The Token System148 / 1154

The Token System – Chapter 148

7 min read November 6, 2026

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "और तेरे हिसाब का क्या?"

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। मैंने उसे निकालकर देखा — अब सोलह हज़ार की जगह सिर्फ़ आठ हज़ार।

"आठ हज़ार," मैंने कहा। "छोटू के इलाज और बच्चे को बचाने के।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "तो तेरा हिसाब बढ़ता है या घटता है?"

"घटता है," मैंने कहा। "जितना काम, उतना पैसा। पर ये पैसा आज किसी के नुक़सान से नहीं आया।"

सुमन एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने कहा, "मन्नू, मैं तेरे साथ चलूँगी। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पास।"

"पर आपकी नौकरी…"

"जाए तो जाए," सुमन ने दोहराया। "पर आज अगर ये बच्चा बच गया, तो उसका क्रेडिट सिर्फ़ मेरे नाम नहीं जाएगा। उसका क्रेडिट उस कमरे के फ़ॉर्म पर भी जाएगा।"

तभी मेरे हाथ में पकड़ा वो लाल डिबिया हिला। मैंने उसे खोला। अंदर वही काग़ज़ था जो शेखर बाबू ने दिया था — कमला की एंट्री वाला।

पर उस काग़ज़ के पीछे, पेंसिल से, कोई और लिखावट थी। रीना की लिखावट।

"मन्नू, ये काग़ज़ मैंने तेरे जूते में रखा था। रमेश के हाथ से आया था। उसने कहा — 'मेरी माँ ने ये कहा था कि अगर कुछ हो जाए तो ये मन्नू मामा को देना।'"

मैंने काग़ज़ को पलटकर देखा। नीचे एक और लाइन थी, फीकी पेंसिल में, किसी बच्चे की लिखावट में नहीं, एक बूढ़ी औरत की लिखावट में:

"इस काग़ज़ में वो नाम है जो तीन साल पहले मिटाया गया था।"

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "डॉक्टर, मुझे लगता है कि कमला ने अपनी मौत से पहले कुछ छोड़ा था।"

"कहाँ?"

"मेरे जूते में।"

सुमन एक पल चुप रही। फिर बोली, "तो जल्दी चल। रमेश से पहले हमें वो काग़ज़ पूरा पढ़ना है।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने अपनी उँगली पर बंधी पट्टी की तरफ़ देखा और कहा, "चलता हूँ।"

हम अस्पताल के बाहर निकले। सड़क पर सफ़ेद जीप अब नहीं थी। पर फाटक पर खड़ी एक और गाड़ी थी — छोटी, पुरानी।

उसके पास एक औरत खड़ी थी। उसने हमें देखते ही अपना चेहरा ढका और गाड़ी की तरफ़ चल पड़ी।

बंसी ने कहा, "कौन?"

मैंने उसे जाते देखा। उसके हाथ में एक चमकीली चीज़ थी। मैंने आँखें सिकोड़कर देखा — एक पीतल का टुकड़ा, जो टोकन जैसा चमक रहा था।

मेरा दिल एक पल को रुका।

"बंसी," मैंने धीरे से कहा, "वो औरत… वो टोकन पकड़े हुए है।"

बंसी ने देखा। "नहीं मन्नू, वो कोई और चीज़ होगी।"

"तो क्यों छुपकर भाग रही है?"

तभी वो औरत गाड़ी में बैठी और गाड़ी स्टार्ट हुई। वह निकल रही थी — और उसकी नंबर प्लेट पर कुछ नहीं।

मैंने अपनी जेब से टोकन निकाला। वो ठंडा था।

पर फिर एक पल को — सिर्फ़ एक पल को — वो गरम हुआ, और ऐसा लगा जैसे उसके अंदर से कोई आवाज़ आई हो।

मैंने उसे कान से लगाया। कुछ सुनाई नहीं दिया।

बंसी ने कहा, "मन्नू, अब क्या?"

मैंने गाड़ी को दूर जाते देखा। फिर अस्पताल की तरफ़ देखा, जहाँ छोटू सो रहा था।

"अब," मैंने कहा, "रमेश के पास।"

हम मुड़े। पीछे अस्पताल की लाइटें जल रही थीं, और उनमें से एक खिड़की से सुमन का चेहरा दिख रहा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और छोटू के काग़ज़ वाली फ़ाइल उठाई — जैसे कह रही हो, "मैं तैयार हूँ।"

और सड़क के उस पार, पुराने मंदिर की तरफ़ जाती गली में, एक छोटी सी परछाई दौड़ रही थी। गुड़िया। वो मेरे से पहले रमेश के पास पहुँचने की जल्दी में थी।

॥

मंदिर की गली में पानी घुटनों तक था। गुड़िया उसमें दौड़ रही थी और मैं उसके पीछे भाग रहा था, पर वो बच्ची थी, हल्की थी, मुझसे पहले पहुँच गई।

मैं मंदिर के दरवाज़े पर पहुँचा तो साँस फूल रही थी। अंदर अँधेरा था, सिर्फ़ दीये की एक लौ जल रही थी, और उसी के सहारे गुड़िया एक कोने में बैठे रमेश के सामने घुटनों के बल बैठी थी।

रमेश काँप रहा था। दस साल का लड़का, कपड़े मैले, होंठ नीले।

"मामा," गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "इसे ठंड लग रही है।"

मैंने अपनी शर्ट उतारकर रमेश के कंधों पर डाल दी। बंसी पीछे-पीछे आया, हाँफता हुआ।

"अरे भाई, तू यहाँ बैठा है? पूरा अस्पताल तेरे नाम से गूँज रहा था।"

रमेश ने सिर उठाया। उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों की आँखों में नहीं होना चाहिए।

"वो आदमी आएगा," उसने कहा। "वो कह रहा था कि अगर मैं कुछ बोला तो माँ को भी नहीं छोड़ेगा।"

"कौन आदमी?"

"काला कुर्ता। हाथ पर निशान।"

मेरी और बंसी की नज़रें मिलीं।

"रमेश," मैं उसके पास बैठ गया। "तेरी माँ ने तुझे कुछ दिया था?"

वो एक पल चुप रहा। फिर अपनी जेब से, गीली जेब से, काग़ज़ का एक टुकड़ा निकाला। वो पहले से भीगा हुआ था, स्याही फैल रही थी, पर पढ़ा जा सकता था।

"ये माँ ने दिया था। कहा था — मरने से पहले।"

मैंने काग़ज़ लिया। बंसी ने दीया पास कर दिया।

उस पर दो लाइनें थीं। बस दो। पहली लाइन — "मेरे बाद रमेश और गुड़िया को सरकारी स्कूल में दाखिल करा देना, उनका हिसाब मेरे नाम पर बाकी है।"

और दूसरी लाइन — "जो नाम तीन साल पहले मिटाया गया, वो मेरा नहीं था। वो बद्री का था।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने दीया नीचे रख दिया।

"बद्री?" मैंने कहा। "बद्री तो अस्पताल का चौकीदार है। जो गायब हो गया था।"

"हाँ," रमेश ने कहा। "माँ कहती थी — बद्री काका को भवानी के आदमियों ने कुछ पिला दिया था, और जब वो बेहोश हो गए तो उनके हाथ से काग़ज़ लेकर उनका नाम मिटा दिया। माँ ने वो काग़ज़ छिपा लिया था। इसीलिए माँ को भी…"

वो रुक गया। गुड़िया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"तो तेरी माँ ने बद्री का काग़ज़ छिपाया था?" बंसी ने पूछा। "कहाँ?"

रमेश ने ऊपर देखा। मंदिर की छत की तरफ़। "यहीं। छत के नीचे। उस पत्थर के पीछे।"

हम तीनों ने ऊपर देखा। मंदिर की छत पुरानी थी, कई जगह से टूटी हुई, और एक कोने में पत्थर का एक टुकड़ा बाकी पत्थरों से अलग रंग का था।

"बंसी," मैंने कहा, "कंधा दे।"

बंसी ने हाथ जोड़कर कंधा दिया। मैं चढ़ा, पत्थर को खींचा। वो हिला। दूसरी कोशिश में वो बाहर आ गया और उसके पीछे से मिट्टी और टूटे पत्थरों के साथ एक पीली लिफ़ाफ़े जैसी चीज़ नीचे गिरी।

रमेश ने उसे उठाया। वो कोई लिफ़ाफ़ा नहीं था — एक मोटा काग़ज़ था, जिस पर मोहर लगी थी और नीचे तारीख़।

"ये तो तहसील का काग़ज़ है," बंसी ने कहा, उसे दीये के पास लाकर। "देख, मोहर तहसील की है। और ये नाम…"

उसकी आवाज़ अटक गई।

"क्या है?" मैंने पूछा।

"बद्री कुम्हार," बंसी ने पढ़ा। "पुत्र श्री देवीलाल कुम्हार। निवासी — रामगंज, गली नंबर…"

"नंबर मत पढ़," मैंने कहा। "आगे पढ़।"

"ज़मीन का बैनामा। तारीख़ — बारह साल पहले। खरीदार — ठाकुर हरि सिंह।"

मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। उस पर भवानी के दादा का नाम था, हरि सिंह, वही नाम जो हवेली की बही में था। और नीचे गवाह के तौर पर एक और नाम — "मुंशी रामदीन"।

"रामदीन," बंसी ने कहा। "वो तहसील का गिरदावर। जो अभी ज़िंदा है।"

"और ये काग़ज़ कह रहा है कि बद्री की ज़मीन हरि सिंह ने खरीदी थी," मैंने कहा। "पर बद्री तो कहता रहा कि उसकी ज़मीन कभी बिकी ही नहीं।"

"तो इसका मतलब," रमेश ने धीरे से कहा, "माँ ने इसीलिए ये छिपाया था। क्योंकि इस पर उसका और बद्री काका का नाम था।"

"नहीं रमेश," मैंने कहा, "इसलिए छिपाया था कि इस पर किसी और का नाम नहीं था। जिसने ये लिखवाया, उसने बद्री से अँगूठा लिया, और बद्री को पता भी नहीं चला।"

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