The Token System – Chapter 162
हम साइकिल पर निकले। कम्मो ने जाने नहीं दिया तो घर पर माँ और रीना के साथ छोड़ दिया। रास्ते में शहर की बत्तियाँ पीछे छूट गईं और आगे अंधेरा घना हो गया। रेलवे फाटक पर ज़िंगल बज रही थी। गाड़ी गुज़रने के बाद फाटक खुला और हम उस पार उतरे।
“यहीं तीसरी गली,” बंसी ने कहा। “नींबू का पेड़ है मोड़ पर।”
गली में कीचड़ और पानी था। साइकिल की आवाज़ शांत थी। नींबू के पेड़ के नीचे एक मकान का दरवाज़ा खुला दिखा। बाहर से ही अंदर का भूरा प्रकाश आ रहा था।
“दरवाज़ा खुला है,” मैंने कहा।
बंसी ने साइकिल खड़ी की। “सोमनाथ इतनी रात तक दरवाज़ा बंद रखता है।”
हम अंदर गए। कमरे में चिराग जल रहा था, पर लपट काँप रही थी। फ़र्श पर थाली बिखरी थी, प्याला टूटा था और मसूर की दाल नीचे फैली थी।
“किसी ने यहाँ जल्दबाज़ी दिखाई है,” बंसी ने कहा।
दीवार पर, चूल्हे के ऊपर, लाल रंग का दाग था। मैंने उसे देखा तो बंसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“छुओ मत,” उसने कहा। “ताज़ा है।”
मेरा हाथ काँपा। “सोमनाथ?”
“पता नहीं। चारों तरफ़ देख।”
पीछे वाले कमरे में ज़मीन पर एक ओढ़ना पड़ा था और उसके नीचे आधा रोटी। मैंने ओढ़ना उठाया — नीचे सोमनाथ का चश्मा पड़ा था, एक काँच टूटा हुआ।
“ये उसका है,” बंसी ने कहा। “वो इसके बिना बाहर नहीं जाता।”
“तो?”
“तो उसे उठाकर ले गए,” बंसी ने कहा। “अगर वो ख़ुद भागता, चश्मा पहनकर भागता।”
मैंने दीवार पर रोशनी की। चूल्हे के दाग के नीचे उलटा स्वस्तिक खुदा था — वही जो पापा की घड़ी और भवानी के डिब्बे पर था। उसके नीचे एक पर्ची फँसी थी। मैंने उसे निकाला। पर्ची पर लिखा था — “हिसाब की किताब मिल गई है। अब चौथा नाम किसके साथ जाएगा? अदालत से पहले तय कर ले।”
बंसी ने पर्ची पढ़ी और मेरी तरफ़ देखा। “भवानी के आदमी। उसने सोमनाथ को उठाया है ताकि कल अदालत में हमारे पास कोई गवाह न हो।”
मैंने बही जेब से निकाली। “पर ये तो मेरे पास है।”
“शायद उसे लगता है सोमनाथ के पास कोई और चीज़ है।” बंसी ने पीछे के कमरे की तरफ़ रोशनी की। वहाँ एक चारपाई थी जिसके नीचे टिन का डिब्बा था।
“डिब्बा,” मैंने कहा।
बंसी ने घुटने टेके। डिब्बा पुराना था, पर ताला नहीं था। ढक्कन उठाया। अंदर एक पुरानी डायरी, कुछ लिफ़ाफ़े और एक चाबी पड़ी थी।
“ये किसकी चाबी है?” बंसी ने पूछा।
“मालूम नहीं,” मैंने कहा। “पर इसे लेते चलो।”
पीछे की खिड़की से किसी के खाँसने की आवाज़ आई। बंसी ने चिराग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
“कौन?” उसने कहा।
हमारे सामने अंधेरे में एक साया हिला। मैंने टॉर्च उधर की। कमरे के कोने में पीठ से दीवार की तरफ़ एक बूढ़ा आदमी बैठा था, घुटने सीने से लगाए, सिर नीचा। हाथ में एक पुरानी छड़ी थी। उसकी कलाई पर पीतल जैसा कोई निशान चमका।
मैं पास गया। सोमनाथ था — चेहरे पर सूजन, होंठ फटा हुआ, पर आँखों में वही पुरानी चमक।
“तू आ गया,” उसने कहा, आवाज़ सूखी।
बंसी ने पानी का लोटा बढ़ाया। उसने दो घूँट पिए और फिर मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ बही का कोना झाँक रहा था।
“निकाल,” उसने कहा।
मैंने बही निकाली। जैसे ही उसकी नज़र बही पर पड़ी, उसके हाथ काँपने लगे। घुटनों से पकड़ छूटी और वो दीवार से टिक गया।
“ये,” उसने काँपते स्वर में कहा। “ये बही मुझे मत देना।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि इसमें लिखा है कि मैं मर चुका हूँ।”
बंसी और मैं दोनों स्तब्ध रह गए। सोमनाथ ने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया — काग़ज़ पुराना था, किनारों से फटा हुआ।
“ये मेरी मौत का काग़ज़ है,” उसने कहा। “हरि सिंह ने तहसील में दर्ज करवा दिया — ‘सोमनाथ, पुत्र गोवर्धनदास, देहांत हो गया।’ पर मैं मरा नहीं। मैं भाग गया था। और मरा हुआ आदमी हिसाब नहीं माँग सकता। इसलिए मेरा नाम बही से मिटा दिया।”
“तो तू सेठ का बेटा है?” बंसी ने कहा।
“हाँ,” सोमनाथ ने कहा। “और मेरे बाप की बही में मेरा हिस्सा था — तीन हिस्से मेरे, एक कन्हैया का, एक रामदीन का। पर हरि सिंह ने मेरा नाम मौत की किताब में डालकर सब हड़प लिया।”
मैं चुपचाप बैठ गया। सोमनाथ उठा और मेरी तरफ़ आकर बही के पन्ने उलटने लगा। उसकी उँगली आख़िरी पन्ने पर रुकी, जहाँ स्याही पोती हुई थी। फिर उसने बही बंद की और मेरी तरफ़ देखा।
“और एक बात,” उसने कहा। “तेरे पापा ने इस बही को इसलिए छिपाया था कि इसमें मेरा नाम ज़िंदा है — मौत से पहले का। जिस दिन स्याही के नीचे से ये नाम निकलेगा, उस दिन भवानी का हिसाब नहीं बचेगा।”
“तो यही तो मैंने किया,” मैंने कहा। “नाम निकाल दिया।”
“तूने निकाला, पर अभी भी ये काग़ज़ पूरा नहीं।” उसने टिन के डिब्बे से वो डायरी निकाली। “ये मेरे बाप की डायरी है। इसमें बही के तीनों पन्नों की नक़ल है। जिस पन्ने को हरि सिंह ने फाड़ा था, उसकी कॉपी इस डायरी में है।”
“तो तूने ये डिब्बा क्यों खुला छोड़ा?” बंसी ने पूछा।
सोमनाथ ने सिर हिलाया। “मैंने नहीं छोड़ा। आज शाम भवानी के दो आदमी आए। मैंने डिब्बा दीवार की आड़ में कर दिया और खुद पीछे भागा। छड़ी छूट गई, वे मुझे पकड़कर यहाँ लाए।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“माँग रहे थे — बही और डायरी दे। मैंने कहा दोनों तेरे पास हैं।” सोमनाथ हँसा, खाँसी में। “उन्होंने मेरी कलाई पर तेरे पापा वाली घड़ी देखी तो पूछा — ‘ये कहाँ से?’ मैंने कहा — ‘तेरे बाप की कब्र से।’ बस, उसके बाद उन्होंने ये किया।”
उसने अपना फटा होंठ दिखाया। फिर उसने वो चाबी उठाई जो डिब्बे से मिली थी।
“ये चाबी?” बंसी ने कहा।
“ये उस दराज़ की है जो तेरे पापा ने अपने कमरे में छिपाई थी,” सोमनाथ ने कहा। “उस दराज़ में वो काग़ज़ है जो अदालत में भवानी के हाथ से बही छीन लेगा।”
“कौन सा काग़ज़?”
“तहसील का असली रजिस्टर। जिसमें हरि सिंह ने हवेली की ज़मीन अपने नाम करवाई थी और जिस पर रामदीन के दस्तख़त हैं।”
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। “रामदीन?”
“हाँ,” सोमनाथ ने कहा। “वही रामदीन जिसका नाम चौथा है। वो अब तहसील के पुराने क्वार्टर में रहता है। भवानी उसे रात में देखने वाला है।”
बंसी ने घड़ी देखी। “नौ बज रहे हैं। वक़्त कम है।”
“तो अभी चलो,” मैंने कहा। “रामदीन के पास।”
सोमनाथ ने मेरा हाथ पकड़ा। “एक बात और।” उसकी आँखों में पानी था। “मेरा नाम अगर बही से मिटा है, तो मेरा हिस्सा किसके नाम है?”
मैंने बही खोली और उसी पन्ने को दिखाया जहाँ स्याही के नीचे उसका नाम उभरा था।
“यहाँ,” मैंने कहा। “तेरा नाम है। और हिसाब भी लिखा है — तेरा हिस्सा पूरा बाकी है। जिस दिन भवानी का हिसाब बंद होगा, उस दिन ये हिस्सा तेरे नाम होगा।”
सोमनाथ रोया। बंसी ने उसकी पीठ थपथपाई।
“अब बैठ मत,” बंसी ने कहा। “चल, तेरे पापा का पैसा तुझे ही मिलेगा — पर उसके लिए अदालत तक जाना है।”
हम तीनों बाहर निकले। सोमनाथ की चाल धीमी थी, पर वो चल रहा था। साइकिल पर बंसी चला, सोमनाथ पीछे बैठा, मैं पैदल साथ-साथ।
रास्ते में सोमनाथ ने धीरे से कहा, “मन्नू, तेरे पापा का हिसाब साफ़ था। पर उन्होंने एक बात ग़लत की — वो मेरी मौत के काग़ज़ को चुनौती देने से डर गए। अगर वो तब अदालत गए होते, तो आज भवानी का नाम-निशान न होता।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “अब मैं डरता नहीं।”
वो हँसा — एक छोटी, थकी हुई हँसी। फिर उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ टोकन रखा था, और उसकी आँखें एक पल के लिए चमकीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno