The Token System152 / 1154

The Token System – Chapter 152

7 min read November 6, 2026

"हाँ।" सुमन ने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। "भवानी ने खुद ये गिराया या कोई गिरा गया, पता नहीं। पर ये साफ़ है कि भवानी आज रात रामदीन के पास जाने वाला है। चौकीदार के रजिस्टर में लिखा था — बद्री की फ़ाइल कल। मतलब भवानी को पता है कि काग़ज़ किसी के पास है, और वो किसी के पास है — रामदीन के पास।"

"तो हमें रामदीन से पहले पहुँचना है," मैंने कहा।

"हमें?" सुमन ने कहा। "मैं ड्यूटी पर हूँ, मन्नू। छोटू का इलाज मेरे हाथ में है। मैं तेरे साथ नहीं चल सकती।"

"तो बंसी को ले जाऊँगा।"

तभी पीछे से किसी के जूतों की आवाज़ आई। वार्ड के गलियारे से एक सिपाही आ रहा था — खाकी में, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा।

"मनोहर जी?" उसने कहा।

"हाँ।"

"थाने से आया हूँ।" उसने लिफ़ाफ़ा आगे किया। "आपके नाम की शिकायत आई है — काकी के मकान की छत गिराने की। कहा गया है कि आपने रात में छत पर कुछ किया। आपको थाने चलना होगा।"

मेरे हाथ में सुमन की दी पर्ची थी। मैंने उसे मुट्ठी में दबा लिया।

"सिपाही जी," सुमन ने आगे आकर कहा, "ये मरीज़ का इलाज चल रहा है। ये छोटू का… ये इसके साथ रात भर था।"

"मैम, मुझे हुक्म मिला है," सिपाही ने कहा। "लिफ़ाफ़े में काग़ज़ है। आप चाहें तो देख लें।"

सुमन ने लिफ़ाफ़ा खोला। एक काग़ज़ निकला, जिस पर साफ़ लिखा था — "मनोहर उर्फ़ मन्नू, रामगंज। कल रात काकी के मकान की छत पर चढ़ा, उसे जान-बूझकर कमज़ोर किया।" नीचे शिकायतकर्ता का नाम था — रामलाल, चौकीदार।

"रामलाल?" मैंने कहा। "कौन रामलाल?"

"पता नहीं," सिपाही ने कहा। "मुझे सिर्फ़ लाने को कहा गया है।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो दुश्मन की चाल समझने पर आता है।

"मन्नू," उसने धीरे से कहा, "रामलाल वही है, जो भवानी के होम का पुराना चौकीदार था, और अब हवेली का माली है। इससे पहले वो तेरे पास पहुँचे, उसे थाने भेजना भवानी की चाल है।"

"तो क्या करें?"

"तू चल सिपाही के साथ," सुमन ने कहा। "मैं और बंसी रामदीन के पास जाएँगे। पर मन्नू — थाने में जो भी हो, कुछ मत बोलना जब तक राजेंद्र न आए।"

मैं सिपाही के साथ बाहर निकला। अस्पताल का फाटक पार करते ही देखा — सड़क के उस पार, एक सफ़ेद जीप खड़ी थी। बोनट पर धूल, और उसके पास एक आदमी खड़ा था, जो सिगरेट पी रहा था। मुझे देखकर उसने सिगरेट ज़मीन पर गिराई और पैर से मसल दी।

सिपाही ने भी देखा। उसने कोई बात नहीं की, बस चलने की रफ़्तार तेज़ कर दी।

थाने पहुँचे तो वहाँ एक अनजान चेहरा बैठा था — मोटा, बड़ी मूँछों वाला, सफ़ेद कुर्ते में, और उसके हाथ में एक काली मोटी बही थी। वही भवानी का 'भैया' था, जिससे मैं चाय की दुकान पर टकराया था।

"आ गया?" उसने बिना उठे कहा। "बैठ जा।"

"कहाँ राजेंद्र है?" मैंने पूछा।

"राजेंद्र?" मोटे ने हँसी में कहा। "राजेंद्र अपनी ड्यूटी पर है। ये शिकायत मेरे हाथ में है।" उसने बही खोली। "बोल, तूने छत क्यों गिराई?"

"मैंने छत नहीं गिराई," मैंने कहा। "छत बारिश से गिरी।"

"बारिश से?" उसने पन्ना पलटा। "तो ये काग़ज़ क्या है? रामलाल ने लिखवाया है कि तू रात में छत पर चढ़ा, बच्चा उठाकर लाया, और छत गिर गई।"

"बच्चा उस छत के नीचे दबा था," मैंने कहा। "मैंने उसे निकाला।"

"यही तो," मोटे ने कहा। "तू वहाँ था न? तो शिकायत सही है।"

मेरी जेब में टोकन ठंडा था। मैंने उसे छुआ, तो कुछ नहीं हुआ।

तभी थाने का दरवाज़ा खुला और राजेंद्र अंदर आया। उसके पीछे बंसी था।

"ये क्या है?" राजेंद्र ने मोटे की तरफ़ देखकर कहा। "ये मेज़ मेरी है, भाई साहब।"

मोटे ने बही बंद की। "राजेंद्र, ये शिकायत है।"

"शिकायत?" राजेंद्र ने काग़ज़ उठाया और पढ़ा। "शिकायतकर्ता रामलाल? वो रामलाल जो भवानी के होम का चौकीदार था? और ये शिकायत रात दो बजे दर्ज हुई, जब चौकीदार खुद हवेली में था?" उसने मोटे की तरफ़ देखा। "भाई साहब, ये शिकायत नहीं, ये चक्कर है।"

मोटे का चेहरा बदला।

"राजेंद्र," उसने धीरे से कहा, "तू अपनी नौकरी की तरफ़ देख।"

"मैं देख रहा हूँ," राजेंद्र ने कहा। "और मुझे दिख रहा है कि शिकायत दर्ज करने वाला खुद फ़र्ज़ी है।" उसने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "मन्नू, तू जा। और सुन — कल सुबह नौ बजे अदालत। वहाँ ये काग़ज़ दिखाना।"

मैं उठा। मोटे ने मुझे जाते हुए देखा।

"मनोहर," उसने कहा, "एक बात याद रख। ठाकुर ने कहा था — अगर तू काग़ज़ लेकर अदालत पहुँचा, तो जो अदालत के बाहर होगा, वो तेरे पास से नहीं गुज़रेगा।"

मैं रुका। राजेंद्र ने मेरा कंधा पकड़ा और बाहर की तरफ़ धकेला।

बाहर आकर बंसी ने कहा, "सुमन रामदीन के पास गई है। बोली — तू आ जाए तो सीधा वहीं आ।"

"चल," मैंने कहा।

हम पुरानी बस्ती की तरफ़ बढ़े। रास्ते में बंसी ने कहा, "मन्नू, वो मोटा जो बैठा था — उसके पास जो बही थी, उसका रंग वैसा ही था जैसा तेरे पापा की बही का।"

"मतलब?"

"मतलब — भवानी के पास सिर्फ़ एक बही नहीं है। उसके पास पापा की बही की नक़ल है। और वो नक़ल किसी ने बनाई है — कोई जो पापा की लिखाई जानता है।"

मैं रुक गया। "मुंशी।"

"हाँ," बंसी ने कहा। "और इसीलिए भवानी आज रात रामदीन के पास जा रहा है — नक़ल बनवाने के लिए नहीं, मिटाने के लिए।"

तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। इतना गरम कि मैंने निकालकर हथेली पर रखा। उस पर नया अंक नहीं चमक रहा था, बल्कि पुराना अंक — आठ हज़ार — धुँधला हो रहा था, जैसे कोई उसे पोंछ रहा हो।

और फिर टोकन से आवाज़ आई — बहुत धीमी, एक ही शब्द:

"रामदीन।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा।

"क्या हुआ?" उसने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा, टोकन जेब में रखते हुए। "चल, तेज़।"

॥

थाने की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे पैर भारी थे, पर जेब हल्की नहीं थी। आठ हज़ार का अंक धुँधला होकर टोकन से मिट गया था, और उसकी जगह जो शब्द बचा था — रामदीन — वो मेरे सिर में लगातार बज रहा था।

अंदर घुसते ही बंसी ने मेरा कंधा दबाया। “देख, कौन बैठा है।”

मेज़ पर एक औरत बैठी थी — बुटी हुई साड़ी, हाथ में रुमाल, आँखें लाल। मैंने उसे पहचाना। काकी के घर के बगल वाली गली में रहती थी, कभी-कभी काकी के दरवाज़े पर बैठी मिल जाती थी। नाम क्या था… कम्मो? नहीं, कम्मो तो हवेली वाली बूढ़ी थी। ये शायद शांति।

“ये कौन है?” मैंने धीरे से पूछा।

“काकी की पड़ोसन,” बंसी ने कहा। “शांति।”

शांति ने मुझे देखते ही रुमाल मुँह पर दबा लिया। “यही है,” वो राजेंद्र की तरफ़ बोली। “यही मनोहर है। इसने ही मेरी छत की पट्टियाँ ढीली करवाई थीं।”

“क्या?” मैं आगे बढ़ा, पर बंसी ने बाजू पकड़ ली।

राजेंद्र मेज़ के पीछे बैठा था, सामने एक काग़ज़ रखा था, और वो काग़ज़ बार-बार उठाकर देख रहा था, जैसे उसे भी यक़ीन न हो रहा हो।

“मन्नू,” उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरकाया। “पढ़।”

मैंने पढ़ा। शिकायत साफ़ शब्दों में थी — “मनोहर, पुत्र कन्हैया, रामगंज निवासी ने मेरी छत की लकड़ियाँ काटकर ढीली कर दीं, जिससे बारिश में छत गिरी और मेरा बच्चा घायल हुआ। इसका मक़सद काकी की ज़मीन का मामला जीतना है।”

मेरा गला सूख गया।

“मेरा बच्चा?” मैंने शांति की तरफ़ देखा। “तुम्हारा बच्चा कब घायल हुआ? जो छत गिरी, वो काकी के घर की थी। और उसमें छोटू दबा था, तुम्हारा कोई नहीं।”

“मेरी छत भी गिरी थी,” शांति ने रुमाल नीचे किया। “उसी रात।”

“कौन सी छत?” बंसी ने आगे आकर कहा। “शांति, हम उस रात वहीं थे। तेरी छत जगह पर खड़ी थी। मैंने ख़ुद अपनी आँखों से देखी — तेरे आँगन में पानी भरा था, छत साबुत थी।”

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