The Token System161 / 1154

The Token System – Chapter 161

6 min read November 6, 2026

“कम्मो,” बूढ़े ने कहा। “तू यहाँ छिपी थी?”

“क्या तू मेरे पीछे आया है, सोमनाथ?” बूढ़ी ने कहा।

वो नाम सुनकर बूढ़ा रुका।

“तूने मेरा नाम कैसे—”

“मुझे सब पता है,” बूढ़ी ने कहा। “तू सेठ का बेटा है। तेरा नाम सोमनाथ है। और तू ही वो आदमी है जिसने भवानी को अपना टोकन दिया।”

बूढ़ा सोमनाथ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें एक पल के लिए भर आईं, फिर सख़्त हो गईं।

“मैंने भवानी को अपना टोकन नहीं दिया,” उसने कहा। “भवानी के पास मेरा हिस्सा था। मैंने उसे वापस माँगा, तो वो बोला — तेरा बेटा कहाँ है? मेरा बेटा मेरे सामने है। यही बात समझते पचास साल लग गए।”

“तो तू मेरे पीछे क्यों आया?” मैंने कहा।

“चाबी लेने,” उसने कहा। “जो डिब्बा मेरे बाप ने बनाया था, वो मेरी चाबी से खुलना चाहिए।”

“पर वो ताला तेरी चाबी से नहीं खुलता,” बूढ़ी ने कहा। “वो ताला सिर्फ़ इस काग़ज़ से खुलेगा।”

सोमनाथ ने मेरे हाथ में काग़ज़ देखा। उसकी आँखें जल उठीं।

“मेरे बाप ने कहा था,” उसने धीरे से कहा, “कि जिस दिन ये काग़ज़ फिर सामने आएगा, उस दिन हिसाब खुलेगा।”

“तो तू भवानी के साथ है या नहीं?” बंसी ने पूछा।

सोमनाथ ने कुछ देर सोचा। फिर उसने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मुझे दिया।

“ये मेरे बाप की लिखाई है,” उसने कहा। “मैं इसे भवानी को देने आया था — पर अब तुझे दे रहा हूँ। तेरे पापा ने मेरे बाप के लिए जो किया, वो मैं नहीं भूला। मैं तेरे साथ हूँ।”

वो पलटा और चला गया। जवान उसके पीछे गया।

बूढ़ी ने अपनी गठरी उठाई।

“मैं भी चलूँ?” उसने कहा। “कमलेश के पास।”

“नहीं,” मैंने कहा। “तू मेरे साथ चल। तेरा हिसाब बाकी है।”

उसने मेरी तरफ़ देखा। “मेरा हिसाब?”

“हाँ,” मैंने कहा। “सेठ की बही में तेरा नाम है। ‘हिसाब: पंद्रह।’ अब ये पंद्रह साल मुझे पूरे करने हैं।”

उसकी आँखों से एक आँसू गिरा। उसने उसे पोंछा।

“चल,” उसने कहा। “देर हो रही है।”

अस्पताल पहुँचते वक़्त शाम की सिटियाँ बज रही थीं। सुमन ने हमें इमरजेंसी के बाहर रोका — विक्रम अब भी वहीं था, अब उसे ड्रिप लगी थी।

“तेरे पास क्या है?” सुमन ने कम्मो को देखकर पूछा।

“एक गवाह,” मैंने कहा। “सबसे पुरानी गवाह।”

सुमन ने कम्मो को देखा। कम्मो ने सुमन का हाथ पकड़ा।

“डॉक्टर,” बूढ़ी ने कहा, “एक बात कहूँ?”

“कहो।”

“जो लड़का वहाँ लेटा है — वो भवानी का बेटा है।”

सुमन रुकी।

“पर वो भवानी जैसा नहीं है,” कम्मो ने कहा। “मैं जानती हूँ। मैंने भवानी के पापा को देखा है। वो बेटे को खाते में ऐसे फँसाते थे जैसे मक्खी को जाले में।”

सुमन ने सिर हिलाया।

“तो अब क्या?” उसने मुझसे पूछा।

“अब चौथा नाम पता है,” मैंने कहा। “और डिब्बे की चाबी भी।”

“तो कल अदालत चल।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा। “अदालत?”

“तू अकेला नहीं जाएगा,” सुमन ने कहा। “मेरे पास कमला का काग़ज़ है, शेखर का रजिस्टर है, तेरे पास बही है। भवानी ने कहा — कल सुबह नौ बजे। तो हम वहाँ पहले पहुँचेंगे।”

दरवाज़े पर बंसी खड़ा था, उसके हाथ में चाय का कुल्हड़ था। उसने मेरी तरफ़ देखा।

“सुबह छह बजे,” मैंने कहा। “सुनीता से मिलना है।”

“और कम्मो?”

“कम्मो मेरे साथ,” मैंने कहा। “उसका हिसाब पूरा होने तक।”

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन उस पल ठंडा था — एकदम ठंडा, जैसे बर्फ़ का टुकड़ा। मैंने उसे मुट्ठी में भींचा। अंक आठ हज़ार पर थे।

मुझे लगा — आठ हज़ार अब पहले जितना भारी नहीं लग रहा था।

बंसी ने मेरा कंधा थपथपाया।

“आज रात घर चल,” उसने कहा। “माँ घबरा रही होगी।”

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो विक्रम की ड्रिप जाँच रही थी।

“सुबह मिलते हैं,” मैंने कहा।

बाहर निकले तो हवा ठंडी थी। बंसी ने साइकिल स्टार्ट की। कम्मो पीछे बैठी।

“मन्नू,” कम्मो ने चलते-चलते कहा। “एक बात मान ले।”

“क्या?”

“जब तू वो डिब्बा खोलेगा, मैं वहीं रहूँगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने साठ साल पहले वो डिब्बा सील किया था। और मैं देखना चाहती हूँ कि उसका हिसाब किसके नाम पर खुलता है।”

॥

बंसी ने साइकिल रोकी तो सामने हमारा मकान था, दरवाज़े पर रीना खड़ी थी और हाथ में चाय का कप था।

“देर लगा दी,” रीना ने कहा। “माँ बैठी हैं तेरे लिए।”

मैंने कम्मो का हाथ पकड़ा और अंदर लाया। माँ चटाई पर बैठी थीं, सामने पापा की बही रखी थी। उन्होंने कम्मो को देखा और उठकर खड़ी हो गईं।

“तू?” माँ की आवाज़ काँपी। “तू ज़िंदा है?”

“जिंदा हूँ,” कम्मो ने कहा। “बस भूल गई थी कि ज़िंदा होना कैसा लगता है।”

माँ ने उसे गले लगा लिया। दोनों बूढ़ी औरतें एक-दूसरे को पकड़कर रोने लगीं। रीना ने मेरी तरफ़ देखा, आँख में सवाल था।

“बाद में,” मैंने कहा।

चाय पीते वक़्त मैंने बही खोली। आख़िरी पन्ना जहाँ स्याही से पोता हुआ था, वहाँ मैंने लैंप की रोशनी सीधी की। स्याही के नीचे से धुँधले अक्षर उभरने लगे।

“रीना,” मैंने कहा। “फ़ोन की बत्ती इधर कर।”

उसने बत्ती करीब की। स्याही के नीचे एक नाम साफ़ दिखा — सोमनाथ।

“सोमनाथ?” मैंने कहा।

माँ का कप छनकर चटाई पर गिरा। चाय फैल गई, पर उन्होंने उठाया नहीं। वो सीधी मेरी तरफ़ देख रही थीं।

“क्या बोला तूने?” उन्होंने पूछा।

“सोमनाथ,” मैंने कहा। “बही में चौथा नाम यही है।”

माँ उठीं और चूल्हे की तरफ़ गईं, पर कुछ पकाने नहीं लगीं। बस खड़ी रहीं, पीठ मेरी तरफ़।

“तेरे पापा का साथी था,” उन्होंने कहा। “हवेली का मुंशी। हर हिसाब वो अपनी आँखों से देखता था। भवानी के बाप हरि सिंह ने उसे बीस साल पहले शहर से भगा दिया था।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसने हरि सिंह की एक चाल पकड़ ली थी।” माँ पलटीं। “उस रात सोमनाथ ने तेरे पापा से कहा था — ‘कन्हैया, ये हिसाब सीधा नहीं है। इसमें एक नाम ऐसा है जो मरा हुआ दर्ज है, पर ज़िंदा है।’”

मैंने कम्मो की तरफ़ देखा। बूढ़ी ने अपनी गठरी कसकर पकड़ ली।

“वो ज़िंदा नाम मैं थी,” कम्मो ने कहा। “और उसे छिपाने वाला सोमनाथ था।”

“तो सोमनाथ अब कहाँ है?” मैंने पूछा।

माँ ने सिर हिलाया। “पता नहीं। पर एक बात सुन — तेरे पापा ने उसे आख़िरी बार तीन साल पहले फ़ोन किया था। रेलवे फाटक के पार वाली बस्ती में रहता है। भवानी के आदमी तीन दिन से वहाँ आ-जा रहे हैं।”

“तीन दिन से?” मैंने कहा। “यानी जब से मैंने हवेली का काग़ज़ निकाला है।”

“हाँ,” माँ ने कहा। “अब जा। और ध्यान रख — सोमनाथ बोलता कम है, पर उसकी बात सुनकर चलना।”

बंसी दुकान पर चाय पी रहा था और हिसाब के पन्ने पर पेंसिल चला रहा था। मैंने सामने खड़े होकर कहा, “रेलवे फाटक के पार वाली बस्ती। सोमनाथ।”

बंसी की पेंसिल रुकी। उसने पन्ना बंद किया।

“वो बूढ़ा सोमनाथ?” उसने कहा। “जिसके पास भवानी के बाप का काग़ज़ है?”

“हाँ।”

बंसी ने कुल्हड़ नीचे रखा। “मैं उसे जानता हूँ। पिछले हफ़्ते वो मेरी दुकान पर एक कुल्हड़ पीने आया था। बोला था — ‘बंसी, भवानी का हिसाब भारी हो गया है। अब वो खुद भी उसे नहीं सँभाल पा रहा।’”

“तो चल।”

“आज रात?”

“अभी।”

बंसी ने घड़ी देखी। “आठ बज चुके। रास्ता ख़राब है — बारिश से कीचड़।”

“तेरी साइकिल तेज़ है।”

वो हँसा। “तेरी ज़ुबान में पहली बार किसी की तारीफ़ सुनी। चल।”

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