The Token System – Chapter 164
हम भागते रहे। रास्ते में रामदीन की सांस फूल रही थी, पर वो रुका नहीं। फिर वो बोला, “मन्नू, एक बात बताता हूँ। भवानी के पास एक और काग़ज़ है। जिसमें सोमनाथ की मौत की तारीख़ लिखी है। जिस दिन हवेली का केस चला था। वो काग़ज़ जाली है। और उसे बनाने वाला…”
वो रुका।
“कौन?” मैंने पूछा।
“मैं,” रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर भी था और शर्म भी।
हम एक पुरानी मंदिर की दीवार के पीछे छिपे। रामदीन ने सांस लेकर कहा, “वो मौत का काग़ज़ मैंने ही लिखा था। हरि सिंह ने कहा था — सिर्फ़ काग़ज़ पर, सोमनाथ को कोई नुकसान नहीं होगा।”
“और तूने मान लिया?” बंसी ने कहा।
“मैं उस वक़्त ग़रीब था,” रामदीन ने कहा। “मेरे पास दो बच्चे थे।”
सोमनाथ कुछ देर चुप रहा। फिर उसने रामदीन की तरफ़ देखा। “तूने मेरी मौत लिखी, और मेरी ज़िंदगी की सज़ा भुगती।” वो हँसा — धीमी, टूटी हँसी में। “बीस साल से मैं सोच रहा था कि मेरी ज़िंदगी किसने बर्बाद की। आज पता चला कि मेरे साथ वाला भी बर्बाद हुआ।”
रामदीन की आँखें भर आईं।
“अब रो मत,” बंसी ने कहा। “रोने का वक़्त नहीं है।”
“नहीं,” सोमनाथ ने कहा। “रोने दे। बीस साल का हिसाब है।”
रामदीन ने आँखें पोंछीं। फिर उसने कुछ सोचकर कहा, “एक बात और। तहसीलदार ने मुझे डराया था कि अगर मैंने मुँह खोला तो मेरा बेटा नौकरी से निकाल दिया जाएगा। पर आज उसने मुझे एक नई बात बताई — भवानी के पास एक नया काग़ज़ आया है।”
“कैसा काग़ज़?” मैंने पूछा।
“हवेली के नाम पर का। जिसमें सोमनाथ का हिस्सा आधा दिखाया गया है। वो काग़ज़ भवानी कल तहसील में जमा करेगा।”
“तो हमें भी कल ही जमा करना होगा,” बंसी ने कहा।
हम मंदिर के पीछे से सड़क पर आए। सुबह की पहली किरण निकल रही थी। सोमनाथ एक पत्थर पर बैठ गया। उसने मेरी कमीज़ की तरफ़ देखा, जहाँ बही और फ़ाइल दबी थीं।
“निकाल,” उसने сказа मुझसे। “एक बार देख लूँ।”
मैंने बही निकाली और उसके हाथ में दी। सोमनाथ ने उसे खोला। उसके हाथ काँप रहे थे
॥
सोमनाथ ने बही खोली, उँगली पहले पन्ने पर रखी, और बिना ऊपर देखे बोला, “ये बही मैंने पहली बार नहीं देखी। बीस साल पहले जब मैं मरा हुआ घोषित हुआ, तब भी यही पन्ने थे।”
मैंने उसके सामने घुटने के बल बैठकर पूछा, “मरे हुए आदमी का हिसाब कैसे चलता है?”
सोमनाथ ने पन्ना पलटा। “सुन।”
उसने बताया कि हवेली के पीछे की ज़मीन का एक हिस्सा ऐसा था जो किसी के नाम पर साफ़ नहीं था। न हरि सिंह के, न सेठ के, न उसके। सरकारी काग़ज़ों में वो हिस्सा “बेनाम” पड़ा था। उसे बेचने के लिए किसी ज़िंदा आदमी का नाम चाहिए था, क्योंकि बेनाम ज़मीन कोई नहीं खरीदता। हरि सिंह ने उसी वक़्त दिमाग़ लगाया।
“उसने मुझसे कहा — तू काग़ज़ पर मर जा, ज़मीन मेरे नाम पर बिक जाएगी, और तेरे हिस्से का पैसा मैं कभी नहीं खाऊँगा।”
“और तू मान गया?” बंसी ने कहा।
सोमनाथ ने अपने फटे होंठ पर जीभ फेरी। “मैं उस वक़्त हवेली में नौकर था, बही रखता था, हिसाब लिखता था। मेरे पास अपना कुछ नहीं था। उसने कहा — तू मेरा भाई है, तेरे नाम पर ज़मीन रहेगी तो लोग क्या कहेंगे, इसलिए काग़ज़ पर तू मर जा।” वो रुका। “मैंने मान लिया। तहसील में मौत दर्ज हुई, मेरा नाम हटा, और ज़मीन हरि सिंह के एक और भाई के नाम पर चढ़ गई — जो कभी था ही नहीं।”
“जो था ही नहीं?” मैंने पूछा।
“काग़ज़ पर बनाया हुआ नाम। भूरे रजिस्टर में आज भी वो नाम लिखा है — रामनारायण। कोई रामनारायण नाम का आदमी हवेली में कभी नहीं आया।”
रामदीन ने अपना सिर हाथ में पकड़ लिया। “मैंने वो नाम कई बार पढ़ा। मुझे लगा किसी और गाँव का होगा।”
“और वो ज़मीन?” बंसी ने पूछा।
“बिक गई,” सोमनाथ ने कहा। “उस पैसे से हरि सिंह ने भवानी का नर्सिंग होम खड़ा किया। मेरे मरे हुए नाम की ईंटों पर खड़ा है वो होम।”
हवा ठंडी थी, पर मेरी गर्दन पर पसीना था। मैंने बही में वो पन्ना देखा जहाँ रामनारायण लिखा था। स्याही पीली पड़ गई थी, पर नाम साफ़ था।
“तो अब क्या होगा?” मैंने पूछा। “जब हम ये रजिस्टर अदालत में ले जाएँगे, तो ये भी खुलेगा कि रामनारायण कोई नहीं है।”
“खुलेगा,” सोमनाथ ने कहा। “और उस दिन मैं अपनी मौत का काग़ज़ भी साथ रखूँगा।” उसने अपनी कुर्ती की जेब से एक तह किया हुआ पुराना काग़ज़ निकाला, जो किनारों से फटा हुआ था। “ये रख।”
“क्या है ये?”
“हवेली के तहख़ाने का नक्शा। सेठ ने खुद बनाया था, अपने हाथ से।”
मैंने काग़ज़ खोला। किनारे गल गए थे, बीच से एक लकीर फटी थी, पर जो बचा था वो काफ़ी था। नीचे तीन तरफ़ दीवारें, ऊपर एक जगह पर काला धब्बा जैसा निशान था, और उसके बगल में महीन लिखाई में कुछ लिखा था।
“ये धब्बा क्या है?” मैंने पूछा।
“सेठ ने वहाँ उँगली रखी थी, बहुत पुरानी स्याही का धब्बा है।” सोमनाथ ने धब्बे पर उँगली रखी। “यहीं वो दीवार है जहाँ दोनों टोकन रखे गए थे। इसी दीवार के अंदर, दोनों खाँचों के बीच, सेठ ने आख़िरी काग़ज़ छिपाया था।”
“कौन सा आख़िरी काग़ज़?”
“जो सब जोड़ता है। सेठ ने तीन काग़ज़ बनाए थे — एक अपने पास, एक हिसाब की बही में, और एक उस दीवार के अंदर। जो दीवार के अंदर है, वो सबसे पूरा है।” सोमनाथ ने मेरी तरफ़ देखा। “बद्री के बाद तेरे पापा ने जो आख़िरी काग़ज़ छिपाया, वो भी उसी दीवार में है। दोनों एक ही जगह हैं।”
मैंने काग़ज़ को करीब किया। “और उसे खोलने के लिए?”
सोमनाथ ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ टोकन था। “दोनों टोकन चाहिए। एक तेरा, एक भवानी का। दीवार के दोनों खाँचों में एक साथ रखे बिना वो दीवार नहीं खुलेगी।”
बंसी ने मुँह बनाया। “मतलब भवानी के साथ मिलकर काम करना होगा? वो तो कभी नहीं मानेगा।”
“मानेगा,” सोमनाथ ने कहा। “जब उसका अपना हिसाब दीवार में बंद दिखेगा। वो भूखा है अपने हिसाब के लिए।”
रामदीन उठ खड़ा हुआ। “मुझे अब जाना होगा। मेरा बेटा रात से डरा हुआ है, और तहसीलदार मेरे पीछे है। अगर मैं आज दफ़्तर नहीं गया, तो वो मेरी नौकरी काट देगा और फिर कोई गवाही नहीं दे पाऊँगा।”
“तू दफ़्तर जा,” बंसी ने कहा। “और अंदर जाकर सबसे पहला काम — वो असली रजिस्टर वाली जगह बदल दे। भवानी के आदमी उसे ढूँढने आएँगे।”
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। “रजिस्टर तेरे पास है। उसे अदालत में ही दिखाना। मेरे दफ़्तर में नहीं, वरना रास्ते में ही गायब हो जाएगा।”
“और तू?” मैंने पूछा।
“मैं मुँह से गवाही दूँगा,” रामदीन ने कहा। “बीस साल बाद भी, पर दूँगा।”
वो गली के मोड़ से मुड़ा और चला गया। उसकी पीठ देखकर सोमनाथ बोला, “बीस साल पहले यही आदमी मेरी मौत लिख रहा था। और आज यही मेरी ज़िंदगी का काग़ज़ लेकर जा रहा है।”
“हिसाब है,” बंसी ने कहा। “सबका एक दिन आता है।”
मैंने सोमनाथ से पूछा, “तूने बीस साल कहाँ बिताए? घर में बंद?”
“नहीं,” सोमनाथ ने कहा। “कुछ साल रेलवे फाटक के पार, कुछ साल बाहर। हरि सिंह मर गया, भवानी बड़ा हुआ, और मुझे लगा अब कोई नहीं पहचानेगा। पर जब भवानी ने हवेली का काग़ज़ तहसील में चढ़ाना शुरू किया, तब मैं वापस आया। तीन साल से इसी बस्ती में पड़ा हूँ।”
“और तूने भवानी से कभी मुँह नहीं खोला?”
“खोला था, एक बार।” सोमनाथ ने फटे होंठ पर हाथ रखा। “ये निशान उसी बातचीत का है।”
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