The Token System144 / 1154

The Token System – Chapter 144

6 min read November 6, 2026

"मैंने मना किया था!" वो चिल्लाई। "कितनी बार कहा — पीछे मत जा, बारिश में दीवार गिरेगी। पर वो कहाँ मानता है। छत के पीछे क्या ढूँढ रहा था, भगवान जाने।"

"कब गिरी?" मैंने घुटने के बल बैठकर पूछा।

"अभी। दस मिनट पहले। मैं चूल्हे पर थी — धड़ाम से आवाज़ आई।"

मैंने मलबे की तरफ़ देखा। भीगी मिट्टी के नीचे कुछ दिख नहीं रहा था।

तभी पीछे से बंसी की साँस फूली आवाज़ आई। "सुना मैंने। दुकान से भागा आ रहा हूँ।"

वो अपनी शर्ट की बाँह चढ़ा रहा था। मोटा शरीर, पर हाथ तेज़। "कहाँ था वो?"

"पीछे," काकी ने रोते हुए कहा। "उसी कोने में।"

मैं और बंसी मलबे पर झुके। मिट्टी गीली थी, भारी थी, हाथ फिसलते थे। मैंने पहली कड़ी खींची तो नाखून में मिट्टी भर गई। बंसी ने दूसरी तरफ़ से बाँस का टुकड़ा हटाया और उसका अंगूठा फट गया। खून बहा, पर वो हिला नहीं।

"ये बारिश," वो बड़बड़ाया, "साल भर की गंदगी बहा के लाई है।"

"बात मत करो, जल्दी करो।"

हमने तीन कड़ियाँ और उठाईं। मेरी पीठ में दर्द उठा। तभी बंसी रुका।

"मन्नू।"

"क्या?"

उसने भीगी मिट्टी के बीच से कुछ निकाला। छोटू का जूता। आधा दबा, तला ऊपर।

मेरा हाथ एक सेकंड को रुक गया। फिर मैं और ज़ोर से खोदने लगा। बंसी भी। काकी ने रोना बंद कर दिया और अपनी लाठी से पीछे मलबा खिसकाने लगी।

"छोटू!" मैंने आवाज़ दी। "छोटू, सुनाई दे तो बोल!"

कुछ नहीं सुनाई दिया।

अंत में बंसी ने एक बड़ी कड़ी को दोनों हाथों से उठाया और एक तरफ़ पटका। अंदर एक छोटी जगह बनी थी। बाँस और दीवार के बीच, जैसे कोई खोखला बच गया हो। और उसमें — छोटू। मुँह के बल पड़ा था, पर सीना हिल रहा था।

"ज़िंदा है," बंसी ने कहा, और उसकी आवाज़ अटक गई।

मैंने उसे बाहर निकाला। वो हल्का था, बहुत हल्का शरीर, पर लचक टूटी हुई थी। उसका दायाँ पैर अजीब कोण पर मुड़ा हुआ था। आँखें बंद थीं, मुँह में मिट्टी भरी थी।

मैंने उसके मुँह से मिट्टी साफ़ की। "छोटू। छोटू बेटा।"

उसने कुछ खाँसा। बस एक खाँसी। फिर मुँह फिर से ढीला पड़ गया।

काकी लाठी टेकती हुई आई और उसका सिर अपने हाथों में लिया। "मेरा बच्चा। मेरा बच्चा।"

"काकी," मैंने कहा, "अभी रोने का वक़्त नहीं। अस्पताल चलना है।"

मैंने छोटू को उठाया। पर बारिश ऐसी थी कि एक भी ऑटो नहीं दिख रहा था। गली में पानी घुटनों तक आ गया था। बंसी दौड़कर मेन रोड पर गया, पर वहाँ भी खाली सड़कें।

मैं छोटू को सीने से लगाए खड़ा था। उसका शरीर ठंडा हो रहा था। उसका सिर मेरी गर्दन से टिका था।

तभी एक ठेला दिखा — सब्ज़ी वाला, प्लास्टिक ओढ़े, रोड के किनारे खड़ा। मैंने दौड़कर उसे रोका।

"भाई, ये बच्चा मर रहा है। अस्पताल पहुँचा दे। जो माँगेगा दे दूँगा।"

ठेले वाला एक सेकंड को रुका। फिर उसने प्लास्टिक खींची और बोला, "डालो। और बैठ जाओ ख़ुद भी।"

बंसी भी चढ़ गया। हम ठेले पर चार लोग — दो खड़े, एक लेटा, एक चीखता हुआ। बारिश चेहरे पर पड़ रही थी। ठेले का पहिया कीचड़ में धँसता था, ठेले वाला ज़ोर लगाता था, छोड़ता था, फिर ज़ोर लगाता था।

रास्ते में एक बार छोटू ने आँखें खोलीं। उसने मुझे देखा। होंठ हिले।

"मामा… वो आदमी…"

"कौन?"

"वो… जूता चुरा रहा था…"

फिर आँखें बंद हो गईं।

अस्पताल का फाटक आया। इमरजेंसी की लाइट जल रही थी। मैं ठेले से कूदा और छोटू को गोद में लेकर सीधा अंदर भागा। बंसी पीछे-पीछे, और ठेले वाला पैसा लिए बिना ही मुड़ गया — "बाद में दे देना।"

इमरजेंसी के दरवाज़े पर स्ट्रेचर खड़ा था। मैंने छोटू को उस पर रखा। एक नर्स दौड़ी आई, फिर दूसरी।

"क्या हुआ?"

"छत गिरी। पैर पर चोट है। होश नहीं आ रहा।"

नर्सें अंदर ले जाने लगीं। मैं पीछे-पीछे चल रहा था कि सामने से कोई आया और मेरा रास्ता रोक दिया।

सफ़ेद कोट। लंबा, पतला शरीर। हाथ में ब्रीफ़केस। वोही चेहरा जो कुछ दिन पहले वार्ड में मरीज़ों की लिस्ट माँगने आया था।

उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर स्ट्रेचर पर पड़े छोटू की तरफ़। और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई — वो मुस्कान जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती थी।

"यह बच्चा," उसने कहा, "यहाँ नहीं। हमारे होम में जाएगा।"

मैंने स्ट्रेचर का हैंडल पकड़ लिया। "क्या कहा?"

"हमारे पास इसका पहले से फ़ॉर्म है।" उसने ब्रीफ़केस खोला और एक काग़ज़ निकाला। "देख लीजिए। माँ का नाम, पता, सब दर्ज है। इलाज होम में बेहतर होगा। यहाँ भीड़ है।"

बंसी मेरे पीछे खड़ा था। उसने धीमे से मेरी कमर में उँगली मारी — यानी सँभल।

"फ़ॉर्म दिखाइए," मैंने कहा।

उसने काग़ज़ आगे बढ़ाया। मैंने देखा। छोटू का नाम नहीं था। कोई और नाम था — मिटाया हुआ, फिर ऊपर से लिखा गया।

"इस पर तो छोटू लिखा ही नहीं।"

"नाम बाद में भरते हैं। पहले भर्ती करते हैं।"

"नहीं।"

"आप कौन हैं इसके?"

"मैं…" मैं रुका। "मैं इसका परिवार हूँ।"

आदमी हँसा। "परिवार का काग़ज़ कहाँ है? तीन दिन में लाइए। तब तक हम इसे अपने यहाँ रखेंगे।"

स्ट्रेचर अंदर जा रहा था। नर्सें रुक गईं — वो सब सुन रही थीं, पर कुछ बोल नहीं रही थीं।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। बिलकुल ठंडा। इस वक़्त ये मेरे काम का नहीं था। ये वक़्त सिर्फ़ अपना था।

"सुनिए," मैंने कहा। "ये बच्चा अभी साँस ले रहा है। आप जो काग़ज़ दिखा रहे हैं, उसमें इसका नाम नहीं है। और मैं इसको कहीं नहीं जाने दूँगा। अगर इसे कुछ हो गया, तो ये काग़ज़ आपके हाथ में रहेगा — और मेरी शिकायत थाने में।"

आदमी ने ब्रीफ़केस बंद किया। "आप जानते हैं मैं किसके लिए काम करता हूँ?"

"जानता हूँ।"

"तो फिर?"

"तो फिर क्या? भवानी यहाँ मरीज़ देखता है? या डॉक्टर?"

पीछे से आवाज़ आई — "नहीं, यहाँ डॉक्टर मैं हूँ।"

सुमन आ रही थी, कोट की बाँह चढ़ाए, हाथ में स्टेथोस्कोप। उसने छोटू को एक नज़र देखा और फिर उस आदमी को।

"ये बच्चा मेरा मरीज़ है। अभी भर्ती करो। बाद में जो काग़ज़ चाहिए, मैं भरूँगी।"

आदमी कुछ कहने ही वाला था कि सुमन ने उँगली उठाई। "शेखर बाबू, अगर आपको इमरजेंसी में मरीज़ रोकने का हुक्म किसी ने दिया है, तो लिखकर लाइए। मेरे पास भी कुछ काग़ज़ हैं जो मैं ऊपर भेज सकती हूँ।"

वो आदमी — शेखर बाबू का नाम सुनकर मैं चौंका। यही था? यही शेखर बाबू? पर ये तो अस्पताल का पुराना क्लर्क था। ये सफ़ेद कोट में कब से घूमने लगा?

उसने ब्रीफ़केस दबाया और पीछे हट गया। "डॉक्टर साहिबा, मैं तो सिर्फ़ काग़ज़ देख रहा था।"

"तो काग़ज़ रखिए और जाइए। बच्चे का इलाज शुरू हो रहा है।"

वो चला गया। पर जाते-जाते उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — वो नज़र जो कहती थी, ये बात यहीं ख़त्म नहीं होगी।

नर्सें स्ट्रेचर लेकर अंदर चली गईं। सुमन मेरी तरफ़ मुड़ी।

"देखा? यही होता है। जब तक काग़ज़ नहीं, तब तक मरीज़ सिर्फ़ काग़ज़ है।"

"आपने इसे भर्ती कर लिया — क्या मुश्किल होगी?"

"मुश्किल तो होगी। पर वो काग़ज़ जो उसने दिखाया — वो मैंने देखा नहीं। पर मुझे पता है कि ऐसे फ़ॉर्म कहाँ भरवाए जाते हैं। भवानी के होम में।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और ये बच्चा जिसकी भी है — इसका इलाज आज होगा, कल का मैं नहीं जानती।"

मैंने सिर हिलाया। पीछे बंसी खड़ा था, अपनी फटी उँगली देख रहा था। "मन्नू," उसने कहा, "मैं ठेले वाले को ढूँढकर पैसा दे आऊँ? वो बिना पैसा चला गया।"

"अभी रुको।"

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