The Token System165 / 1154

The Token System – Chapter 165

7 min read November 6, 2026

सूरज अब पूरा निकल आया था। मैंने मंदिर की दीवार से पीठ टिकाई और आँखें बंद कीं। आठ हज़ार का अंक जेब में धुँधला था। सामने काम बड़ा खड़ा था — दीवार, दो टोकन, भवानी। और सिर्फ़ दो दिन।

बंसी उठा। “मैं ज़रा बाज़ार की तरफ़ जाता हूँ। देखता हूँ क्या हवा चल रही है। तुम दोनों यहीं रहो।”

वो साइकिल लेकर गया। मैं और सोमनाथ मंदिर के पीछे बैठे रहे। सोमनाथ ने बही फिर माँगी, और इस बार पन्ने उलटते हुए कुछ ढूँढता रहा। फिर उसने एक पन्ने पर उँगली रोकी।

“ये देख।”

पन्ने पर एक किनारे टेढ़ी लिखाई थी, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो — “दीवार के पीछे कुआँ।”

“कुआँ?” मैंने कहा। “हवेली के पीछे तो कुआँ दबा हुआ है।”

“दबा हुआ नहीं है,” सोमनाथ ने कहा। “वो ज़मीन में अभी भी है। उसका मुँह ईंटों से ढका है। और उसी कुएँ के रास्ते से सेठ दीवार के पीछे तक जाता था।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। “मतलब दीवार में जाने का रास्ता बाहर से नहीं, नीचे से है।”

“हो सकता है,” सोमनाथ ने कहा। “मैंने कभी नहीं देखा। सेठ ने मुझे इस काग़ज़ के बारे में कभी नहीं बताया। ये नक्शा मुझे उसी दिन मिला जिस दिन हरि सिंह ने मेरा नाम काटा। सेठ मर चुका था। मैंने इसे छिपा लिया।”

“और आज तक नहीं देखा?”

“डर था,” सोमनाथ ने कहा। “अगर मैं हवेली के पीछे जाता और पकड़ा जाता, तो मेरी मौत का काग़ज़ खुल जाता।”

हम चुप बैठे रहे। दूर किसी चाय की दुकान से बर्तन खड़कने की आवाज़ आ रही थी।

लगभग आधे घंटे बाद बंसी की साइकिल की घंटी बजी। वो साँस फूले हुए आया, साइकिल भी ठीक से नहीं खड़ी की, और मंदिर के पीछे आकर बैठ गया।

“क्या हुआ?” मैंने पूछा।

“भवानी ने अदालत से नीलामी की तारीख़ बदलवा ली,” बंसी ने कहा। “तीन दिन से दो दिन कर दी। परसों सुबह।”

“दो दिन?” मैंने कहा। “और कल तो वो तहसील में काग़ज़ जमा करेगा।”

“हाँ। मतलब काग़ज़ जमा होते ही नीलामी भी सामने है। एक ही सुबह दो सुबह नहीं रहीं।”

सोमनाथ ने धीरे से कहा, “तो समय कम है।”

“कितना कम?” बंसी ने कहा। “आज पूरा दिन, आज रात, और कल। बस।”

मैंने पर्ची जेब से निकाली और सामने रखी। काला धब्बा सूरज की रोशनी में और साफ़ दिख रहा था। “अगर दीवार नहीं खोल पाए, तो सब काग़ज़ बेकार। भवानी नीलामी कर देगा और हवेली हमेशा के लिए चली जाएगी।”

“तो दीवार खोलनी है,” बंसी ने कहा।

“भवानी के टोकन के बिना नहीं खुलेगी,” मैंने कहा। “और वो अपना टोकन कभी नहीं देगा।”

सोमनाथ कुछ देर सोचता रहा। फिर उसने कहा, “भवानी को लगता है वो टोकन का मालिक है। अगर उसे पता चले कि उसकी हवेली की असली चाबी उसी की जेब में है, और वो खुद नहीं जानता, तो…”

“तो वो खुद आएगा,” मैंने कहा।

“खुद नहीं,” बंसी ने कहा। “वो अपने आदमी भेजेगा। और आदमी से टोकन नहीं मिलेगा।”

मैंने सोमनाथ की तरफ़ देखा। “तू उससे बात कर सकता है?”

सोमनाथ ने अपने फटे होंठ छुए। “एक बार कर चुका। तीस साल का आदमी फिर से वही नहीं होता।”

“पर तू जानता है उसका दिमाग़ कैसे चलता है,” मैंने कहा।

“जानता हूँ।” सोमनाथ ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। “वो अपने बाप से डरता है, मरने के बाद भी। हरि सिंह ने अपने हिसाब का सारा बोझ भवानी पर छोड़ दिया — काग़ज़, ज़मीनें, दलाली। भवानी ने सब सँभाला, पर कभी हिसाब नहीं चुकाया।”

“और अब हिसाब उसके सामने खड़ा है,” बंसी ने कहा। “वो खुद काग़ज़ में जा रहा है, जानता नहीं।”

मैंने पर्ची उठाई। “तो आज शाम हम हवेली जाते हैं। कुएँ की तरफ़। देखते हैं रास्ता खुलता है या नहीं।”

“और टोकन?” बंसी ने पूछा।

“टोकन मेरे पास है। उसके बिना कुआँ नहीं खुलेगा। और भवानी का टोकन हमें चाहिए।”

“भवानी से माँगने पर वो नहीं देगा,” सोमनाथ ने कहा। “चुराना पड़ेगा।”

“चुराना?” बंसी ने आवाज़ उठाई। “हवेली में घुसकर भवानी की जेब से टोकन?”

“मैं चुराने वाला नहीं हूँ,” मैंने कहा। “मैं हिसाब वाला हूँ।”

सोमनाथ मेरी तरफ़ देखने लगा, जैसे मुझमें कुछ ढूँढ रहा हो। “तेरे पापा भी ऐसे ही कहते थे।”

“क्या?”

“कहते थे — मैं काग़ज़ नहीं चुराता, मैं हिसाब रखता हूँ।” सोमनाथ ने बही बंद की। “और उसी हिसाब में वो खुद फँस गए।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

हम मंदिर से बाहर आए। रास्ते में बंसी ने साइकिल धकेली और मुझसे कहा, “तू घर जा। माँ रात से परेशान होगी। और रीना को भी बता दे कि तू ठीक है। मैं सोमनाथ के साथ रहूँगा।”

“और शाम को हवेली?”

“शाम को मिलते हैं।” बंसी ने साइकिल पर बैठते हुए कहा। “पर एक बात — शाम तक भवानी को पता न चले कि सोमनाथ ज़िंदा है। वरना वो सीधे उसे उठवा लेगा।”

“पता नहीं चलेगा,” सोमनाथ ने कहा।

वो दोनों गली के मोड़ से गए। मैं उलटी तरफ़ मुड़ा, घर की तरफ़।

घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। रीना चूल्हे के पास बैठी थी, माँ चारपाई पर। मेरे आते ही रीना उठी।

“माँ ठीक है?” मैंने पूछा।

“ठीक है,” रीना ने कहा। “पर रात भर आँख नहीं लगी उसकी।” वो मेरे पास आई और कमीज़ की तरफ़ देखा, जहाँ काग़ज़ दबे थे। “क्या हुआ?”

“बहुत कुछ,” मैंने कहा। “पर खड़े होकर नहीं बताऊँगा। चाय बना।”

रीना ने हल्की मुस्कान दी, फिर भी कुछ पूछने से रुकी। माँ उठकर बैठी।

“बंसी कहाँ है?” माँ ने पूछा।

“बाहर काम पर,” मैंने कहा।

“और वो काग़ज़, जो रात लेकर गया था?”

“मेरे पास है।”

माँ ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी कमीज़ पर। “तेरे पापा भी ऐसे ही काग़ज़ दबाकर घूमते थे। और फिर एक दिन गाड़ी फिसली।”

“माँ,” रीना ने कहा। “अब शुरू मत कर।”

“मैं शुरू नहीं कर रही,” माँ ने कहा। “पर मैं देख रही हूँ। उसी रास्ते पर जा रहा है।”

मैंने माँ के पास जाकर बैठना चाहा, पर वो उठकर रसोई में चली गई। कुछ देर बाद चाय लेकर आई। हम तीनों चुपचाप चाय पीने लगे।

चाय पीते हुए रीना ने धीरे से कहा, “मन्नू, कल एक बात हुई।”

“क्या?”

“रामावत जी का फ़ोन आया था। आकाश के पापा।”

“क्या कहा?”

“कहा — रीना, तू सीधी लड़की है, सच बता… तेरे भाई का कोई केस है क्या?”

मैंने चाय का कप नीचे रख दिया।

“मैंने कहा — भाई ठीक है, किसी से लड़ता नहीं।” रीना ने मेरी तरफ़ देखा। “पर उनकी आवाज़ से लगा कि वो डरे हुए थे। किसी ने उन्हें फ़ोन किया होगा।”

माँ ने कप ज़ोर से रखा। “भवानी।”

“माँ, चुप रह,” रीना ने कहा। “जो होगा देखा जाएगा। पर मैं ये कहती हूँ, भाई — तेरी लड़ाई तेरी है, मेरी शादी की वजह से मत लड़ना।”

“ये तेरी शादी की लड़ाई नहीं है,” मैंने कहा। “ये हिसाब की लड़ाई है।”

रीना ने मेरी तरफ़ देखा, कुछ कहने को हुई पर रुक गई। फिर उसने चाय खत्म की और चूल्हे के पास चली गई।

मैं माँ के पास से उठा और अपने कमरे में गया। काग़ज़ निकाले — बही, तहसील का असली रजिस्टर, सोमनाथ की पर्ची। तीनों चारपाई पर रखे और देखता रहा। पर्ची पर काला धब्बा सूरज की रोशनी में चमक रहा था।

दोपहर बीती। शाम को चाय की दुकान पर बंसी मिला। सोमनाथ उसके पीछे बैठा था।

“कुछ सोचा?” बंसी ने पूछा।

“सोचा,” मैंने कहा। “पहले कुआँ देखना है। अंधेरे में नहीं, रोशनी बाकी है। चल।”

हम रामगंज की पीछे वाली गलियों से होते हुए हवेली की तरफ़ पैदल चले। सोमनाथ के हाथ में लाठी थी, वो धीरे चलता था।

हवेली के पीछे वाला रास्ता सूनसान था। वहाँ से सड़क नहीं दिखती थी। झाड़ियाँ थीं, टूटी दीवार थी, और उसके आगे पीपल का पुराना पेड़। उसके नीचे पत्थरों का चबूतरा था।

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