The Token System160 / 1154

The Token System – Chapter 160

7 min read November 6, 2026

“चाचा जी रात को उसके बारे में बोलते हैं,” विक्रम ने कहा। “वो कहता है — ‘वो चीज़ मेरे बाप की थी।’ और दूसरी बात — जब वो डिब्बा खोलने की कोशिश कर रहा था, तब उसकी जेब से कोई चीज़ गरम हुई। मैंने देखा, वो अपनी जेब पकड़कर खड़ा हो गया।”

“और उसने क्या कहा?”

“कुछ नहीं। बस मुँह बिगाड़ा। फिर उसने मुझे नहर के पुल पर भेज दिया।”

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।

“तो दोनों टोकन अब एक साथ नहीं चल पा रहे,” विक्रम ने कहा। “मुझे यही लगा। इसे भी सच दिख रहा है। और वो सच उसे पसंद नहीं आ रहा।”

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था।

“चल,” मैंने कहा।

हम निकले तो धूप अब भी तेज़ थी। बंसी साइकिल पर बैठा। मैंने पीछे की सीट पकड़ी। साइकिल पहले धीरे चली, फिर रफ़्तार पकड़ी। अस्पताल की दीवार पीछे छूटी।

रास्ते में बंसी ने कहा, “उस बूढ़े का क्या करना है?”

“पहले हवेली,” मैंने कहा। “कम्मो गायब है।”

“तो?”

“तो उसे ढूँढना है। वो हवेली में रहती है। उसने सेठ के घर में काम किया है। वो सब जानती होगी।”

“और अगर भवानी उसे पहले उठा ले गया?”

“तो हमें कुछ और करना पड़ेगा।” मैंने टोकन देखा। “पर अभी वो यहीं है। मुझे यक़ीन है।”

हवेली की गली में घुसते ही सामने का दृश्य बदला हुआ था। पिछली बार हम यहाँ रात में आए थे। अब दिन की रोशनी में हवेली की दीवार और भी ढही हुई दिख रही थी। ऊपर की मंज़िल की खिड़कियों में परदे नहीं थे, दरवाज़े हवा में हिल रहे थे।

बंसी ने साइकिल दीवार के सहारे खड़ी की।

“अंदर?”, उसने पूछा।

“अंदर।”

हम मुख्य दरवाज़े से घुसे। अंदर का आँगन सूखा था। बीच में पीपल का पेड़ था जिसकी जड़ें फ़र्श को चीर रही थीं। दाईं तरफ़ की सीढ़ी ऊपर जाती थी।

“कम्मो पिछले कमरे में रहती है,” मैंने कहा। “माँ ने बताया था — पीछे से घूमकर आना पड़ता है।”

हम आँगन पार कर रहे थे, तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।

नहीं — आवाज़ नहीं। मेरे कान के पास कुछ हुआ, जैसे कोई दूर से पुकारा हो।

मैं रुका। हाथ जेब में डाला। टोकन गरम नहीं था। पर मेरी उँगली पर कुछ उभरा — छोटा सा निशान, जैसे तार खींची हो।

“क्या हुआ?”, बंसी ने पूछा।

“कुछ नहीं।” मैंने जेब छोड़ी।

पीछे से घूमकर हम उस हिस्से में पहुँचे जहाँ हवेली का छोटा सा पिछवाड़ा था। रसोई की खिड़की थी — बंद। साथ में एक दरवाज़ा — आधा खुला।

मैंने दरवाज़ा धकेला। अंदर अंधेरा था, और बू का बादल-सी गंध। एक चारपाई, एक टूटी मेज़, और दीवार पर टिन के डिब्बों की कतार।

चारपाई पर कोई बैठा था।

“कौन?”, बूढ़ी आवाज़ आई।

“मैं हूँ,” मैंने कहा। “मनोहर। कन्हैया माली का बेटा।”

अंधेरे में धीरे-धीरे चेहरा बना। बूढ़ी औरत — वही जिससे मैं अस्पताल के पीछे मिला था — चारपाई पर चादर ओढ़े बैठी थी।

“तू,” उसने कहा। “तू यहाँ कैसे?”

“कमलेश ने बताया तू यहाँ रहती है।”

“कमलेश।” उसने सिर हिलाया। “और तेरे साथ ये मोटा?”

“बंसी है,” मैंने कहा। “मेरा दोस्त। तेरे पास कोई नहीं था, इसलिए साथ लाया।”

उसने बंसी को देखा। “बंसी। वही जिसने तहसील में हिसाब लिखा था?”

बंसी सकपका गया। “तू मुझे जानती है?”

“सेठ के घर में सबकी जानकारी रहती थी।” उसने चादर कसी। “मैं तीन दिन से यहीं हूँ। कोई खाना नहीं, कोई पानी नहीं। भवानी के आदमी कल आए थे — दरवाज़ा खटखटाया, मैंने नहीं खोला।”

“तू गायब हो गई थी,” मैंने कहा।

“गायब नहीं,” उसने कहा। “छिप गई। बस छत की सीढ़ी से यहाँ उतरी। भवानी के आदमी रात को आते हैं, आँगन में चक्कर लगाते हैं। उन्हें लगता है मैं भाग गई।”

“तो तू क्यों छिपी थी?”

उसने अपनी गोद से चादर हटाई। उसकी गोद में एक कपड़े की पोटली थी — गहरे लाल रंग का कपड़ा, धूल लगा।

“जब वो डिब्बा लेकर आए,” उसने कहा, “मैंने सुना। भवानी की आवाज़ आई — ‘ताला मेरी चाबी से नहीं खुलता।’ मैं समझ गई — अब वो मेरे पास आएगा। मैं वो हूँ जिसने उस दिन वो डिब्बा सील किया था।”

बंसी ने एक कदम आगे बढ़ा। “तूने डिब्बा सील किया था?”

“सेठ ने,” वह बोली। “सेठ गोवर्धनदास ने। मैं सोलह साल की थी, उनके घर में काम करती थी। उस दिन उन्होंने मुझे चाबी दी और कहा — कम्मो, ये डिब्बा ऊपर के खाँचे में रख आ। मैंने रखा। पर मुझे नहीं पता था कि उसके दो ताले हैं।”

मैं उसके सामने बैठ गया।

“कम्मो,” मैंने कहा। “तेरे पास क्या है?”

“वो सब,” उसने कहा। “जो तेरे पापा ने मुझे दिया था।”

उसने लाल पोटली खोली। उसमें से एक पीला काग़ज़ निकला — मोटा, तीन बार मोड़ा हुआ। और साथ में एक छोटी सी पर्ची।

“ये काग़ज़,” उसने कहा, “तेरे पापा ने मुझे तब दिया था जब भवानी ने उन्हें निकाला था। कहा था — ‘कम्मो, ये जब तक मन्नू बड़ा हो, तू संभालकर रख।’”

मैंने काग़ज़ उठाया। उस पर पापा की लिखाई थी।

“पढ़,” वह बोली। “मेरे सामने पढ़। मैं देखना चाहती हूँ कि तू असली वाला है या भवानी जैसा।”

मैंने पढ़ा —

“चौथा नाम — रामदीन। ये नाम खाते का नहीं, गवाही का है। रामदीन ने हरि सिंह के हर बैनामे पर गवाही दी, पर उसने अपनी ज़मीन नहीं बेची। हरि सिंह ने उसकी ज़मीन बद्री के नाम चढ़ा दी — यानी एक आदमी का नुक़सान दो लोगों पर बाँट दिया। चौथा नाम मेरा है — कन्हैया। मैंने यह हिसाब देखा और चुप रहा। ये बही मैंने इसलिए छिपाई कि मेरा हिस्सा मेरे बेटे को मिले, बिना वो कुछ जाने। मन्नू, जब तू ये पढ़े, मैं नहीं रहूँगा। बस इतना कह — तूने मेरी ग़लती नहीं दोहराई।”

मेरे हाथ काँप रहे थे।

बंसी मेरे पास आया और उसने वो पर्ची उठाई — बही की पर्ची।

“इस पर तीन नाम लिखे हैं,” उसने कहा। “गंगा, सुनीता, और मैं — बंसी।”

“काग़ज़ पढ़,” बूढ़ी ने कहा। “काग़ज़ के पीछे।”

मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे कोना-चिह्न था — वही दो आड़ी-खड़ी लकीरें, बिंदु वाला निशान — और नीचे एक लाइन।

“डिब्बे का दूसरा ताला,” वह बोली, “इसी काग़ज़ से खुलता है।”

“कैसे?”

“जब तू ये काग़ज़ डिब्बे के ऊपर रखेगा, और हिसाब पूरा होगा।”

मैंने पर्ची उठाई।

“और भवानी का क्या?” मैंने कहा। “वो कह रहा है — चौथा नाम जानता है।”

“वो झूठ बोल रहा है,” बूढ़ी ने कहा। “वो चौथा नाम नहीं जानता। वो सिर्फ़ इतना जानता है कि चौथा नाम है, क्योंकि उसके पापा ने भी बही देखी थी। हरि सिंह ने बही पढ़ी, और फिर अपनी नक़ल बनवाई। चौथा नाम उसने मिटा दिया।”

मैंने सिर उठाया। “हरि सिंह ने चौथा नाम मिटाया?”

“हाँ।” उसने कहा। “क्योंकि चौथा नाम तेरे पापा का था। और अगर सबको पता चलता कि माली का नाम खाते में है, तो हरि सिंह का हिसाब सबके सामने आ जाता।”

बाहर आँगन में किसी के चलने की आवाज़ आई। बंसी ने खिड़की से झाँका।

“सफ़ेद कुर्ता,” उसने धीरे से कहा। “दो आदमी।”

“भवानी के?” मैंने पूछा।

“नहीं। कुर्ता सादा है। एक बूढ़ा है, एक जवान।”

बूढ़ी उठ खड़ी हुई। उसने पोटली बाँधी और मेरे हाथ में दी।

“ले,” उसने कहा। “ये अब तेरी है। मैंने साठ साल संभाली। अब मेरा काम ख़त्म।”

“तू कहाँ जाएगी?”

“जहाँ सेठ का कोई बचा हो,” उसने कहा। “कमलेश के पास।”

बाहर की आवाज़ें पास आईं। बंसी ने दरवाज़ा पकड़ा।

“बाहर आओ,” एक आवाज़ आई। “अंदर कोई है।”

बूढ़ी ने मेरी तरफ़ देखा। “भवानी का बूढ़ा,” उसने धीरे से कहा। “ये मुझे ढूँढ लाया।”

मैंने बंसी को इशारा किया। बंसी ने दरवाज़ा खोला। सामने वही बूढ़ा खड़ा था, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में लाठी। साथ में एक जवान, काला कुर्ता।

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