The Token System154 / 1154

The Token System – Chapter 154

7 min read November 6, 2026

मैं बाहर निकला। लालाजी साँस फूलती हुई खड़े थे। उनके हाथ में एक काग़ज़ था। और उनके पीछे… उनका बेटा अंकित था, जिसका चेहरा पीला पड़ा था।

“लालाजी?” मैंने कहा।

“मन्नू,” लालाजी ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ये… ये तेरे घर के बाहर पड़ा मिला।”

मैंने काग़ज़ लिया। उस पर सिर्फ़ एक वाक्य था —

“शादी का लड़का हाँ करेगा, तो शादी वाली की माँ नहीं बचेगी।”

रीना पीछे से आई और उसने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा। मैंने तुरंत काग़ज़ मोड़ लिया, पर वो पढ़ चुकी थी।

अंकित आगे आया। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। “मन्नू भाई, ये काग़ज़ आपके घर की दीवार पर अटका मिला। मैंने अभी देखा। मुझे लगा —”

“तू सही लेकर आया,” मैंने कहा।

अंकित ने लालाजी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। “मेरे पापा आज रामावत जी के पास जा रहे हैं। मैं भी साथ जाऊँगा। और मैं मुँह नहीं मोड़ूँगा।” उसने लालाजी की तरफ़ देखा। “पापा, अगर आपने फिर मुँह मोड़ा, तो मैं वो काग़ज़ भी दिखा दूँगा जो ज़मीन के काग़ज़ों वाली फ़ाइल में है। मेरे नाम पर फँसाया हुआ केस।”

लालाजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

“तू—” उन्होंने कहा, पर आगे कुछ नहीं बोले।

अंकित मेरी तरफ़ मुड़ा। “मन्नू भाई, कल आप जो भी करो, मैं साथ हूँ। पर आज शाम —” उसने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया — “ये मत भूलो।”

मैंने सिर हिलाया। लालाजी ने अंकित का हाथ पकड़ा और खींचकर ले गए।

बंसी मेरे पास आया। “मन्नू, सुन। दस बजे हवेली। ये जाल है।”

“माँ है,” मैंने कहा। “मैं जाऊँगा।”

“मैं साथ चलूँगा।”

“नहीं।” मैंने उसकी तरफ़ देखा। “पर्ची कहती है अकेले। माँ की जान है। मैं अकेले जाऊँगा।”

“तो मैं पीछे-पीछे रहूँगा,” बंसी ने कहा। “बाहर। दूर। मगर वहाँ।”

रीना ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ ठोस। “तू काग़ज़ लेकर जाएगा?”

मैंने एक पल सोचा।

“काग़ज़ अपने पास रखूँगा,” मैंने कहा। “और माँ को लेकर आऊँगा।”

रीना ने मेरा हाथ छोड़ा। उसने माँ की साड़ी मेरे कंधे पर लपेट दी। फिर कमरे के कोने से उसने पापा की घड़ी उठाई — वो घड़ी जिस पर तीन निशान खुदे थे — और मेरी जेब में रख दी।

“ये भी ले जा,” उसने कहा। “पापा आज तेरे साथ है।”

उसने फिर कुछ नहीं कहा। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और चुपचाप सिर हिलाया।

जब मैं बाहर निकला, आसमान का रंग बदल चुका था। पहला पीला रंग पुरानी बस्ती की छतों पर उतर रहा था।

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। बिलकुल ठंडा।

जैसे कह रहा हो — इस बार हिसाब मेरे हाथ में नहीं, सामने वाले के हाथ में है।

पर फिर, मेरी उँगली जैसे ही टोकन से टकराई, वो ज़रा देर को गरम हुआ। एक पल को। सिर्फ़ एक पल।

और मैंने महसूस किया — जैसे किसी ने धीरे से कहा हो, “साथ चल।”

॥

मैंने हवेली के पीछे वाली गली का मोड़ लिया तो सामने बंसी की साइकिल खड़ी थी। वो खुद मोड़ से दूर पेड़ के पीछे खड़ा था, मुँह हाथ से ढके हुए।

"अरे, तू यहाँ क्यों खड़ा है?" मैंने धीरे से कहा।

"देख रहा हूँ," उसने बत्तीसी निकाली। "दो आदमी गली के नुक्कड़ पर हैं। बैठे हैं, बीड़ी पी रहे हैं। एक भीतर गया था, वो अभी लौटा।"

"माँ?"

"गली में तीसरे मकान की छत पर है। वहाँ से रोशनी आ रही है। मुझे लगता है, उसी में हैं।"

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, बस उँगली के नीचे उसका कोना चुभ रहा था। मैंने घड़ी देखी। दस बजने में चार मिनट थे।

"तू यहीं रह," मैंने कहा। "मैं अंदर जा रहा हूँ।"

"मैंने कहा था ना, पीछे रहूँगा। पर मन्नू…" बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी। "ये लोग पर्ची लिखकर नहीं बुलाते। कुछ माँगेंगे।"

"माँगेंगे तो देखेंगे।"

मैं गली में घुसा। तीसरे मकान का दरवाज़ा आधा खुला था। मैंने धक्का दिया तो अंदर से सिटकनी लगी थी। ताला नहीं, बस लोहे की सिटकनी। मैंने कंधा लगाया। दो बार में टूटकर गिरी।

अंदर रोशनी थी। एक लालटेन जल रही थी, और उसके पीले उजाले में माँ चारपाई के कोने पर बैठी थीं। चारों तरफ़ चीज़ें बिखरी थीं — काग़ज़, एक टूटी कुर्सी, कोई पुराना बक्सा खुला पड़ा था।

"माँ!"

मैं दौड़कर पहुँचा। उन्होंने सिर उठाया। चेहरे पर डर नहीं था। थकान थी।

"तू आ गया," उन्होंने कहा।

"कुछ किया किसी ने? हाथ लगाया?"

"नहीं।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "दो आदमी थे। एक बोलता नहीं था, दूसरा बोलता था। कह रहे थे — हवेली की चाबी दे दे, और वो काग़ज़ दे दे जो तेरे आदमी ने छिपाया है।"

"तूने क्या कहा?"

"मैंने कहा — मेरे पास कुछ नहीं। तो वो बोला, तो तेरा बेटा लाएगा।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने कहा — तो लाओ। मैं बैठी हूँ।"

मैं कुछ बोलने ही वाला था कि मेरी नज़र फ़र्श पर पड़ी। पापा की घड़ी पड़ी थी — नहीं, टूटी पड़ी थी। शीशा चकनाचूर, और उसके अंदर की सुइयाँ टेढ़ी होकर बाहर आ गई थीं।

"ये कैसे हुआ?" मैंने घड़ी उठाई।

"उनमें से एक ने मेरा हाथ पकड़ा," माँ ने कहा। "तो मैंने झटका दिया। घड़ी जेब से गिरी। वो झुका, उसने उसे मेरी तरफ़ धकेला और बोला — 'इसका हिसाब तेरा बेटा समझेगा।' फिर दोनों गए।"

मैंने टूटी घड़ी को जेब में रखा। उसका शीशा नहीं था, पर पीछे जो तीन नाम खुदे थे, वो साबुत थे।

"माँ, अब तू घर चल।" मैंने कंधे से साड़ी उतारी और उन्हें ओढ़ाई। "रीना रास्ते पर मिलेगी।"

"तू?" उन्होंने सवाल किया।

"मुझे अस्पताल जाना है। छोटू को देखना है।"

"छोटू?" माँ रुकीं। "काकी का पोता? उसे क्या हुआ?"

मैंने उन्हें छत के मलबे की बात छोटी में बताई। सुनकर वो चुप रहीं, फिर बोलीं, "जा। देख आ। और मन्नू —" उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी — "वो काग़ज़ जो तेरे पास है। उसे किसी को मत देना। भवानी को तो कभी नहीं।"

"तू जानती है वो क्या है?"

"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर तेरा पापा ने उसे आख़िरी रात अपनी जेब में रखा था। बस इतना याद है।"

बंसी दरवाज़े पर आ गया था। उसने माँ को अपनी साइकिल की पीछे बैठाया और रीना की तरफ़ रवाना किया। मैं उल्टी तरफ़ मुड़ा — अस्पताल की तरफ़।

रात के ग्यारह बज चुके थे जब मैं अस्पताल पहुँचा। इमरजेंसी की रोशनी में छोटू का पलंग दिख रहा था। पैर पर पट्टी बँधी थी, आँखें खुली थीं।

"मन्नू भैया!"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। बुख़ार नहीं था।

"डॉक्टर दीदी ने कहा — मैं जल्दी ठीक हो जाऊँगा।" उसने उँगली उठाई। "पर दादी रो रही थीं। मैंने कहा — मत रो, मन्नू भैया आएँगे।"

"तूने सही कहा।"

"भैया —" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "वो आदमी, जो स्कूल के पीछे था… वो आज फिर आया था?"

"कहाँ?"

"अभी। तुम आने से पहले। वो खिड़की के बाहर से झाँका। मैंने आँख बंद कर ली। फिर चला गया।"

मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर अँधेरा था।

"तू आँख बंद किए रह, कुछ नहीं होगा," मैंने कहा। "मैं अभी आया।"

बाहर निकला तो सुमन ड्यूटी की मेज़ पर खड़ी थी, हाथ में फ़ाइल।

"छोटू ठीक है?" मैंने पूछा।

"हड्डी जुड़ रही है। तीन हफ़्ते में चलने लगेगा।" उसने फ़ाइल बंद की। "पर एक बात सुन। उसकी जाँघ पर जो पुराना निशान था — मैंने उसके बारे में काकी से पूछा। काकी बोलीं, वो एक साल पहले तब गिरा था जब भवानी के आदमी उन्हें ज़मीन के काग़ज़ के लिए डराने आए थे। छोटू भागा था और नाली में गिरा।"

मेरी मुट्ठी भिंच गई।

"आज किसी ने छोटू को यहाँ तक छुआ तक नहीं," सुमन ने कहा। "मैंने फाटक पर जवान लगा दिया है। पर मन्नू —" उसने मेरी तरफ़ देखा — "भवानी ऐसे मौक़े नहीं छोड़ता।"

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