The Token System – Chapter 147
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, लैब बाद में। पहले वो कमरा।"
हम भागे। अस्पताल के पीछे की तरफ़, जहाँ फाटक से पहले एक पुराना गलियारा है और दीवार पर पीली पुताई उखड़ रही है। शेखर बाबू ने चलते-चलते अपनी जेब से एक ज़ंग लगी चाबी निकाली।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अंधेरा था और बारिश की बू आ रही थी। रोशनी की तरफ़ लालटेन थी — बुझी हुई।
"यहाँ कोई था," बंसी ने धीरे से कहा।
फ़र्श पर पैरों के निशान थे। मेज़ पर एक गिलास, आधा पानी भरा। और एक कोने में चारपाई पर पुरानी चादर थी — किसी के सोने का निशान।
मेरी नज़र दीवार पर गई। वहाँ काग़ज़ चिपके थे — बच्चों के फ़ॉर्म, कुछ पर नाम लिखे, कुछ खाली।
बंसी ने एक फ़ॉर्म उठाया और पढ़ा — "गुड़िया देवी। छह साल। बाहर भेजना।"
मेरे हाथ में वो काग़ज़ काँपा।
तभी पीछे दरवाज़े पर आहट आई। हम पलटे — सुमन खड़ी थी। उसके हाथ में एक छोटी सी लाल डिबिया थी।
"डॉक्टर…"
"एक यूनिट मिल गई," उसने कहा। "किसी के पास से। छोटू स्टेबल हो रहा है। पर ये कमरा?"
"इस कमरे से बच्चे भेजे जाते थे," शेखर बाबू ने कहा। वो दरवाज़े पर खड़े थे, अब भी सफ़ेद कोट में।
सुमन ने कमरे में देखा। उसकी नज़र दीवार पर गई।
"ये फ़ॉर्म," उसने कहा। "ये भवानी के होम के हैं, सरकारी अस्पताल के नहीं। यहाँ कैसे?"
"क्योंकि ये कमरा सरकारी अस्पताल का है," मैंने कहा, "पर इसमें जो हो रहा था, वो भवानी का था।"
सुमन ने एक गहरी साँस ली। "मन्नू, मैं इस कमरे की तस्वीरें लूँगी। और ये फ़ॉर्म। ये सब मेरे पास रहेगा।"
"पर-"
"पर कुछ नहीं। मैंने आज एक बार फाड़ा, अब दूसरी बार नहीं। मेरी नौकरी जाए तो जाए, पर ये काग़ज़ जाने नहीं दूँगी।"
बंसी ने हवा में हाथ घुमाया। "तो अब क्या? भवानी आदमी भेजेगा, काग़ज़ माँगेगा।"
"नहीं माँगेगा," सुमन ने कहा। "वो सीधा सफ़ाई करेगा। काग़ज़ लेकर जाना उसका काम नहीं।"
तभी मेरी जेब से टोकन गरम हुआ। न सिर्फ़ गरम — जलने जैसा। मैंने उसे निकाला। पीतल पर अंक उभर रहा था। पंद्रह हज़ार की जगह… सोलह हज़ार।
बंसी ने देखा। "बढ़ गए?"
"कमरा मिला, काग़ज़ मिले," मैंने कहा। "ये शायद उसी का हिसाब है।"
सुमन ने टोकन की तरफ़ देखा, पर कुछ नहीं कहा। वह मेरी जेब में जाता देखकर बस बोली, "आज जो किया, वो तेरे हिसाब में जोड़ा गया?"
"लगता है, डॉक्टर साहिबा।"
"तो सुन, मन्नू," उसने कहा। "अगर यह बच्चा बच गया, तो तेरे पास कुछ आठ हज़ार आने वाले हैं। और अगर नहीं बचा, तो तू फिर से शून्य से शुरू करेगा। समझा?"
मैंने सिर हिलाया।
सुमन ने वो लाल डिबिया मुझे थमाई। "लो। इसे लैब में रखो। छोटू की माँ के जिस्म से जो नमूना लिया था — वो इसी डिबिया में है। मुझे नहीं पता कब काम आए। पर आज काम आया।"
मैंने डिबिया ली। डिबिया पर भी वही कोना-चिह्न था — दो आड़ी-खड़ी लकीरें और बिंदु।
बंसी ने देखा और उसकी भौंहें चढ़ीं। "मन्नू, ये निशान…"
"हाँ," मैंने कहा। "तीसरी जगह।"
तभी पीछे गलियारे से एक आवाज़ आई — बच्चे की आवाज़, दबी हुई, पर पहचानी हुई।
"मामा…"
हम भागकर बाहर आए। गलियारे के कोने पर गुड़िया खड़ी थी — कमला की बेटी, छह साल की, जिसका नाम उस फ़ॉर्म पर लिखा था।
"तू यहाँ कैसे?" मैंने घुटनों पर बैठकर पूछा।
"दादी ने भेजा," उसने कहा। "कहा — मामा से बोलना, रमेश डर गया है, घर नहीं आ रहा।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। शेखर बाबू ने ज़मीन की तरफ़।
मैंने गुड़िया का हाथ पकड़ा। "रमेश कहाँ है?"
"पीछे के मंदिर में छिपा है। उसे डर है कि कोई उसे भी ले जाएगा।"
मैंने बंसी को देखा। बंसी ने कमर पर हाथ रखा।
"तो अब तीन काम हो गए," मैंने कहा। "छोटू का इलाज, काग़ज़ की हिफ़ाज़त, और रमेश।"
"और रजिस्टर?" बंसी ने कहा।
"रजिस्टर मेरे पास है। पर एक बात साफ़ हो गई, बंसी। ये अस्पताल का पीछे वाला कमरा भवानी का बंद कमरा था। यहाँ से सिर्फ़ छोटू ही नहीं, और भी बच्चे गए हैं। माँ और बच्चे — दोनों।"
सुमन ने वो काग़ज़ संभाले। उसकी आवाज़ अब सख़्त थी। "कल मैं मुख्य चिकित्सा अधिकारी को चिट्ठी लिखूँगी। इस कमरे की फोटो के साथ।"
"पर वो आपकी नौकरी…"
"जाए तो जाए," सुमन ने कहा। वह मुड़ी और फिर पलटी। "मन्नू, एक बात। आज जो काग़ज़ मैंने फाड़ा — वो अब मेरी मेज़ पर नहीं है। मैंने उसे जलाया नहीं। मैंने उसे किसी को दिया नहीं। मैंने उसे फेंका, और उसे उठाने वाला भी मैं हूँ। यानी जो कोई उसे उठाने आएगा, वो मुझसे भिड़ेगा।"
"डॉक्टर, ये ठीक नहीं है," शेखर बाबू ने कहा। "आपका आना-जाना…"
"शेखर बाबू," सुमन ने कहा, "आप ही ने मुझसे कहा था — मरीज़ पहले, काग़ज़ बाद में। आज मैं वही कर रही हूँ।"
तभी अस्पताल के फाटक पर हलचल हुई। मैं भागकर खिड़की तक गया।
दो आदमी — वही दो, जो लंबे आदमी के साथ आए थे — फाटक पर खड़े थे। एक की कलाई पर पुराना निशान था, वही जो काकी ने बताया था।
और उनके पीछे, सड़क की तरफ़, एक गाड़ी खड़ी थी — उस पर भी कुछ पीला चिपका था।
"बंसी," मैंने कहा, "वो देख।"
बंसी ने देखा। "क्या है?"
"गाड़ी पर हमारा नाम लिखा है।"
बंसी ने ध्यान से देखा। और फिर धीरे से बोला, "मन्नू, ये सिर्फ़ नाम नहीं है। ये नोटिस है।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "डॉक्टर साहिबा, अस्पताल का पिछला फाटक खुला है?"
"हाँ, क्यों?"
"क्योंकि अगर वो बच्चा — गुड़िया — उसी फाटक से निकली, और उन्होंने देख लिया, तो अब वो अंदर आने की कोशिश करेंगे।"
सुमन एक पल रुकी। फिर उसने अपना स्टेथोस्कोप सीधा किया और बोली, "गुड़िया को मेरे कमरे में ले जाओ। और मन्नू — तू बाहर जाकर उन्हें देखकर आ, पर लड़ना नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अभी मुझे डॉक्टर भी चाहिए और गवाह भी। और तू दोनों है।"
मैंने गुड़िया का हाथ सुमन को दिया। फिर बंसी के साथ बाहर बढ़ा।
फाटक पर पहुँचते ही दोनों आदमी सीधे हो गए। उनमें से एक ने, कलाई वाला, मेरी तरफ़ देखा और कहा, "मनोहर जी, आपको ठाकुर साहब याद कर रहे हैं।"
"मैं उन्हें याद नहीं करता," मैंने कहा।
"तो उनकी बात सुन लीजिए। वो कह रहे हैं — रजिस्टर लौटा दो, बच्चा हमारे होम का है, और वो औरत — कमला — अपनी मर्ज़ी से गई थी।"
"कमला की मर्ज़ी का काग़ज़ शेखर बाबू ने लिखा है," मैंने कहा। "और वो अब पुलिस के पास जा रहा है।"
कलाई वाले आदमी का चेहरा बदला। "आप आगे मत बढ़िए।"
"मैं आगे नहीं बढ़ रहा," मैंने कहा। "बस जो आँखों के सामने है, वो देख रहा हूँ। और अब — ये बच्चे का अस्पताल है। आप फाटक के बाहर रहिए।"
वह आदमी कुछ कहने ही वाला था कि बंसी ने अपनी उँगली उठाई और कहा, "भाई, बाहर की सड़क सरकारी है। मेरी दुकान जल गई, पर मैं अभी भी उसी मोहल्ले का हूँ। और तुम्हारे ठाकुर को मेरी एक बात बता देना — बंसी अब चुप नहीं रहेगा।"
दोनों आदमी एक-दूसरे को देखकर पीछे हटे। कलाई वाले ने जेब से कुछ निकाला — एक छोटा कार्ड, पर वो देने की हिम्मत नहीं हुई। वो गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "अंदर चल।"
हम इमरजेंसी के बाहर पहुँचे तो सुमन बाहर आ रही थी — थकी हुई, पर चेहरे पर एक अलग तरह की चमक।
"छोटू स्टेबल है," उसने कहा। "ब्लड चढ़ गया। उसकी हड्डी ठीक हो रही है। अब वो ख़तरे से बाहर है।"
मैंने राहत की साँस ली। बंसी ने मेरी पीठ थपथपाई।
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