The Token System – Chapter 145
तभी काकी लाठी टेकती हुई अंदर आई। उसके कपड़े भीगे हुए थे, बाल बिखरे थे। उसने सीधा मेरा हाथ पकड़ा।
"मन्नू।"
"काकी, आप बैठिए।"
"मैं बैठने नहीं आई।" उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर साफ़ थी। "मैं तुझसे एक बात कहने आई हूँ।"
"कहिए।"
"वो बच्चा आज छत पर अकेला नहीं खेल रहा था।"
मैं रुक गया।
"मैंने देखा था," काकी ने कहा। "बारिश शुरू होने से पहले एक आदमी हमारी गली में आया था। पीछे की तरफ़। उसने छत के नीचे से कुछ निकालने की कोशिश की — मुझे लगा चोर है, मैंने लाठी उठाई। तब वो भागा। और छोटू — छोटू उसके पीछे गया था।"
"कौन था?"
"मैंने चेहरा नहीं देखा। पर उसकी कलाई पर एक पुराना निशान था।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "फिर वही निशान।"
मैंने काकी का हाथ पकड़ा। "और छोटू ने आपको कुछ बताया?"
"कह रहा था — उसका जूता। वो आदमी जूता ले जा रहा था।"
मेरा पेट भारी हो गया। छोटू के पास क्या था जो उस आदमी को चाहिए था? जूता? नहीं। जूते में कुछ छिपा था। छोटू की माँ की बातें, बैग, काग़ज़…
"बंसी," मैंने कहा, "मुझे छोटू का बैग चाहिए। उसके स्कूल का। जहाँ भी हो।"
"काकी के घर में ही होगा। मैं जाता हूँ।"
"नहीं। तुम यहीं रुको। तुम्हारी उँगली फटी है। मैं जाता हूँ।"
"तू अकेला नहीं जाएगा।"
"तो साथ चलो। पर पहले —" मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "डॉक्टर, मेरे पास एक लिफ़ाफ़ा है। सुनीता का भेजा हुआ। उस पर भी वही निशान है। मैं उसे सुनीता के सामने खोलना चाहता था। पर अब लगता है वक़्त कम है।"
सुमन ने एक सेकंड सोचा। "लिफ़ाफ़ा तुम्हारा है। फ़ैसला तुम्हारा। पर मैं इतना कहूँगी — जो चीज़ें छिपाकर रखी गई हैं, वो अक्सर इसलिए छिपी होती हैं कि कोई उन्हें जल्दी पा न ले।"
मैंने जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला। कमलेश का दिया हुआ। भारी, सीलबंद, ऊपर वही कोना-चिह्न।
बंसी ने कहा, "सुनीता ने कहा था — उसके सामने खोलना।"
"सुनीता सुबह छह बजे मिलेगी। और छोटू अभी ऑपरेशन थिएटर में है।" मैंने लिफ़ाफ़े को हवा में पकड़ा। "अगर इस लिफ़ाफ़े में छोटू के जूते वाली बात है — तो देर करना मतलब उस आदमी को और मौका देना।"
सुमन ने कहा, "मैं काग़ज़ नहीं देखूँगी। मैं डॉक्टर हूँ। पर तुम जो करो, जल्दी करो।"
मैंने लिफ़ाफ़े का किनारा फाड़ा।
अंदर एक पुरानी पीली पर्ची थी — मुड़ी हुई, तीन तह में। और एक छोटी चाबी। चाबी पर ज़ंग का निशान था।
पर्ची खोली। लिखाई मेरे पापा की थी।
"सुनीता — ये चाबी उस कमरे की है जिसे उसने बंद कर रखा है। जिस दिन ये पर्ची मिले, उस दिन हिसाब खुलेगा। उस कमरे में वो चीज़ है जो भवानी ने मुझसे छीनी थी — और जो असली है। उसे निकालना, पर बिना नाम लिए। क्योंकि जिस दिन नाम लिया, उस दिन हिसाब फिर भारी हो जाएगा।"
मैंने पर्ची सुमन को दी। वो पढ़कर रुक गई।
"ये तो… ये तो किसी कमरे की बात कर रहे हैं।"
"हाँ। और ये चाबी उसी की है।"
तभी ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुला और एक नर्स बाहर आई। "छोटू का ऑपरेशन शुरू हो गया है। पैर की हड्डी में दरार है, पर जान का ख़तरा नहीं।"
काकी ने आँखें बंद कर लीं और दीवार का सहारा लिया।
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "मन्नू, अब बता — ये चाबी किस कमरे की है?"
मैंने पर्ची फिर पढ़ी। फिर बंसी की तरफ़ देखा।
"हवेली," मैंने कहा। "वो कमरा जो नक्शे में बिना दरवाज़े वाला है।"
बंसी ने गहरी साँस ली। "तो आज रात नौ बजे की पर्ची झूठी नहीं थी।"
"नहीं थी। पर वो पर्ची हमें हवेली की छत पर बुला रही थी। और ये चाबी — ये ज़मीन के नीचे वाले कमरे की है।"
सुमन ने कहा, "दोनों जगहें अलग हैं।"
"हाँ। मतलब कोई हमें छत पर बुलाकर नीचे कुछ और करना चाहता है।"
बंसी ने अपनी फटी उँगली पर कपड़ा लपेटा। "या कोई हमें छत पर बुलाकर नीचे से कुछ निकलवाना चाहता है।"
मैंने चाबी जेब में रखी। "छह बजे सुनीता से मिलना है। उससे पहले हमें छोटू के जूते ढूँढने हैं।"
"जूता?" बंसी ने पूछा।
"छोटू ने कहा था — वो आदमी जूता चुरा रहा था। कौन जूता चुराता है? वो कुछ और ढूँढ रहा था। और अगर छोटू के जूते में कुछ है, तो वो अभी भी काकी के घर के मलबे में हो सकता है।"
हम बाहर निकले। बारिश हल्की हो गई थी। गली में पानी उतर रहा था।
काकी के आँगन में पहुँचकर हमने मलबा फिर छाना। इस बार ध्यान से। मैंने छोटू का दूसरा जूता ढूँढा — वो मिला, पर उसमें कुछ नहीं था।
"पहला जूता?" बंसी ने पूछा।
"वो हमने अस्पताल जाते वक़्त पकड़ा था। वो मेरी जेब में है।"
मैंने जूता निकाला। उसका तला देखा। तला सिला हुआ था। पर एक जगह सिलाई उधड़ी हुई थी।
मैंने उँगली डाली। अंदर कुछ था — मुड़ा हुआ काग़ज़।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या है?"
मैंने काग़ज़ निकाला। छोटा सा, भीगा, पर पढ़ने लायक। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, मेरे पापा की लिखाई में:
"हवेली की छत पर मत जाना। वो जाल है।"
मैंने काग़ज़ बंसी को दिया। उसने पढ़ा और अपना सिर खुजाया।
"तो अब?" उसने कहा।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बादल हल्के हो रहे थे। शाम होने वाली थी।
"अब," मैंने कहा, "हम छत पर नहीं जाएँगे। हम ज़मीन के नीचे जाएँगे।"
बंसी ने चाबी की तरफ़ देखा। "और नौ बजे की पर्ची?"
"नौ बजे कुछ और होगा। पर हम पहले पहुँचेंगे।"
तभी मेरी जेब में टोकन हिला। एक हल्की सी गरमी — बस एक पल को। और फिर ठंडा।
मैंने उसे निकाला। पीतल पर अंक उभर रहा था — बीस हज़ार की जगह अब सिर्फ़ पंद्रह हज़ार।
बंसी ने देखा। "पाँच हज़ार कट गए? किस काम के?"
मैंने टोकन को जेब में रखा। "छोटू के इलाज के।"
बंसी कुछ कहने ही वाला था कि काकी की आवाज़ आई — "मन्नू!"
हम भागकर अस्पताल के दरवाज़े पर पहुँचे। सुमन बाहर आ रही थी।
"ऑपरेशन हो गया। पैर ठीक कर दिया। पर उसने होश में आकर एक बात कही।"
"क्या?"
"उसने कहा — 'मामा, उस आदमी ने मेरे जूते में कुछ रखा था। वो माँ का काग़ज़ है।'"
मेरा हाथ जूते पर गया। काग़ज़ मिल चुका था। पर छोटू ने उसे रखा नहीं था — वो आदमी था।
"और एक बात," सुमन ने कहा। "उसका ब्लड ग्रुप चेक करते वक़्त हमें उसकी माँ का नाम मिला — कमला देवी। वही कमला जो कल रात मरी।"
मैं रुक गया। "पर कमला तो मर चुकी है।"
"हाँ। पर काग़ज़ में कमला के नाम पर पहले से एक टेस्ट दर्ज है। और वो टेस्ट इसी अस्पताल में हुआ था। जिस दिन कमला मरी, उससे तीन दिन पहले।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मतलब कमला यहाँ आई थी?"
"लगता है," सुमन ने कहा। "और उसे किसी ने रोका। वो कौन था, ये मैं नहीं जानती। पर उस दिन का रजिस्टर शेखर बाबू के पास है।"
मैंने अस्पताल के अंदर देखा। शेखर बाबू का दफ़्तर कहीं ऊपर था। और मैं जानता था — वो दफ़्तर अब खाली नहीं मिलेगा।
बंसी ने मेरा कंधा थपथपाया। "मन्नू, एक बात साफ़ हो गई।"
"क्या?"
"वो सफ़ेद कोट वाला शेखर बाबू ही था। और उसने छोटू को अपने होम में ले जाने की कोशिश की। मतलब भवानी को पता है कि छोटू के पास क्या है।"
मैंने अपने जूते की तरफ़ देखा। कीचड़ में सने। मेरी जेब में एक काग़ज़ था जो पापा ने लिखा था — "वो जाल है।"
और मेरे सामने एक चाबी थी जो बता रही थी कि असली चीज़ जाल के नीचे नहीं, ज़मीन के नीचे है।
मैंने सुमन से कहा, "छोटू को आप संभालिए। काकी को भी। मैं शेखर बाबू के दफ़्तर जा रहा हूँ।"
"अकेले?"
"बंसी साथ है।"
सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, ये आख़िरी मोड़ नहीं है।"
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