The Token System – Chapter 163
“तेरे पास कुछ है,” उसने कहा। “जो मेरे बाप के पास भी था।”
“पता है,” मैंने कहा।
“तो उसे सँभाल।” उसने मेरा हाथ पकड़ा। “क्योंकि जब ये हिसाब पूरा होगा, ये तेरे पास नहीं रहेगा।”
टोकन उस पल गरम हुआ — न ज़्यादा, बस एक पल, जैसे किसी ने मुझे छुआ हो। मैंने उसे दबा लिया।
रेलवे फाटक पार करते वक़्त बंसी ने पीछे मुड़कर देखा। “दो साये हैं पीछे,” उसने धीरे कहा।
“भवानी के आदमी?”
“हो सकते हैं।”
मैंने पीछे देखा। गली के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी धीमी रफ़्तार से हमारे पीछे आ रही थी, बत्ती जली हुई। मैंने सोमनाथ की तरफ़ देखा। वो सीधा आगे देख रहा था, चेहरे पर डर नहीं, थकान थी।
“उन्हें आने दे,” उसने कहा। “जितने आएँ, उतने गवाह बनेंगे।”
सफ़ेद गाड़ी हमारे पीछे-पीछे रेंगती रही। बंसी ने साइकिल की रफ़्तार बढ़ाई। सोमनाथ पीछे बैठा था, उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा, “तू गलियों से चल। मैं और बंसी सीधे रास्ते से जाएँगे। तहसील के पीछे वाली गली में मिलते हैं।”
“नहीं,” मैंने कहा। “हम तीनों साथ हैं।”
“सुन मन्नू,” बंसी ने कहा, “तेरे पास बही है। बही और टोकन अलग हो जाएँगे तो भवानी को एक ही ढूँढना पड़ेगा।”
यह तर्क मुझे बुरा लगा, पर सही लगा। मैंने बही को कमीज़ के अंदर खोंसा और तहसील की तरफ़ वाली पतली गली में मुड़ गया।
गली में अंधेरा था। दो-तीन घरों की खिड़कियों में पीली रोशनी थी, बाकी सब बंद। मैं तेज़ क़दमों से चल रहा था कि पीछे गाड़ी का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।
मैंेंगा। मैं रुका नहीं। सामने एक नाली थी, उसके पार पुरानी चारदीवारी। मैं चारदीवारी की तरफ़ भागा। पीछे से आवाज़ आई, “ए मन्नू!”
अपना नाम सुनकर मेरे पैर कुछ पल के लिए रुक गए। फिर भी मैं चारदीवारी के पीछे मुड़ा और सांस रोककर खड़ा हो गया।
दो आदमी गली में आए। एक लंबा, एक ठिगना, दोनों के हाथ में लाठी।
“कहाँ गया?” ठिगने ने कहा।
“बही लेकर भागा है,” लंबे ने कहा। “भैया ने कहा था — बही हर हाल में।”
“तो भैया को बता देते हैं कि लड़का तहसील के पीछे गया।”
“बता,” लंबे ने कहा। “मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा, भैया को बूढ़े सोमनाथ से क्या चाहिए? वो तो आधा मरा आदमी है।”
“बही में उसका नाम आ गया है,” ठिगने ने कहा। “भैया डरते हैं कि अगर बूढ़ा बोल उठा तो सारा हिसाब खुल जाएगा।”
वो दोनों वापस गाड़ी की तरफ़ गए। मैं चारदीवारी के पीछे दबा खड़ा रहा। उनकी बात सुनकर एक बात साफ़ हो गई थी — भवानी को बही से ज़्यादा इस बात का डर था कि सोमनाथ ज़िंदा है। बही में लिखा है कि सोमनाथ मर चुका है। और अगर वो ज़िंदा दिख जाए तो भवानी का पूरा झूठ खुल जाएगा।
मैं तहसील के पीछे पहुँचा तो बंसी और सोमनाथ वहाँ पहले से खड़े थे। सोमनाथ की सांस फूल रही थी।
“क्या हुआ?” बंसी ने पूछा।
“उन्होंने मेरा नाम लिया,” मैंने कहा। “और कुछ ऐसा कहा जो काम का है। भवानी बही से नहीं, सोमनाथ के ज़िंदा रहने से डरता है।”
सोमनाथ ने धीरे से कहा, “समझा। मेरी मौत का काग़ज़ हवेली की ज़मीन का पूरा हिसाब पलट देता है। जिस दिन अदालत में ये बात खुलेगी कि सोमनाथ ज़िंदा है, उस दिन भवानी के सारे काग़ज़ हवा में उड़ जाएँगे।”
“तो फिर वो तुझे मार क्यों नहीं डालता?” बंसी ने पूछा।
“क्योंकि मरे हुए आदमी का हिसाब आसान होता है,” सोमनाथ ने कहा। “जिंदा आदमी बोलता है।” वो कुछ पल रुका, फिर बोला, “और मुझे मारने से पहले उसे वो काग़ज़ चाहिए जो मेरे बाप ने छिपाया था। उसे लगता है मेरे पास है।”
“और रामदीन?” मैंने पूछा।
“रामदीन के पास है,” सोमनाथ ने कहा। “वही रजिस्टर सँभालता है।”
तहसील का पुराना क्वार्टर एक बड़े पीपल के पेड़ के पीछे था। दीवार पर सफ़ेदी उतर रही थी, दरवाज़े पर टूटी बेंच पड़ी थी। सोमनाथ ने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
“रामदीन!” सोमनाथ ने आवाज़ दी। “मैं सोमनाथ हूँ। खोल।”
अंदर कुछ गिरने की आवाज़ आई। फिर दरवाज़ा खुला।
सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था — सफ़ेद दाढ़ी, हड्डियों पर ढीली चमड़ी, और आँखों पर एक लाल कपड़ा बँधा हुआ।
“सोमनाथ?” उसकी आवाज़ काँपी। “तू ज़िंदा है?”
“हूँ,” सोमनाथ ने कहा। “पर ये लोग कहते हैं मैं मर चुका हूँ।”
रामदीन ने कपड़ा खोला। उसकी आँखें साफ़ थीं, पर लाल थीं। “अंदर आओ। जल्दी।”
हम अंदर गए। कमरे में बस एक खटिया, एक चौकी और दीवार पर लटका एक पुराना बक्सा था। रामदीन ने दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगाई।
“मैं तुझे खोज रहा था,” रामदीन ने सोमनाथ से कहा। “भवानी के आदमी दो दिन से मेरे आस-पास मंडरा रहे हैं। कल रात कोई छत पर चढ़ा था।”
“तो तू यहाँ से क्यों नहीं भागा?” बंसी ने पूछा।
“क्योंकि जिस चीज़ की उन्हें तलाश है, वो मेरे पास है।” रामदीन ने बक्सा खोला और उसमें से एक मोटी, मैली फ़ाइल निकाली। “ये तहसील का असली रजिस्टर है। जिस दिन हरि सिंह ने हवेली की ज़मीन अपने नाम करवाई, उस दिन मैं तहसील में मुंशी था। मैंने अपनी आँखों से देखा — हरि सिंह ने यहाँ के दस्तख़त जाली किए थे। ये रजिस्टर उसका सबूत है।”
मैंने वो फ़ाइल ली और पलटी। पन्ने पीले पड़ चुके थे, पर स्याही साफ़ थी। एक जगह दस्तख़त के नीचे छोटा-सा निशान था।
“ये क्या है?” मैंने पूछा।
रामदीन ने झुककर देखा। “ये मेरा दस्तख़त है। मैंने गवाही में लिखा था कि ये ज़मीन हरि सिंह की नहीं है। पर हरि सिंह ने मुझे डरा दिया था। मैंने बाद में अपनी गवाही बदल दी।”
“तो तूने झूठ बोला?” बंसी ने कहा।
“बोला,” रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। “और उसी झूठ की वजह से सोमनाथ का नाम मरा हुआ लिखा गया। मैं बीस साल से इस घड़ी को नहीं भूल सका।”
सोमनाथ ने रामदीन का हाथ पकड़ा। “अब भूल जा। अब सच बोल।”
“कब?” रामदीन ने पूछा।
“कल सुबह,” बंसी ने कहा। “तहसील खुलते ही।”
रामदीन ने सिर हिलाया, फिर अचानक रुक गया। “एक बात और। भवानी मुझे नहीं मारेगा। वो मुझसे ये फ़ाइल लेना चाहता है। पर उसके पास एक और आदमी है जो मेरे बारे में सब जानता है।”
“कौन?” मैंने पूछा।
“पुराना तहसीलदार। भवानी का साथी। वो आज रात मेरे पास आने वाला है। उसी से फ़ाइल की बात हुई थी।”
बंसी खड़ा हो गया। “तो हमें अभी निकलना होगा।”
हम बाहर निकल रहे थे कि बाहर गाड़ी की रोशनी पड़ी। दरवाज़े की दरार से झाँका तो सफ़ेद गाड़ी पेड़ के नीचे खड़ी थी। दो आदमी उतर रहे थे। उनके साथ एक तीसरा आदमी था — सफ़ेद कुर्ता, चश्मा।
रामदीन ने सांस रोकी। “वो तहसीलदार है।”
“पीछे का दरवाज़ा?” बंसी ने पूछा।
“बंद है,” रामदीन ने कहा। “खिड़की से भागो। मैं उन्हें रोकता हूँ।”
“नहीं,” सोमनाथ ने कहा। “तू मेरे साथ चलेगा। ये फ़ाइल लेकर।”
रामदीन ने फ़ाइल मेरी तरफ़ बढ़ाई। “तेरे पास बही है या नहीं?”
“है,” मैंने कहा।
“तो ये भी तेरे पास रहेगी। दोनों काग़ज़ एक जगह रहेंगे तो भवानी का हिसाब साफ़ होगा।”
मैंने फ़ाइल ली। दोनों, बही और फ़ाइल, मैंने कमीज़ के अंदर खोंसी। खिड़की खोली तो पीछे की गली में अंधेरा था। बंसी पहले उतरा, फिर सोमनाथ, फिर रामदीन, और आख़िर में मैं।
हम पीछे की गली से भागे। मैंने पीछे मुड़कर देखा — उस क्वार्टर की खिड़की में रोशनी जल उठी थी। आवाज़ आई, “रामदीन! खोल!” और फिर दरवाज़ा टूटने की आवाज़।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno