The Token System – Chapter 159
“अब बता,” मैंने उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा। “भवानी ने हवेली में क्या किया?”
विक्रम ने गिलास मेज़ पर रखा।
“उसने मुझे ऊपर वाले कमरे में बैठाया,” उसने कहा। “और एक पीतल का डिब्बा मेज़ पर रखा। छोटा सा, ताले वाला। लाल कपड़े में लिपटा हुआ।”
“ताले वाला?”
“हाँ। दो ताले थे। एक नीचे, एक ऊपर। उसने मुझसे कहा — इसे खोल। मैंने कहा, मुझे क्या पता, ये क्या है। तो वो हँसा।”
“हँसा कैसे?”
“ऐसे जैसे कोई आदमी पुरानी गिनती कर रहा हो। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली और नीचे वाला ताला खोला। ऊपर वाला नहीं खुला।”
विक्रम ने मेरी तरफ़ देखा।
“उसने कहा — ऊपर वाला ताला जिस चीज़ से खुलेगा, वो तेरे पास नहीं। वो मनोहर के पास है।”
सुमन हमारी बात सुन रही थी। उसने कहा, “तो इसका मतलब डिब्बा उसने खोल ही नहीं पाया।”
“नहीं,” विक्रम ने कहा। “और वो इसी से पागल हो रहा था। वो डिब्बे को देखता रहा, फिर मुझे देखता रहा। फिर उसने कहा कि तेरे पापा के पास जो था, वो आज मेरे पास है, पर डिब्बा मेरा नहीं मान रहा।”
“भवानी के पास अपना टोकन है,” मैंने कहा। “वो भी उसी दीवार से आया है।”
“हाँ,” विक्रम ने कहा। “उसने एक बार अपना टोकन मुझे दिखाया था। ठंडा था। सपाट। मुझे लगा नक़ली है। पर वो बोला — असली है, बस हिसाब भारी है।”
सुमन ने कुर्सी की पीठ पकड़ी।
“मन्नू,” उसने कहा। “अब मुझे सच बता।”
“सुमन—”
“तू मुझे बता रहा है कि एक डिब्बा है जो भवानी का टोकन नहीं मान रहा, और उसका ताला तेरे पास है।” उसने मेरी आँखों में देखा। “तो वो चीज़ क्या है जो तेरे पास है?”
इमरजेंसी के दरवाज़े पर एक नर्स आई और सुमन को आवाज़ दी। सुमन ने सिर हिलाया — रुको — और मेरी तरफ़ देखती रही।
“मेरे पास एक चीज़ है,” मैंने कहा। “जो भवानी के पास भी है। और वो चीज़ एक ही जगह से आई है।”
“कहाँ से?”
“हवेली।”
सुमन ने साँस ली। वो कुछ कहती, तभी बाहर से ज़ोर की हॉर्न बजी। लंबी, दो बार।
बंसी दौड़कर अंदर आया।
“सफ़ेद जीप,” उसने कहा। “फाटक पर।”
मैं उठ गया। विक्रम की कुर्सी खड़खड़ाई — वो भी उठने की कोशिश कर रहा था।
“बैठ,” सुमन ने उसे दबा दिया। “तू अभी कहीं नहीं जा रहा।”
भवानी सिंह तीन आदमियों के साथ अंदर आया। इस बार उसके हाथ में लाठी नहीं थी। सफ़ेद कुर्ता, कंधे पर शॉल, और हाथ में एक मिठाई का डिब्बा — वही सुनहरी डिब्बे वाले चमकीले काग़ज़ वाला। इमरजेंसी के कॉरिडोर में उसके जूतों की आवाज़ तेज़ थी।
“डॉक्टर साहिबा,” भवानी ने सुमन को देखकर कहा। “आपने बच्चे को यहाँ रखा है?”
“ये बच्चा नहीं है,” सुमन ने कहा। “ये विक्रम सिंह है। और ये मेरा मरीज़ है।”
भवानी ने डिब्बा मेज़ पर रखा। कॉरिडोर में खड़ी नर्सें हमें देख रही थीं।
“डॉक्टर,” भवानी ने कहा। “ये मेरा भतीजा है। ये घर से भाग गया था। मैं इसे लेने आया हूँ।”
“भतीजा?” विक्रम ने कुर्सी से कहा। “आपने मुझे कमरे में बंद करके रखा था।”
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ नहीं था — जैसे कोई दुकानदार अपनी तराज़ू देख रहा हो।
“बच्चा है,” उसने सुमन से कहा। “डर गया था। कोई बात नहीं। काग़ज़ी कार्रवाई कर दीजिए, मैं इसे ले जाता हूँ।”
सुमन ने काग़ज़ात वाली क्लिपबोर्ड अपने सीने से लगाई।
“जिसे आप ‘काग़ज़ी कार्रवाई’ कह रहे हैं,” उसने कहा, “वो मेडिकल बोर्ड का काग़ज़ है। और मरीज़ के हालात ऐसे हैं कि मैं उसे किसी के हवाले नहीं कर सकती।”
भवानी ने सुमन को देखा। फिर मुझे देखा। फिर विक्रम को। हवा थोड़ी देर रुकी।
“अच्छा,” उसने कहा। “तो मैं अपना काग़ज़ अदालत में पेश करूँगा। कल सुबह। और उसमें ये भी लिखा है कि एक अस्पताल का कर्मचारी, जिसका नाम मनोहर है, बिना किसी अधिकार के दूसरे के मरीज़ को अपने पास रखे हुए है।”
मेरा पेट कड़ा हो गया।
“अदालत में जो सामने आया, वो सामने आया,” सुमन ने कहा। “मरीज़ मेरे पास रहेगा।”
भवानी ने मिठाई का डिब्बा उठाया। वो कुछ कहने वाला था, तभी विक्रम ने कहा —
“चाचा जी।”
भवानी रुका।
“वो डिब्बा आपसे नहीं खुला,” विक्रम ने कहा। “और नहीं खुलेगा। आपने जो मुझे दिया — वो टोकन खोखला है। असली नहीं।”
भवानी की आँखें सिकुड़ीं।
“चुप।” उसने एक लफ़्ज़ में कहा।
“मैंने आपके काम किए,” विक्रम ने कहा। “दो साल। और आपने मुझे नहर के पुल पर बाँधा।”
भवानी ने एक कदम आगे बढ़ा। बंसी उसके और कुर्सी के बीच आ गया।
“ठाकुर साहब,” बंसी ने कहा। “यहाँ सब देख रहे हैं।”
भवानी बंसी को देखकर मुस्कुराया।
“बंसी,” उसने कहा। “तू तो अपनी दुकान पर ठीक था।”
“अब नहीं हूँ,” बंसी ने कहा।
भवानी ने कुछ नहीं कहा। उसने डिब्बा एक आदमी को पकड़ाया और कॉरिडोर की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका और मेरी तरफ़ पलटा।
“मनोहर,” उसने कहा। “तेरे पापा ने मेरे पापा से एक बार कहा था — हिसाब बराबर करने के लिए आदमी अपने ही हाथ जलाता है।”
“और आपके पापा ने क्या कहा था?” मैंने पूछा।
भवानी एक पल रुका।
“मेरे पापा ने कहा था — तो भी किसी को जलाना पड़ेगा।”
वो मुस्कुराया और चलने लगा। फिर दरवाज़े पर रुककर बिना पलटे बोला —
“वैसे, तेरे पापा की बही मैंने पढ़ ली है। जो तू अब तक नहीं पढ़ पाया, वो चौथा नाम मैं जानता हूँ।”
मेरे पैर जम गए।
वो चला गया। जीप का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ।
सुमन ने विक्रम की तरफ़ देखा। “तू ठीक है?”
“वो चौथा नाम क्या है?” मैंने कहा।
विक्रम ने गर्दन हिलाई। “मुझे नहीं पता। उसने मुझसे कभी नहीं कहा।”
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। “मन्नू, हवेली चल।”
“रुक,” सुमन ने कहा। “पहले ये बता — बही का आख़िरी पन्ना पोता हुआ था, तूने बताया था। उस पर चार नाम थे। तीन नामों की सूची माँ ने दी थी। चौथा कहाँ है?”
“मैंने लैब में स्याही हटवाकर पढ़ा था,” मैंने कहा। “उस पन्ने पर चार लकीरें थीं। तीन नाम पढ़े गए — गंगा, सुनीता, बंसी। चौथी लकीर के नीचे का नाम पूरा मिटा हुआ था। सिर्फ़ एक अक्षर बचा था।”
“कौन सा?”
“र।”
सुमन ने कुछ सोचा।
“र,” उसने कहा। “रामदीन? रामलाल? रमेश?”
“या राखी?” विक्रम ने कहा।
मेरी साँस रुकी। “राखी मेरी बहन का दूसरा नाम है।”
“मुझे पता है,” सुमन ने कहा। “तूने बताया था।”
बंसी ने कुर्सी खींची और बैठ गया।
“ये मत सोच,” उसने कहा। “भवानी धमकी देने के लिए नाम लेता है। वो चाहता है कि तेरे पैर काँपें।”
“पर उसने कहा कि मैंने बही पढ़ ली है,” मैंने कहा।
“कहने से पढ़ ली नहीं हो जाती,” बंसी ने कहा। “वो तुझे उलझाने आया था। अगर उसे सच पता होता, तो वो कहकर जाता?”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने सुमन वाली बात कही।
“वो नाम जानता है या नहीं, ये बाद में,” उसने कहा। “पहले ये सोच — तेरे पास क्या है जो उसके पास नहीं?”
“हवेली,” मैंने कहा।
“तो हवेली जा,” सुमन ने कहा। “विक्रम मेरे पास है।”
मैंने बंसी को देखा। बंसी ने साइकिल की चाबी उठाई।
दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते वक़्त विक्रम ने मेरा हाथ पकड़ा।
“मन्नू,” उसने कहा। “अब मुझे कुछ बताना है।”
“अभी?”
“तेरे पास जो चीज़ है,” उसने धीरे से कहा, “वो गरम होती है?”
मैं चौंका।
“तू जानता है?”
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