The Token System – Chapter 167
और पीछे से आवाज़ आई — “हाँ। अकेले नहीं।”
मैं घूमा। सीढ़ियों के मोड़ पर भवानी सिंह खड़ा था, हाथ में छोटी टॉर्च, दूसरे हाथ में पीतल का टोकन। उसके पीछे दो आदमी थे, पर उसने हाथ उठाकर उन्हें रोका।
“तूने मुझसे पहले सोच लिया,” भवानी ने कहा और सीढ़ियाँ उतरने लगा। पानी में पैर पड़ा तो छपाक हुई। “साठ साल से ये दीवार बंद है। मेरे बाप ने इसे खोलने की कोशिश की थी। मैंने की। तूने की। पर आज पहली बार दोनों टोकन जागे हैं।”
“कैसे?” मैंने पूछा। “तुम्हारा टोकन कैसे जगा?”
“मुझे नहीं पता,” भवानी ने कहा। और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं सुना — सच। “रात को हमारी गाड़ी में बैठा था, तभी जलने लगा। बोला — दोनों साथ। मैंने ड्राइवर से हवेली की तरफ़ मोड़ दिया।”
वो मेरे पास आया। उसकी टॉर्च की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी।
“एक बात पूछूँ?” मैंने कहा। “तेरे पास टोकन इतने साल से है, फिर भी तेरा हिसाब बाकी क्यों है? तूने कभी दीवार क्यों नहीं खोली?”
भवानी रुका। उसने अपनी टॉर्च नीचे की।
“क्योंकि दीवार खुलने के लिए दोनों टोकन चाहिए थे,” उसने कहा। “और मेरे पास हमेशा से एक ही था। दूसरा तेरे दादा ने छुपा दिया था। मैंने पचास साल इसी दीवार को देखा है।”
“और अब तूने मेरा टोकन इसलिए माँगा था? ताकि दीवार खोल सके?”
भवानी हँसा — छोटी, खुरदरी हँसी। “मैंने तुझे खरीदने की कोशिश की। तू बिका नहीं। तेरे पापा भी नहीं बिके। तेरे दादा भी नहीं। तुम लोग… तुम लोग किस मिट्टी के बने हो?”
“जयपुर की,” मैंने कहा।
वो मुस्कुराया नहीं। उसने अपना टोकन उठाया और दाएँ खाँचे की तरफ़ बढ़ाया।
“रुक,” मैंने कहा। “पहले बात।”
“अब क्या?”
“अंदर जो भी है, आधा-आधा।”
भवानी ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई मज़ाक किया हो।
“आधा-आधा?” उसने कहा। “अरे, ये हवेली मेरे नाम पर है। ये दीवार मेरे हिसाब की है।”
“तेरी हवेली दो दिन बाद नीलाम हो रही है,” मैंने कहा। “और तेरा हिसाब — जो तूने बद्री, सुनीता, रामकिशन, श्रीराम जाट और कितनों से छीना — वो सब काग़ज़ अब मेरे पास है। तो आधा-आधा, वरना मैं ये टोकन जेब में रखकर बाहर जा रहा हूँ। और तेरा टोकन अकेला कुछ नहीं खोलेगा।”
भवानी का चेहरा कड़ा हुआ। उसके हाथ की उँगलियाँ टोकन पर सफ़ेद पड़ गईं।
“तू मुझसे सौदा कर रहा है? इस जगह पर?”
“सौदा नहीं,” मैंने कहा। “हिसाब। तूने खुद कहा था — तू हिसाब का आदमी है। तो चल आधा-आधा।”
कुछ पल वो मुझे देखता रहा। फिर उसने टोकन दाएँ खाँचे में रख दिया।
दोनों टोकन चमके — सुनहरी, पीली रोशनी जो दीवार से फूटी, इतनी तेज़ कि मुझे आँख मूँदनी पड़ी। पत्थरों के बीच से कंपन हुआ, गरारा आवाज़ आई, और दीवार का बीच का हिस्सा अंदर की तरफ़ धँसकर एक खोखला बना गया।
अंदर से धूल आई, और फिर — तिजोरी से ऊपर — एक आला दिखा, और उसमें काग़ज़ों का बंडल। पीले, भूरे, रस्सी से बँधे, जैसे कोई सालों पहले रख गया हो।
भवानी ने हाथ बढ़ाया।
“रुक,” मैंने कहा, पर वो नहीं रुका। उसकी उँगलियाँ बंडल तक पहुँच गईं।
और तभी सीढ़ियों से आवाज़ आई।
“रुक जा भवानी। तेरे पीछे पुलिस खड़ी है।”
बंसी की आवाज़ थी — तेज़, साफ़, ऊपर से आती हुई।
भवानी का हाथ रुक गया। उसने पलटकर देखा।
मैंने भी देखा। सीढ़ियों पर बंसी खड़ा था, और उसके पीछे — मैंने आँखें सिकोड़ीं — राजेंद्र था। सिर्फ़ राजेंद्र नहीं, दो सिपाही और, और एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी जिसके हाथ में एक झुकी हुई लाइट थी। भवानी के पीछे नहीं — सीधे सीढ़ी पर, जैसे उन्होंने कुछ सोचकर इंतज़ार किया हो।
भवानी ने हाथ वापस खींच लिया। उसका चेहरा बदला — न डर, न ग़ुस्सा, बस थकान।
“तूने खबर कर दी,” भवानी ने मेरी तरफ़ देखकर कहा।
“मैंने नहीं,” मैंने कहा। “सच कह रहा हूँ। शायद टोकन ने किया।”
“फ़र्ज़ी शिकायत कल से बंद,” राजेंद्र ने सीढ़ियाँ उतरते हुए कहा। “और तीन रजिस्टर, तीन सील, बद्री की फ़ाइल — सब ज़ब्त हैं। श्रीमान भवानी सिंह, तुम्हें हिरासत में लेना है।”
भवानी ने अपनी टॉर्च राजेंद्र के चेहरे पर की। “तुम्हें पता है, राजेंद्र, मैं तुम्हारी नौकरी करा सकता हूँ, या तुम्हारी नौकरी खत्म।”
राजेंड्र आगे आया। “मुझे पता है। इसलिए मैंने तीन साल से चुप रहकर देखा। आज से नहीं देखूँगा।” उसने हथकड़ी निकाली।
भवानी ने हाथ आगे किया — जैसे कोई पुरानी आदत से आगे करता हो, झगड़ने के लिए नहीं।
“आधा-आधा,” उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा। “तूने कहा था।”
“मैंने कहा था,” मैंने कहा। “पर बंदूक की नोक पर नहीं।”
वो हँसा। छोटी हँसी। “तू अपने दादा जैसा है।”
मैंने काग़ज़ों का बंडल उठाया। भारी था, रस्सी जंग लगी थी। मैंने उसे सीढ़ी की तरफ़ बढ़ाया, तो राजेंद्र ने मन्नू से पहले हाथ बढ़ाया और बंडल ले लिया।
“ये सबूत है,” राजेंद्र ने कहा। “पहले थाना। फिर तेरे हाथ।”
“ठीक है,” मैंने कहा।
भवानी को ले जाया जा रहा था, तभी वो सीढ़ी के पहले कदम पर रुका।
“एक बात,” उसने कहा, बिना पलटे। “मेरा टोकन। वो दीवार में है।”
“वो रहेगा,” मैंने कहा। “तिजोरी में। फिर से।”
भवानी सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उसकी गर्दन झुकी थी, पर कदम अब भी वैसे ही पड़ रहे थे। ऊपर पहुँचकर उसने कहा — मुझे सुनाई दिया, बस मुझे — “हिसाब तो अभी भी बाकी है।”
वो चला गया।
बंसी नीचे आया और मेरे कंधे पर हाथ रखा। “डर गया था?”
“हाँ,” मैंने कहा।
“अच्छा। समझदार आदमी ही डरता है।”
हम दोनों उस दीवार के सामने खड़े थे, जो अब खुली थी। मैंने टोकन निकाला — मेरा। और भवानी का टोकन अब भी दाएँ खाँचे में था, चमक खोकर।
“एक टोकन,” बंसी ने कहा। “एक ही समय में एक के हाथ में।”
मैंने सिर हिलाया। मैंने भवानी का टोकन खाँचे से निकाला और अपने टोकन के साथ जेब में रखा। दोनों साथ। और तभी मुझे महसूस हुआ — जेब में दोनों गरम थे, पर जला नहीं। ठीक उसी तरह, जैसे बसवा में बच्चे को गोद में लेकर गाड़ी में बैठा था — जैसे कोई साथ बैठा हो।
राजेंद्र ने बंडल अपनी बगल में दबाया और सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा, पर मैंने उसे रोका।
“एक मिनट।”
“क्या?”
“ये काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ नहीं हैं। इनमें क्या है, वो पता है तुझे?”
राजेंद्र रुका। उसने बंडल की रस्सी पर उँगली फेरी, फिर बोला, “जितना मुझे पता है, उतना बता देता हूँ। ज़मीन के काग़ज़। असली-नकली की पूरी फेहरिस्त। किस खाते में किसकी ज़मीन घुसाई गई, किसकी मिलाई गई। बद्री के हाथ से लिखी गई एक-एक एंट्री।”
“और बद्री?”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। “बद्री अब इस दुनिया में नहीं है।”
बंसी ने पूछा, “कब?”
“चार महीने पहले। गाँव के बाहर, सड़क पर। किसी ने ट्रक से कुचल दिया। पुलिस ने कहा — दुर्घटना।” राजेंद्र ने बंडल को ऊपर उठाया। “अब समझ आ रहा है, दुर्घटना थी या नहीं।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो चुप था, पर उसके जबड़े कसे हुए थे।
“चल,” राजेंद्र ने कहा। “पहले थाना। फिर तेरी मर्ज़ी।”
सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे पैर भारी थे। हवेली के पिछले दरवाज़े से बाहर निकले, तो रात की हवा ने चेहरे पर थप्पड़ जैसा एहसास दिया। दो सिपाही भवानी के दोनों तरफ़ थे। भवानी चुपचाप चल रहा था, जैसे कोई लंबी सड़क पर अपने घर जा रहा हो।
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