The Token System – Chapter 151
और तब उसने रजिस्टर उठाया, उसे हवा में थोड़ा ऊँचा किया, जैसे किसी दुकानदार ने सामान नाप रहा हो, और धीरे से बोला — आवाज़ इतनी दूर से भी साफ़ आई, जैसे वो मेरे कान में बोल रहा हो —
"मनोहर, बेटा, रास्ता चुनने का वक़्त आ गया। फिर मैं वही रास्ता चुनूँगा जो तेरे पापा ने चुना था।"
उसने रजिस्टर अपने सीने से लगाया। खिड़की के शीशे पर उसका साया एक पल को खड़ा रहा, फिर झुक गया, और मुझे लगा मुझे वही काग़ज़ तोड़ना है — पर फाड़ना नहीं, जीतना है।
॥
खिड़की के शीशे पर भवानी का साया झुका, और मैं वहीं खड़ा रह गया। सुमन ने मेरी कलाई पकड़ी और खींच लिया।
"नीचे झुक," उसने फुसफुसाया। "वो हमें देख चुका है। पर अभी अंदर आने की हिम्मत नहीं करेगा। बाहर उसके आदमी होंगे।"
हम सीढ़ियों से उतरकर गली के कोने पर आए। वहाँ एक चौकीदार की कोठरी थी, जिसमें पीली बत्ती जल रही थी।
"ये रामदीन के जानने वाले हैं," सुमन ने कहा। "इन्हें रजिस्टर दिखाते हैं।"
पर कोठरी में कोई नहीं था। दरवाज़े पर ताला लटक रहा था, और ताले में चाबी लगी थी, जैसे कोई भागते में भूल गया हो।
सुमन ने ताला खोला और अंदर झाँका। छोटी मेज़ पर एक रजिस्टर खुला पड़ा था, और उसके ऊपर चाय का कप, आधा भरा।
"ये वही चौकीदार का रजिस्टर है," सुमन ने पन्ना पलटते हुए कहा। "हर रात कौन आया, कौन गया — सब लिखा है। देख, आज रात का कॉलम।"
मैंने झुककर देखा। आज रात के कॉलम में तीन लाइनें थीं। पहली — "ठाकुर साहब का आदमी, तेरह रजिस्टर, तीन सील।" दूसरी — "चार हज़ार, गिन लिए।" तीसरी लाइन के आगे सिर्फ़ इतना — "बद्री की फ़ाइल — कल।"
"कल?" मैंने कहा।
"यही तो," सुमन ने कहा। "भवानी ने तीन रजिस्टर उठाए, पर बद्री की फ़ाइल कल के लिए छोड़ गया। क्यों?"
मेरी जेब में फ़ोन काँपा। बंसी था।
"मन्नू, सुन," उसकी आवाज़ घबराई हुई थी। "छोटू को होश आ गया है, पर सुमन को फ़ौरन अस्पताल आना है। बच्चे के पैर की हड्डी में दरार है, उसे एक्स-रे से देखना है। और वो बार-बार तुझे बुला रहा है।"
"हम आ रहे हैं," मैंने कहा।
सुमन ने रजिस्टर की फ़ोटो निकाली। मेरे फ़ोन में भी एक-एक पन्ना उतार लिया। फिर रजिस्टर वापस मेज़ पर रखा, चाय का कप हटाया, ताकि सब वैसा ही लगे जैसा हमने देखा था।
"चल," उसने कहा। "और मन्नू — तहखाने की बात मत भूलना। भवानी ने जो सील किए, वो रजिस्टर कल सुबह अदालत में पहुँचने चाहिए। वरना बद्री की ज़मीन का काग़ज़ काग़ज़ ही रह जाएगा।"
अस्पताल पहुँचे तो पौ फटने वाली थी। इमरजेंसी के बाहर बंसी खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास, जो ठंडी हो चुकी थी।
"छोटू जागा," उसने कहा। "काकी उसके पास है। और रमेश भी। गुड़िया सो गई बेंच पर।"
सुमन सीधा वार्ड में घुसी। मैं पीछे रुका, तो बंसी ने मेरा बाज़ू पकड़कर कोने में खींचा।
"मन्नू, एक बात कहनी है," उसने धीरे से कहा। "वो जो भवानी ने आख़िर में कहा — 'मैं वही रास्ता चुनूँगा जो तेरे पापा ने चुना था' — वो ऐसे ही नहीं कहा।"
"तो?"
"उसका मतलब है कि भवानी को पापा के रास्ते का पूरा सच पता है। वो सिर्फ़ धमकी नहीं दे रहा था, वो अपना पत्ता दिखा रहा था।" बंसी ने आसपास देखा। "और एक बात — उसने रजिस्टर उठाकर सीने से लगाया। ऐसा वही करता है जिसके पास कुछ ऐसा हो जो उसके सिवा किसी के पास न हो।"
"बंसी," मैंने कहा, "पापा की बही में तीसरा नाम मेरा है।"
बंसी का मुँह खुला रह गया। उसने चाय का गिलास पास की बेंच पर रख दिया।
"तेरा?"
"माँ ने पापा का लिफ़ाफ़ा दिया था। उसमें तीन नाम थे — सुनीता, सोमनाथ, और तीसरा मैं।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "पापा को पता था कि हिसाब मेरे पास आएगा। और वो इसीलिए बीस साल पहले से मुझे छुपाकर ये सब लिखते रहे — कहीं मुझे टोकन का पता चल जाए, तो मैं सँभाल सकूँ।"
"तेरे पापा ने तुझे पहले से तैयार कर रखा था," बंसी ने धीरे से कहा। "और वो भी बिना बताए।"
हम वार्ड के दरवाज़े पर पहुँचे। छोटू चारपाई पर लेटा था, पैर में पट्टी, चेहरा छोटा और पीला। काकी उसके सिरहाने बैठी थी, हाथ उसके बालों पर, और गुड़िया बेंच पर सिर झुकाए सो रही थी, हाथ में छोटू का जूता पकड़े।
छोटू ने मुझे देखा तो होंठ हिलाए।
"मन्नू भैया," उसने कहा, "मैंने उस आदमी से नहीं कहा था। मैंने टोकन नहीं दिया।"
"पता है," मैंने कहा, उसके पास बैठकर। "तूने बहुत अच्छा किया।"
"वो आदमी रो रहा था," छोटू ने कहा। "सच में। वो मेरे जूते में काग़ज़ रखकर भाग गया था। मुझे लगा वो डरा हुआ है, गुस्से वाला नहीं।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वह भी सुन रही थी।
तभी काकी उठी। उसने मेरा हाथ दोनों हाथों से पकड़ लिया और कुछ ऐसी आवाज़ निकाली जो रोने और बोलने के बीच की थी।
"तूने मेरे घर की छत गिरने से पहले ही बचा लिया," उसने कहा। "और अब बच्चा भी बचा लिया। मैं तुझसे बस एक बात कहूँगी — मेरी ज़मीन के काग़ज़ कभी किसी के डर से मत देना। मैं मर जाऊँगी पर तू मत देना।"
"काकी," मैंने कहा, "काग़ज़ तो मैंने कब का बचा लिया है। वो अब अदालत में जाएगा।"
काकी ने मेरा हाथ छोड़ा, अपनी साड़ी से आँख पोंछी और बेंच पर बैठ गई। तभी मुझे अपनी जेब भारी लगी।
मैंने हाथ डाला। नोटों का गड्डा था। गिना — आठ हज़ार। नए पुराने, कुछ मुड़े हुए। मैंने कुछ नोट निकालकर काकी की तरफ़ बढ़ाए।
"ये रखिए," मैंने कहा। "छोटू के इलाज में काम आएगा।"
काकी ने मेरे हाथ को धकेल दिया।
"यह तेरा हिसाब है, मेरा नहीं," उसने कहा। "मेरे बच्चे का इलाज सरकारी अस्पताल में हुआ है, और यहीं होगा। तू ये पैसा उस काम में लगा जिसके लिए ये आया है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था — शायद पछतावा।
"मन्नू," सुमन ने वार्ड के दरवाज़े से आवाज़ दी, "बाहर आ, एक बात है।"
मैं बाहर आया। सुमन के हाथ में एक्स-रे की पर्ची थी।
"छोटू ठीक है," उसने कहा। "पैर की हड्डी में दरार है पर जान का ख़तरा टल गया। दो-तीन हफ़्ते आराम, फिर चलने लगेगा।"
"शुक्रिया," मैंने कहा।
"शुक्रिया नहीं," सुमन ने कहा। "अब सुन। मैंने एक्स-रे में एक और चीज़ देखी। बच्चे की जाँघ पर पुरानी चोट का निशान है, जो इस हादसे से पुराना है। दो-तीन महीने पुराना।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि छोटू पहली बार नहीं गिरा।" सुमन ने पर्ची मोड़ी। "मैं रिपोर्ट में ये लिखूँगी। ये अलग बात है कि मैं इसे अभी रिपोर्ट में ही रखूँ। पर काकी से बात करनी पड़ेगी — इससे पहले कि ये किसी और के हाथ में पहुँचे।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा पड़ा था।
"सुमन," मैंने कहा, "भवानी ने रात में जो रजिस्टर उठाए, उनमें से एक बद्री की फ़ाइल भी थी?"
"नहीं," सुमन ने कहा। "चौकीदार के रजिस्टर में साफ़ लिखा था — बद्री की फ़ाइल कल। भवानी उसे आज के लिए छोड़ गया है।"
"क्यों?"
सुमन ने अपनी जेब से एक पुरानी मुड़ी पर्ची निकाली।
"ये मुझे मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दफ़्ते में मिली, वकील के जाने के बाद, ज़मीन पर पड़ी थी।" उसने खोली। "इस पर सिर्फ़ एक नाम है — रामदीन। और ये पता — पुरानी बस्ती, तहसील के पीछे का क्वार्टर।"
"मुंशी रामदीन?"
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