The Token System146 / 1154

The Token System – Chapter 146

6 min read November 6, 2026

"मुझे पता है।"

फिर मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "चलो।"

हम सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। पीछे काकी बैठी थी, अपनी लाठी सीने से लगाए।

और दूर, अस्पताल के फाटक पर, एक सफ़ेद जीप की लाइट पलट रही थी।

॥

सीढ़ियों पर पैर रखते ही ऊपर से किसी के भागने की आवाज़ आई। मैंने बंसी को पीछे धकेला और तीन-चार सीढ़ियाँ एक बार में लाँघ गया।

शेखर बाबू का दफ़्तर का दरवाज़ा खुला था। अंदर मेज़ पर फ़ाइलें बिखरी थीं, दराज़ें खींची हुई थीं, और एक सफ़ेद कोट टांग पर लटक रहा था। कुर्सी अभी घूम रही थी।

मैंने खिड़की से झाँका। नीचे बरामदे में शेखर बाबू भाग रहा था — हाथ में एक मोटा भूरा रजिस्टर दबाए, चश्मा हाथ में, और सफ़ेद कोट पहने ही भाग रहा था।

"बंसी, नीचे!" मैं चिल्लाया और सीढ़ियों से उतरा।

हम पीछे के बरामदे में पहुँचे तो शेखर बाबू इमरजेंसी के दरवाज़े की तरफ़ मुड़ चुका था — रजिस्टर सीने से लगाए, साँस फूली हुई।

"शेखर बाबू!" मैंने आवाज़ दी।

वह रुका। पलटा। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था।

"मनोहर… बेटा… मैं…"

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। "रजिस्टर दीजिए।"

"ये… ये तो पुराना हिसाब है…"

"शेखर बाबू, छोटू ऊपर ऑपरेशन में है। उसकी माँ कमला अस्पताल में आई थी और उसे आपने रोका था। ये वही रजिस्टर है।"

शेखर बाबू का हाथ काँपा। रजिस्टर उसकी पकड़ से ढीला पड़ा।

तभी इमरजेंसी का दरवाज़ा खुला और सुमन बाहर आई — हाथ में दस्ताने, चेहरे पर वो वाला भाव जो डॉक्टरों के चेहरे पर तभी आता है जब वो कुछ छिपा रहे हों।

"मन्नू, छोटू को अभी अंदर ले जाना है। उसका ब्लड प्रेशर गिर रहा है। काग़ज़-वाग़ज़ बाद में।"

मैंने शेखर बाबू से रजिस्टर खींच लिया। "ये मेरे पास रहेगा।"

शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो चापलूसी नहीं थी। डर था — सूखा, बेबस डर।

"मनोहर, वो रजिस्टर तेरे काम का नहीं है। वो मेरी जान का है।"

"तो फिर बताइए," मैंने कहा। "कमला उस दिन यहाँ क्यों आई थी?"

शेखर बाबू ने चारों तरफ़ देखा। फिर धीरे से कहा, "वो अपनी बेटी का टेस्ट कराने आई थी। गुड़िया का। लड़की के गले में कुछ था। उसे भवानी के होम भेजने की तैयारी थी। मैंने रोका नहीं।"

"और उसे बाद में कौन ले गया?"

"ये मैं नहीं जानता।"

"झूठ," बंसी ने कहा। वह शेखर बाबू के सामने आ गया। "तू जानता है। तूने उस दिन की एंट्री मिटाई है। बता।"

शेखर बाबू ने अपना चश्मा पोंछा, फिर वापस पहना। उसकी आवाज़ बदल गई — अब वो चापलूस क्लर्क नहीं था, बस एक थका हुआ आदमी था।

"उस दिन भवानी सिंह खुद अस्पताल आया था। कमला को मेरे कमरे में बैठाया। दरवाज़ा बंद किया। अंदर से आवाज़ें आईं। फिर भवानी निकला और बोला — 'इसका काग़ज़ काट दे।' मैंने काट दिया। मैंने कभी नहीं पूछा कि कमला का क्या हुआ।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।

मैंने रजिस्टर खोला। पन्ने पुराने थे, कोने मुड़े हुए। नाम, तारीख़ें, दस्तख़त। मेरी नज़र एक जगह अटकी — कमला देवी, तारीख़, और उसके आगे सिर्फ़ एक लाइन: "भेजा गया — ठाकुर भवानी सिंह।"

"यहाँ तो लिखा है कि कमला भवानी के होम भेजी गई थी।"

शेखर बाबू ने सिर हिलाया। "काग़ज़ पर। असल में उसे कहीं और ले जाया गया। कहाँ, ये मुझे नहीं पता।"

तभी इमरजेंसी के अंदर से एक नर्स भागी आई। "डॉक्टर साहिबा, बच्चे का सैचुरेशन गिर रहा है।"

सुमन भागकर अंदर गई। मैं भी उसके पीछे बढ़ा कि तभी अस्पताल का मुख्य दरवाज़ा खुला और उस सफ़ेद कोट वाला लंबा आदमी अंदर घुस आया — वही जो पहले छोटू को होम ले जाने आया था। पीछे-पीछे दो और आदमी आए, गाड़ी के दरवाज़े जैसे चौड़े।

लंबा आदमी सीधा इमरजेंसी के दरवाज़े तक आया। हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था।

"डॉक्टर साहिबा कहाँ हैं?"

"अंदर हैं," नर्स ने धीरे से कहा। "मरीज़ के पास।"

"जाकर बुलाओ।"

मैं आगे बढ़ा, पर बंसी पहले पहुँच गया। "क्या काम है भाई?"

लंबे आदमी ने उसे ऊपर-नीचे देखा। "तू कौन?"

"जो अंदर जाने से रोक रहा है।"

लंबे आदमी ने काग़ज़ सामने किया। "ये बच्चे का ट्रांसफ़र पेपर है। ठाकुर भवानी सिंह के नर्सिंग होम से। बच्चे का इलाज वहाँ तय हो चुका है। हम लेने आए हैं।"

तभी सुमन बाहर निकली। उसके दस्तानों पर खून के छींटे थे। उसने काग़ज़ देखा और उसका चेहरा वैसा हो गया जैसे किसी ने उसके हाथ से मरीज़ खींच लिया हो।

"कौन बच्चा?"

"छोटू। दस साल। पैर की हड्डी।"

सुमन ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने काग़ज़ हाथ में लिया, दोनों हाथों से पकड़ा — और एक ही झटके में फाड़ दिया।

"ये अस्पताल है," उसने कहा, "दुकान नहीं। यहाँ मरीज़ का इलाज डॉक्टर तय करता है, दलाल नहीं।"

लंबा आदमी का चेहरा काला पड़ गया। "डॉक्टर साहिबा, आप सोच-समझकर बोलिए। आपकी नौकरी…"

"मेरी नौकरी मेरे मरीज़ से बड़ी नहीं है," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ न ऊँची थी, न गिरी हुई। "और आपके ठाकुर को ये भी बता देना — छोटू के काग़ज़ पर जो नाम लिखा है, वो उसकी माँ का है, जिसे उन्होंने इसी अस्पताल से गायब करवाया था। अब एक भी बच्चा इधर से नहीं जाएगा।"

लंबे आदमी ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर वो मुड़ा और बिना कुछ कहे बाहर चला गया। उसके दो आदमी पीछे-पीछे गए।

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसके हाथ अभी भी वो फटा काग़ज़ पकड़े थे। उसने फाड़ा हुआ काग़ज़ कूड़ेदान में डाला और बोली, "अंदर चल। साँस ले रहा है, पर ब्लड चाहिए। तेरा ग्रुप क्या है?"

"बी पॉज़िटिव।"

"उसका ए पॉज़िटिव है। बंसी?"

"ओ पॉज़िटिव।"

सुमन ने एक गहरी साँस ली। "कोई नहीं मिलेगा तो हम दूसरे अस्पताल से लाएँगे। पर पहले उसे स्टेबल करना है।"

वह अंदर भागी। मैंने बंसी को देखा। बंसी ने अपना हाथ उठाया — उँगली की पट्टी पर खून सूख रहा था।

"मन्नू, ये जो काग़ज़ का खेल है," बंसी ने धीरे से कहा, "इसमें असली बात यही है — वो बच्चा अगर आज इधर से निकला, तो बाहर निकलते ही गाड़ी बदल जाएगी, नाम बदल जाएगा।"

"पता है," मैंने कहा। "इसीलिए तो फाड़ा सुमन ने।"

तभी मेरे हाथ में पकड़ा रजिस्टर भारी लगा। मैंने उसे खोलकर एक बार फिर देखा — कमला के नाम के आगे वो लाइन।

"बंसी," मैंने कहा, "ये रजिस्टर हमारे पास है। पर इसके अलावा कमला की बेटी गुड़िया का काग़ज़ भी कहीं होगा।"

"वो काग़ज़ तो होम में होगा।"

"नहीं। अगर सुमन सही कह रही है, तो टेस्ट यहाँ हुआ था। यानी लैब में भी एक कॉपी होगी।"

बंसी ने अपनी उँगली चूसी। "लैब। चल।"

हम लैब की तरफ़ मुड़े ही थे कि पीछे से शेखर बाबू की आवाज़ आई।

"मनोहर।"

हम रुके। शेखर बाबू सफ़ेद कोट में खड़े थे, अब भी वही कोट, पर उनका चेहरा कुछ और कह रहा था।

"मैं… मैं गवाही देने को तैयार हूँ। पर एक बात है।"

"क्या?"

"मेरी बेटी। भवानी ने उसकी शादी तुड़वा दी थी, फिर उससे कहा था — 'तेरे बाप का काग़ज़ मेरे पास है, चुप रहे तो ठीक है।' मैं ये सब छुपाता रहा। अब नहीं।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। "शेखर बाबू, आपकी गवाही की ज़रूरत होगी। पर पहले उस मासूम को बचाना है।"

"तो एक बात सुन," उसने मेरी कलाई पकड़ ली। "उस दिन भवानी ने कमला को यहाँ से नहीं भेजा। उसने कहा था — 'इसे उसी कमरे में रखो जहाँ सुनीता थी।' अस्पताल के पीछे, पुराने रिकॉर्ड कमरे से लगा वो कमरा।"

"वो कमरा बंद है।"

"बंद नहीं है। उसकी चाबी मेरे पास है।"

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