The Token System153 / 1154

The Token System – Chapter 153

6 min read November 6, 2026

शांति एक पल के लिए चुप हुई, फिर उसने आवाज़ तेज़ की। “तो क्या मैं झूठ बोल रही हूँ?”

“तुम झूठ नहीं बोल रही,” राजेंद्र ने शांति की तरफ़ देखकर कहा, “तुमसे ये काग़ज़ लिखवाया गया है।” उसने काग़ज़ उठाकर पलटा। “ये शिकायत कल रात दो बजे दर्ज हुई।”

“तो देर कहाँ हुई?” शांति की आवाज़ लड़खड़ाई।

“देर ये हुई,” राजेंद्र ने धीरे से कहा, “कि कल रात दो बजे तुम्हारे मोहल्ले में उजाला था, पानी भरा था, और मेरे दो सिपाही वहाँ गश्त पर थे। उनका नाम लिखा है — कौन सी रात, कौन सी गली।” उसने काग़ज़ मेज़ पर रखा। “और तुम्हारी शिकायत पर लिखने वाले का नाम भी लिखा है।”

शांति का रुमाल गिर गया।

“किसने लिखवाया?” मैंने पूछा।

राजेंद्र ने पीछे मुड़कर एक सिपाही को बुलाया। “सिपाही, लिख लो — शिकायत लिखवाने वाले का नाम।”

सिपाही ने रजिस्टर खोला। शांति खड़ी हो गई, हाथ जोड़े। “साहब, मैं गरीब औरत हूँ। मेरे दो बच्चे हैं। मुझे कुछ नहीं पता।”

“नाम,” राजेंद्र ने कहा।

शांति ने होंठ कसकर सोचा, फिर बोली। “भवानी जी के मुंशी आए थे। बोले — सिर्फ़ अंगूठा लगाओ, बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च मिल जाएगा। मैंने अंगूठा लगा दिया। पढ़ने को नहीं आई थी।”

सिपाही लिखता रहा।

तभी थाने के बाहर गाड़ी का ब्रेक लगा और अंदर आई — काकी। एक हाथ में डंडा, दूसरे में छोटू का स्कूल बैग टँगा था। उसके पीछे रमेश गुड़िया का हाथ पकड़े खड़ा था।

“कौन लिखवा रहा है मेरी ज़मीन के ख़िलाफ़?” काकी की आवाज़ भारी थी। “शांति, तू?”

शांति ने मुँह फेर लिया।

काकी मेरी तरफ़ आई, मेरा हाथ पकड़ा और सीधा राजेंद्र के सामने खड़ी हो गई। “साहब, सुन लो। मेरी छत इसने नहीं गिराई। मैं उस रात अस्पताल में थी — इसकी बहन के साथ, जो मेरे छोटू का खून देख रही थी। इसे कोसने वाले उस वक़्त ये कहाँ थे?”

राजेंद्र ने सिपाही को इशारा किया। “लिख लो।”

शांति आगे बढ़ी और राजेंद्र की मेज़ के पास झुकी। “साहब, मुझे माफ़ कर दो। मुझे डराया गया था। कहा गया — बोल देना, और बच्चों का राशन कार्ड चलता रहेगा।”

“किसने कहा?” राजेंद्र ने पूछा।

“मुंशी ने। भवानी जी के। कुर्ता पहना, चश्मा था। बोला — बस एक काग़ज़ है।”

राजेंद्र ने काग़ज़ उठाया और उस पर लिखे नाम को ज़ोर से पढ़ा। “शिकायतकर्ता — शांति देवी। गवाह — रामलाल।” वो रुका। “रामलाल? वही रामलाल जो कल रात हमारे सामने हवेली में था?”

मेरी जेब में टोकन ठंडा था, बिलकुल ठंडा। मैंने उसे नहीं छुआ।

“रामलाल अब नहीं है,” राजेंद्र ने काग़ज़ मोड़कर रख दिया। “ये शिकायत रद्द। सिपाही, अलग रजिस्टर खोलो — जो शिकायतें आजकल ऐसे ही आ रही हैं, उन सब पर एक लाइन लिखो — नाम, तारीख़, लिखवाने वाला। जब एक-एक का हिसाब आएगा, तब पता चलेगा कि किसने कितना लिखवाया।”

शांति रोने लगी। काकी ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोली, बस गुड़िया को अपनी साड़ी में समेट लिया।

मैं बाहर निकला। सीढ़ियाँ उतरते ही बंसी ने कहा, “देखा? यही तो चल रहा है। उन्हें शिकायत से मतलब नहीं, उन्हें सिर्फ़ रजिस्टर का वो पन्ना चाहिए जिस पर तेरा नाम है। हर शिकायत एक पन्ना भरती है।”

“तो?”

“तो अगले महीने कोई कहेगा — इतनी शिकायतें हैं इस आदमी के ख़िलाफ़, इसे बैठा दो।”

मैंने हवा में साँस ली। “अभी तो रद्द हुई।”

“एक हुई,” बंसी ने कहा। “नौ बाकी हैं।”

मैं उसकी तरफ़ मुड़ा ही था कि मेरा फ़ोन बजा।

स्क्रीन पर रीना का नाम था। समय देखा — साढ़े तीन बजे। रीना इस वक़्त स्कूल में होती थी।

“हाँ?”

आवाज़ घबराई हुई थी, साँस फूली हुई। “भाई… तू कहाँ है?”

“थाने के बाहर। क्या हुआ?”

“भवानी के आदमी आए थे। दो। सफ़ेद कुर्ता।”

मेरा हाथ सीढ़ी की रेलिंग पर जम गया। “कब? क्या हुआ? माँ ठीक है?”

“माँ ठीक है,” रीना ने कहा, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी। “पर भाई… वो काग़ज़ माँग रहे थे। माँ ने दरवाज़ा नहीं खोला। अंदर से बोली — कुछ नहीं है मेरे पास। फिर वो दरवाज़ा पीटने लगे। मैं अंदर थी, मैंने बंसी के खोखे से फ़ोन किया।”

“माँ ने दरवाज़ा नहीं खोला? अब कहाँ है?”

“अंदर है। बोल नहीं रही। मैं जब से आई, वो चारपाई पर बैठी है और हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदा रही है।”

मेरी छाती धक-धक करने लगी। “तू वहीं रुक। दरवाज़ा न खोलना। मैं आ रहा हूँ।”

फ़ोन काटकर मैं भागा। बंसी पीछे-पीछे।

“क्या हुआ?”

“घर। भवानी के आदमी। माँ ने दरवाज़ा नहीं खोला।”

बंसी की चाल तेज़ हो गई। “कितने आदमी?”

“दो।”

“तो वो अभी गए नहीं होंगे। वो इंतज़ार करते हैं। मन्नू, सुन — सीधा घर मत जा। पहले पीछे की गली से जाकर देख।”

“मैं अपनी माँ के पास जा रहा हूँ, बंसी।”

“और मैं तुझे बता रहा हूँ — अगर तू सीधा गया और उन्होंने तुझे देख लिया, तो वो माँ को छोड़कर तेरे पीछे पड़ेंगे।” उसने मेरा हाथ पकड़ा। “पीछे की गली से जा। वहाँ से घर का पिछला दरवाज़ा दिखता है। मैं सामने से आता हूँ।”

मैंने एक पल सोचा। फिर सिर हिलाया और मुड़ गया।

पीछे की गली में पानी अभी सूखा नहीं था। मैं दीवार से लगकर चला। घर की पिछली दीवार दिखी — वही दीवार जिसके सातवीं ईंट के पीछे छिपी सीढ़ी थी। मैंने तेज़ी से ईंट हटाई, अंदर घुसा।

दरवाज़ा बंद था। मैंने धक्का दिया। अंदर अंधेरा था। कमरे की हवा भारी थी।

“माँ?” मैंने धीरे से कहा।

कोई जवाब नहीं।

पैर आगे बढ़ाए। चारपाई दिखी। खाली थी।

“माँ?” आवाज़ ऊँची हो गई।

मैंने माचिस जलाई। लौ में देखा — कमरा खाली था। चारपाई पर सिर्फ़ एक साड़ी पड़ी थी — माँ की। उसी साड़ी के पल्लू से एक लिफ़ाफ़ा आधा बाहर झाँक रहा था।

मैंने उसे उठाया। लिफ़ाफ़े पर माँ की लिखाई नहीं थी। कोई लिखाई ही नहीं थी। पर उस पर वही निशान था — दो आड़ी-खड़ी लकीरें और बीच में एक बिंदु।

टोकन का कोना-चिह्न।

मैंने लिफ़ाफ़ा फाड़ा। अंदर एक पर्ची थी। पर्ची पर सिर्फ़ एक लाइन —

“सरोज हमारे साथ है। काग़ज़ लेकर हवेली के पीछे वाली गली में आज रात दस बजे आ। अकेले। पुलिस लाई, तो सरोज वापस नहीं आएगी।”

मेरे हाथ से पर्ची फिसल गई।

मैं कमरे से बाहर निकला। आँगन में सन्नाटा था। घर के सामने का दरवाज़ा अंदर से बंद था, पर उसकी कुंडी टूटी हुई थी — जैसे ज़ोर से खोला गया हो।

“मन्नू!”

बंसी दरवाज़े से घुसा। उसके पीछे रीना थी — आँखें डबडबाई हुई।

“माँ?” रीना ने मेरी तरफ़ देखा, फिर कमरे में झाँका। “माँ कहाँ है?”

मैंने पर्ची उसकी तरफ़ बढ़ाई।

रीना ने पढ़ा। उसका चेहरा पत्थर हो गया।

“माँ को उठा ले गए?” उसकी आवाज़ बैठ गई।

“रो मत,” मैंने कहा। “उन्हें कुछ नहीं होगा। उन्हें माँ से मतलब नहीं।”

“तो माँग क्या है?”

“काग़ज़,” बंसी ने कहा। “वो चाहते हैं कि हम उन्हें हवेली में काग़ज़ दें।”

“मैं काग़ज़ देने वाला नहीं हूँ,” मैंने कहा।

रीना ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब सिर्फ़ डर नहीं था, एक सीधा सवाल था। “भाई, तू जाएगा?”

मैंने उसकी तरफ़ देखा। “दस बजे।”

रीना एक पल चुप रही। फिर उसने चारपाई से माँ की साड़ी उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। “ये ले जा।” उसकी आवाज़ बैठी थी, पर साफ़ थी। “माँ की है। जब मिले, माँ को ओढ़ा देना।”

मैंने साड़ी ली।

तभी सामने की गली से आवाज़ आई। कोई चिल्ला रहा था। बंसी दौड़कर दरवाज़े पर गया और बाहर झाँका।

“मन्नू, लालाजी हैं।”

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