The Token System – Chapter 155
"पता है," मैंने कहा।
अस्पताल की बाहरी सीढ़ियों पर उतरा। रात की हवा बदली हुई थी — हल्की ठंडी, पुरानी बस्ती की तरफ़ से आ रही थी। पार्किंग के कोने पर एक बत्ती जल रही थी, उसके नीचे कुछ चमक रहा था।
तभी सामने की सड़क पर तेज़ रोशनी आई। एक सफ़ेद जीप आकर रुकी। ब्रेक की आवाज़ ने चुप्पी में सुराख़ कर दिया।
दरवाज़ा खुला। भवानी उतरा।
शेरवानी नहीं थी आज। सादा सफ़ेद कुर्ता था, और चेहरे पर एक अलग तरह का सुकून। वो मेरी तरफ़ चला और उसके पीछे जीप से एक लड़का उतरा — दुबला, सोलह-सत्रह साल का, आँखें झुकी हुईं।
मैंने उसे पहचाना। विक्रम।
पर विक्रम जीप में भवानी के साथ? भवानी का बेटा, जिसे मैंने कभी देखा नहीं था, जिसका नाम पहली बार मैंने थाने में सुना था!
भवानी मेरे पास आया और रुका। मुझसे दो हाथ की दूरी पर।
"मनोहर," उसने कहा। पर आज नाम में वो डाँट नहीं थी।
"क्या चाहिए, ठाकुर साहब?" मैंने पूछा।
वो मुस्कुराया। ऐसी मुस्कान जिसमें शक्ल तो अपनी थी, पर मतलब किसी और का था।
"बेटा, अब बात बढ़ गई है," उसने कहा।
"बात तो कब की बढ़ गई थी। आपको आज नज़र आई?"
"नज़र कब की आ गई थी।" उसने जीप के पास खड़े लड़के की तरफ़ इशारा किया। "पर आज मैं तुझसे काग़ज़ लेने नहीं आया। आज मैं तुझसे कुछ और लेने आया हूँ।"
"क्या?"
"तू मेरी तरफ़ से आएगा। एक बार। बस एक बार। जो मैं कहूँ, वो करेगा। बदले में —" वो मेरी तरफ़ झुका — "तेरी माँ, तेरी बहन, तेरी शादी, तेरी नौकरी। सब कुछ, जैसा तू चाहेगा।"
मेरे मुँह से पहले हँसी निकली।
"ठाकुर साहब, आप मुझे खरीद रहे हैं? मेरे पास कुछ है क्या जो बिके?"
"तू खुद है," उसने कहा। "तेरे पापा भी थे। मैंने उन्हें खरीदना चाहा था। वो बिके नहीं।" एक पल रुका। "और देख, वो कहाँ है आज।"
मेरी उँगलियाँ सख़्त हो गईं। पर मैं चुप रहा।
तभी उसके पीछे खड़े लड़के ने सिर उठाया। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।
और उसने धीरे से कहा — "मुझे बचा लो।"
भवानी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। जैसे सुना ही न हो।
"क्या कहा तेरे बेटे ने?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं।" भवानी ने हाथ बढ़ाकर लड़के का कंधा पकड़ा। "ये बीमार है। डॉक्टर के पास लाया हूँ।"
"ये बीमार नहीं है।" मैंने लड़के की तरफ़ देखा। "तू डरा हुआ है।"
लड़के ने होंठ हिलाए, पर भवानी की पकड़ उसके कंधे पर तेज़ हुई।
"मनोहर," भवानी ने कहा। "तूने सुना नहीं? मैंने कहा — ये मेरा बेटा नहीं।"
वो रुका। उसकी उँगलियाँ लड़के के कंधे से खिसककर उसकी कलाई तक आ गईं और उसने ज़ोर से खींचा।
"ये मेरा हिसाब है।"
जीप के पास खड़ा लड़का झुक गया। भवानी उसे खींचकर गाड़ी की तरफ़ ले गया। दरवाज़ा खुला, वो अंदर धकेला गया। भवानी ने एक बार पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
"सुबह नौ बजे, तहसील का पुराना कमरा," उसने कहा। "अगर तब तक तेरा फ़ैसला नहीं आया, तो मैं मान लूँगा — तूने अपने पापा का रास्ता चुना।"
जीप चली गई।
मैं सीढ़ियों पर खड़ा रहा। हवा अब भी ठंडी थी।
पीछे से बंसी की साइकिल की घंटी बजी। वो साँस फूलता हुआ आया।
"देखा," वो बोला। "मैंने देखा। वो लड़का — विक्रम — वो उसके साथ था!"
"हाँ।"
"तो अब क्या?"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन निकाला। पीतल पर अब भी आठ हज़ार लिखा था — पर अब मैं उसे अंक की तरह नहीं देख रहा था।
"मुझे विक्रम चाहिए," मैंने कहा। "सुबह नौ बजे से पहले।"
"कहाँ से?"
"वही बताएगा जो उसे जानता है।" मैंने टोकन जेब में रखा। "माँ ठीक है?"
"रो रही है, पर बैठी है रीना के पास। तुझे याद किया।"
"जा," मैंने कहा। "उन्हें बोल — मैं आ रहा हूँ। और बंसी —" मैंने उसकी तरफ़ देखा — "कल की कोई बात नहीं। आज रात विक्रम को ढूँढना है।"
बंसी ने टोकन की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तूने उस लड़के की आँखें देखीं?" उसने पूछा।
"देखी।"
"वो मदद माँग रहा था।"
"पता है," मैंने कहा। "और पहली बार भवानी ने किसी चीज़ को अपना नाम दिया — पर बेटा नहीं कहा। हिसाब कहा।"
बंसी ने सिर हिलाया। हम दोनों सीढ़ियों से उतरे। पार्किंग की बत्ती हमारे पीछे बुझ गई।
बंसी ने साइकिल उठाई। मैंने उसका हैडल पकड़ा।
"तू अस्पताल जा। माँ और रीना के पास रह। छोटू को भी देख लेना।"
"और तू?"
"मैं हवेली जा रहा हूँ।"
बंसी रुक गया। साइकिल उसके हाथ से ढीली पड़ी।
"हवेली? इस वक़्त? मन्नू, वहाँ रात को कोई नहीं जाता।"
"भवानी रात को यहाँ आया," मैंने कहा। "तो मतलब नियम सिर्फ़ मेरे लिए नहीं हैं।"
"पर अकेला?"
"अकेला नहीं।" मैंने उसकी साइकिल की तरफ़ इशारा किया। "तेरे पास साइकिल है। मुझे अस्पताल छोड़ दे। फिर जैसे भी हो, मैं हवेली का रास्ता पकड़ूँगा।"
बंसी ने कुछ सोचा, फिर बैठ गया। मैं पीछे बैठा। सड़क सुनसान थी, दुकानें बंद, बस एक चाय की दुकान पर लालटेन जल रही थी। साइकिल की चेन चटचटा रही थी और बंसी पैडल मार रहा था। रास्ते भर हम दोनों में कोई बात नहीं हुई।
अस्पताल के गेट पर बंसी ने साइकिल रोकी। अंदर से बत्ती की रोशनी आ रही थी। मैं उतरा और सीधे छोटू के कमरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर एक नर्स खड़ी थी। उसने मुझे रोका।
"मिलने का वक़्त नहीं है।"
"मैं उसका भाई हूँ।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी। तभी अंदर से छोटू की आवाज़ आई — कमज़ोर, पर साफ़।
"दीदी, उसे आने दो।"
नर्स ने रास्ता दिया। मैं अंदर गया। छोटू बिस्तर पर लेटा था। उसका सिर पट्टी से बंधा था, हाथ पर पट्टी थी, पर आँखें खुली थीं। मेरी आँखें भर आईं, पर मैंने खुद को रोका।
"तूने बहुत डराया," मैंने कहा।
उसने मुश्किल से मुस्कुराया। "तू आ गया, तो डर कैसा?"
"क्या हुआ था?"
"मुझे कुछ याद नहीं।" उसने आँखें झुका लीं। "बस इतना — पीछे से किसी ने धक्का दिया। फिर अँधेरा।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। मैंने उसका सिर सहलाया।
"अब कुछ नहीं होगा।"
"पापा की घड़ी?" उसने अचानक पूछा।
मैं चुप रहा।
"टूट गई?" उसकी आवाज़ धीमी हुई।
"चश्मे का शीशा टूटा है। मशीन चल रही है।"
उसके चेहरे पर थोड़ा सुकून आया। "फिर ठीक है। बाबा की घड़ी चलती रहे, बस।"
मेरा गला भर आया। मैंने उसका हाथ थामा और बाहर आ गया। बाहर आकर देखा, रीना दरवाज़े के बाहर बेंच पर बैठी थी। उसने मुझे देखा और उठ खड़ी हुई।
"माँ?" मैंने पूछा।
"सो गईं। बहुत रोईं, फिर थक कर सो गईं।" वो मेरे पास आई और धीरे से बोली — "मन्नू, वो लोग घड़ी के लिए नहीं आए थे।"
"तुझे कैसे पता?"
"वो जाते वक़्त बोले — 'चाबी लेकर आएँगे, वरना ज़बरदस्ती ले लेंगे।' और फिर एक बोला — 'काग़ज़ भी साथ में।' मैंने पूछा कौन सा काग़ज़। वो हँसा और बोला — 'जो तेरे बाप ने छिपाया है।'"
मेरे पैर जम गए। पापा ने कुछ छिपाया था। घर में, हवेली में, या अपने सीने में?
"माँ को इस बारे में कुछ पता?"
"माँ रो रही थीं।" रीना ने होंठ भींचे। "उन्होंने कहा — 'तेरे बाप ने एक राज़ लेकर हमें छोड़ा है।'"
मैंने कमरे की तरफ़ देखा। माँ बेंच पर लेटी थीं, सिर रीना की शॉल पर टिका था। उनके हाथ में अब भी वो पुरानी क़िताब थी, जो वो बच्चों को पढ़ाने के लिए रखती थीं। नींद में भी उसे पकड़े हुई थीं।
"तू यहीं रह," मैंने रीना से कहा। "माँ के पास। छोटू के पास। मैं सुबह नौ बजे से पहले लौटूँगा।"
"कहाँ जा रहा है?"
"हवेली। पापा का राज़ ढूँढने।"
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