क्या हुआ?”
“टोकन,” मैंने कहा। “गरम है।”
मैंने उसे निकाला। पीतल का रंग लाल जैसा दिख रहा था। और फिर मेरे कान में आवाज़ आई — छोटी, साफ़, पर कहीं दूर से। दो शब्द। “अब दोनों साथ।”
आवाज़ खत्म हुई और टोकन ठंडा हो गया।
मैंने सोमनाथ की तरफ़ देखा। वो पीपल की जड़ पर बैठा था, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी किसी पर नहीं देखा — डर नहीं, पर हार मान लेने जैसी सफ़ेदी।
“क्या बोला?” सोमनाथ ने धीरे से पूछा।
“अब दोनों साथ,” मैंने कहा।
सोमनाथ ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा, वहाँ जो टोकन जैसा निशान था। “तो अब वो वक़्त आ गया है जब हिसाब सिर्फ़ मेरा नहीं रहा।”
“क्या मतलब?” बंसी ने पूछा।
सोमनाथ ने अपनी आँखों में मेरी आँखें डालीं। “जब टोकन बोले कि दोनों साथ, तो अब वो दूसरा टोकन भी हिलने लगा है। भवानी के पास। और अब भवानी को भी यही सुनाई दे रहा होगा।”
॥
सोमनाथ की बात सुनकर मैं वहीं पीपल के नीचे खड़ा रह गया। रात के ग्यारह बज रहे थे और मुझे हवेली जाना था — अकेले, बिना बंसी के, बिना किसी के।
“तू पागल है,” बंसी ने कहा जब मैंने उसे बताया। “अकेले? जब भवानी का टोकन भी जाग गया है?”
“अगर दोनों साथ चलेंगे,” सोमनाथ ने धीरे से कहा, “तो दीवार खुलेगी। और अगर दीवार खुलेगी, तो जो भी अंदर है, वो बाहर आएगा। भवानी को भी यही सुनाई दिया होगा। वो भी वहाँ पहुँच रहा होगा।”
“तो फिर हम पहले पहुँचेंगे,” मैंने कहा।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सोमनाथ की तरफ़। “ठीक है। मैं साथ चलूँगा नहीं — तू कह रहा है अकेले जाना है। पर मैं गली के मोड़ पर रहूँगा। और अगर तू एक घंटे में बाहर नहीं आया, तो मैं अंदर आ जाऊँगा, तेरी मर्ज़ी के बगैर।”
मैंने सिर हिलाया। सोमनाथ ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
“सुन,” उसने कहा। “अंदर जो भी मिले, वो उठाना मत। पहले पढ़ना। पहले देखना। सेठ का हिसाब आँख बंद करके नहीं उठाया जाता।”
मैंने जेब टटोली — हवेली की चाबी, पापा की घड़ी, टोकन। तीनों थे। माँ की साड़ी का छोर मैंने अपनी कलाई पर बाँध लिया था, जैसे रीना ने कहा था।
हवेली के पिछले दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते पसीना आ गया था। चाबी घूमी, जंग लगी थी, पर दरवाज़ा खुल गया। अंदर घुप्प अंधेरा। मैंने टॉर्च जलाई — बंसी की दुकान से उठाई थी।
तहख़ाने की सीढ़ियाँ उतरते वक़्त सांप-सी गंध आ रही थी, बारिश का पानी जमा था नीचे। मैंने टॉर्च दीवारों पर घुमाई। और फिर सामने दीवार पर रोशनी पड़ी, और मेरा दिल धक् से रह गया।
वो वही दीवार थी जिसके बारे में मुझे बताया गया था। पर यहाँ, इस कमरे में — जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — दीवार पर दो खाँचे थे। ऊपर-ऊपर, एक-दूसरे से हाथ भर की दूरी पर, दोनों टोकन के बराबर गोल।
और उसके नीचे, ज़मीन से हाथ ऊँचाई पर, एक पुरानी लोहे की तिजोरी। दो ताले। दोनों जंग से भूरे, पर ताले चमक रहे थे — जैसे किसी ने हाल में तेल डाला हो।
मैंने टोकन निकाला। जेब में वो गरम था, पर जलाने वाला नहीं — बस गुनगुना। मैंने उसे बाएँ खाँचे में रखा।
टोकन बैठा और दीवार के पत्थर में हल्की कंपन हुई। पर कुछ खुला नहीं। दीवार वैसी ही रही।
मैंने दाएँ खाँचे की तरफ़ देखा। खाली।
“अकेले नहीं,” मैंने खुद से कहा। “दोनों साथ।”
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